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बिना तलाक दूसरी शादी करने वाले असम के सरकारी कर्मचारियों की सैलरी से कटेगा 20% हिस्साअसम
17 अग॰ 2026, 10:41 pm (44 दिन पहले)· 1

बिना तलाक दूसरी शादी करने वाले असम के सरकारी कर्मचारियों की सैलरी से कटेगा 20% हिस्सा

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने ऐलान किया है कि कानूनी तलाक लिए बगैर दूसरी शादी करने वाले सरकारी कर्मचारियों की 20 प्रतिशत सैलरी अब पहली पत्नी के खाते में भेजी जाएगी।

असम में सरकारी नौकरी करने वाले जो कर्मचारी बिना कानूनी तलाक लिए दूसरी शादी कर लेते हैं, अब उन्हें अपनी सैलरी का एक बड़ा हिस्सा गंवाना पड़ेगा। ऐसे कर्मचारियों की 20 प्रतिशत सैलरी सीधे उनकी पहली पत्नी के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाएगी। यह बड़ा ऐलान मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने किया है।

प्राइवेट सेक्टर तक बढ़ सकता है दायरा

हिमंता ने यह भी बताया कि उनकी सरकार सिर्फ सरकारी कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहना चाहती। प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले लोगों को भी इसी नियम के दायरे में लाने पर विचार चल रहा है, यानी आने वाले समय में यह कटौती निजी कंपनियों के कर्मचारियों पर भी लागू हो सकती है।

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पहले से लागू है बहुविवाह पर रोक

असम सरकार पहले ही यूसीसी के जरिए एक से ज्यादा शादी करने पर रोक लगा चुकी है। अब सैलरी में 20 फीसदी की सीधी कटौती का यह नया फैसला उसी नीति को और सख्त बनाने की कड़ी है। गौरतलब है कि सामाजिक हित से जुड़ा फैसला लेना सीएम हिमंता के लिए यह कोई पहला मौका नहीं है।

माता-पिता की अनदेखी पर भी हो चुकी है सख्ती

इससे पहले हिमंता सरकार अपने माता-पिता की उपेक्षा करने वाले कर्मचारियों पर भी एक्शन ले चुकी है। ऐसे कर्मचारियों की सैलरी से 10 से 15 प्रतिशत तक की राशि काटकर सीधे उनके माता-पिता के खाते में भेजी गई थी। इस नियम के डर से कई कर्मचारियों ने अपने बुजुर्ग माता-पिता का ख्याल रखना शुरू कर दिया था।

सरकार को क्या उम्मीद है

अब हिमंता सरकार को भरोसा है कि सैलरी में इस नई कटौती से बहुविवाह के मामलों में कमी आएगी और महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा भी मिलेगी।

सवाल-जवाब

असम सरकार का नया नियम क्या है?
बिना कानूनी तलाक के दूसरी शादी करने वाले सरकारी कर्मचारियों की 20 प्रतिशत सैलरी अब उनकी पहली पत्नी के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाएगी।
यह ऐलान किसने किया?
यह ऐलान असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने किया है।
क्या यह नियम प्राइवेट सेक्टर पर भी लागू होगा?
असम सरकार प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले लोगों को भी इस नियम के दायरे में लाने पर विचार कर रही है, लेकिन अभी यह लागू नहीं हुआ है।
क्या असम में पहले से बहुविवाह पर रोक है?
हां, असम सरकार यूसीसी के जरिए पहले ही एक से ज्यादा शादी करने पर रोक लगा चुकी है।
इससे पहले हिमंता सरकार ने ऐसा कौन सा फैसला लिया था?
इससे पहले माता-पिता की उपेक्षा करने वाले कर्मचारियों की सैलरी से 10 से 15 प्रतिशत काटकर उनके माता-पिता के खाते में भेजा गया था।
सरकार को इस फैसले से क्या उम्मीद है?
हिमंता सरकार को उम्मीद है कि इस नए फैसले से राज्य में बहुविवाह के मामलों में कमी आएगी।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Aisha Khan@aisha-khan·44 दिन पहले

असम सरकार का यह फैसला सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि मुख्यधारा के समाज और लोकप्रिय संस्कृति पर सीधा असर डालने वाला सामाजिक बदलाव है। जिस तरह फिल्मों और वेब सीरीज में बहुविवाह और पारिवारिक उपेक्षा जैसे विषयों को नाटकीय ढंग से दिखाया जाता है, उसके बीच इस तरह के कड़े प्रशासनिक फैसले पॉप कल्चर की कहानियों और वास्तविक जीवन के बीच एक दिलचस्प बहस छेड़ते हैं। यदि यह नियम निजी क्षेत्र तक बढ़ता है, तो यह मनोरंजन जगत के कथाकारों और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए पारिवारिक उपेक्षा और वैवाहिक कानूनों जैसे मुद्दों पर नई और यथार्थवादी कहानियाँ बुनने का एक बड़ा माध्यम बन सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·44 दिन पहले

असम सरकार का यह कदम प्रशासनिक और वित्तीय नियंत्रण के लिहाज से एक कड़ा रुख है। जब किसी कर्मचारी की आय का एक हिस्सा सीधे उसकी पहली पत्नी के खाते में ट्रांसफर होगा, तो इससे व्यक्तिगत वित्तीय प्रबंधन और सरकारी पेरोल प्रणाली पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। हालांकि इस नीति से महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है, लेकिन इसका निजी क्षेत्र तक विस्तार होने पर श्रम कानूनों, पेरोल अनुपालन और कॉर्पोरेट एचआर नीतियों के सामने नए कानूनी व प्रशासनिकचुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। बाजार और कॉरपोरेट जगत इस बदलाव के दूरगामी प्रभावों पर पैनी नजर रखेगा।

Dr. Aditya Sharma@aditya-sharma·44 दिन पहले

असम सरकार का यह निर्णय केवल एक वित्तीय दंड नहीं है, बल्कि यह प्राचीन सामाजिक व्यवस्थाओं और आधुनिक विधायी अनुशासनों के बीच एक संतुलन स्थापित करने का प्रयास है। ज्योतिषीय और पारंपरिक दृष्टिकोण से, कुटुंब और विवाह की संस्था का संरक्षण समाज के नैतिक ताने-बाने को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। जब प्रशासनिक नियमों के माध्यम से वैवाहिक व पारिवारिक दायित्वों को आर्थिक दंड से जोड़ा जाता है, तो यह प्रणाली कर्मचारियों में नैतिक उत्तरदायित्व का बोध कराने का कार्य करती है। भविष्य में जब यह नीति निजी क्षेत्र में विस्तारित होगी, तब पारिवारिक अनुपालन और सामाजिक सुरक्षा के मोर्चे पर इसके व्यापक परिणाम देखने को मिलेंगे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·44 दिन पहले

असम सरकार का यह कदम प्रशासनिक और सामाजिक नियंत्रण की दिशा में एक बड़ा कानूनी हस्तक्षेप है। सिविल सेवा आचरण नियमों के तहत बहुविवाह पहले से ही प्रतिबंधित है, लेकिन वेतन से सीधे कटौती का यह प्रावधान पीड़ित महिलाओं को तत्काल वित्तीय राहत देने के साथ-साथ कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन करने वालों पर सीधा आर्थिक दबाव बनाता है। यदि इस नियम को निजी क्षेत्र तक विस्तारित किया जाता है, तो श्रम कानूनों और कॉर्पोरेट सेक्टर में अनुपालन को लेकर नए कानूनी सवाल और चुनौतियाँ खड़ी हो सकती हैं, जिन पर अदालत की निगाहें भी रहेंगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·44 दिन पहले

करण मल्होत्रा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह देखना अहम है कि असम सरकार का यह रुख नागरिकता और व्यक्तिगत कानूनों के बीच संतुलन साधने का एक नया प्रशासनिक मॉडल पेश कर रहा है। माता-पिता के भरण-पोषण के बाद अब वैवाहिक जवाबदेही पर यह आर्थिक नियंत्रण राज्य के नीति-निदेशक तत्वों के दायरे को व्यावहारिक धरातल पर उतारने का प्रयास है। हालांकि, जब यह नियम निजी क्षेत्र पर लागू होगा, तो नियोक्ताओं के लिए पेरोल प्रबंधन और वित्तीय गोपनीयता से जुड़े जटिल कानूनी पेंच सुलझाना बड़ी चुनौती होगी।

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