केंद्रीय जांच ब्यूरो ने देशव्यापी साइबर अपराध के खिलाफ अपनी मुहिम तेज करते हुए डिजिटल अरेस्ट के एक बड़े मामले में पांच और लोगों को धर दबोचा है। यह पूरा प्रकरण झुंझुनूं जिले के पिलानी स्थित प्रतिष्ठित संस्थान बिट्स की एक महिला प्रोफेसर श्रीजाता डे के साथ हुई भारी-भरकम धोखाधड़ी से जुड़ा हुआ है। अपराधियों ने खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसियों का अधिकारी बताते हुए प्रोफेसर को मानसिक रूप से इस कदर डराया कि वह लगभग तीन महीने तक उनके डिजिटल शिकंजे में कैद रहीं। इस दौरान डरा-धमकाकर जालसाजों ने उनसे कुल 7.67 करोड़ रुपये की भारी-भरकम रकम ऐंठ ली।
महिला प्रोफेसर को वीडियो कॉल पर रखा निगरानी में
जांच एजेंसी के अनुसार, इस शातिर गिरोह ने प्रोफेसर को कानूनी उलझनों और गिरफ्तारी का भय दिखाकर पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया था। उन्हें लगातार वीडियो कॉल और विभिन्न डिजिटल माध्यमों से जोड़ा गया ताकि वे किसी से संपर्क न कर सकें। अपराधियों ने विभिन्न बैंक खातों के जरिए यह पूरी रकम ट्रांसफर कराई। इस सुनियोजित ठगी का दायरा केवल एक राज्य तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार देश के कई हिस्सों से जुड़े हुए थे।
देशभर में चलाए गए थे बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान
इस बड़े साइबर सिंडिकेट की गहराई तक पहुंचने के लिए केंद्रीय एजेंसी ने हाल ही में देश के 20 राज्यों में कुल 89 ठिकानों पर एक साथ ताबड़तोड़ छापेमारी की थी। ऑपरेशन चक्र-VI के अंतर्गत की गई इस कार्रवाई में पिलानी के अलावा गुजरात और कर्नाटक से जुड़े अन्य मामले भी शामिल थे। इस राष्ट्रव्यापी अभियान से पहले एजेंसी ने इस मामले में आकाश, राजा करमाकर और ज्योति रानी को गिरफ्तार किया था। अब इस कड़ी में पांच और नए नाम जुड़ गए हैं।
हाल ही में हुई गिरफ्तारियों का विवरण
ताजा कार्रवाई के तहत केंद्रीय एजेंसी ने मध्य प्रदेश के इटारसी निवासी संकेत बस्तवार और पंकज दमाड़े को दबोचा है। इसके अलावा तीन अन्य आरोपियों में आरिफ उर्फ किंग भाई, हरीश पुरुषोत्तम यादव उर्फ हैरी और शशांक सिंह उर्फ रवि शामिल हैं। जांच अधिकारियों के मुताबिक, पकड़े गए इन नए आरोपियों का काम ठगी की रकम को ठिकाने लगाना और उसे वैध रूप देना था।
बैंक खातों की व्यवस्था और पैसों की लेयरिंग का खेल
प्राथमिक जांच में यह बात सामने आई है कि संकेत बस्तवार और पंकज दमाड़े ने अवैध रकम को प्राप्त करने के लिए बैंक खाते मुहैया कराए थे और पैसों की आवाजाही को छिपाने में मदद की थी। वहीं दूसरी तरफ, आरिफ, हरीश यादव और शशांक सिंह फर्जी खातों की व्यवस्था करने और उनमें आने वाले पैसों की लेयरिंग करने का काम संभाल रहे थे। जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि आरोपियों ने खाताधारकों के मोबाइल फोनों में एपीके फाइलें डाउनलोड करवाई थीं। इन मैलवेयर फाइलों के जरिए बैंक से आने वाले एसएमएस अलर्ट को बीच में ही रोक लिया जाता था, जिससे खातों का संचालन दूर बैठे साइबर अपराधी आसानी से कर पाते थे। अब एजेंसी इस बात की गहराई से छानबीन कर रही है कि प्रोफेसर से लूटी गई पूरी राशि को किन-किन अंतिम खातों में भेजा गया और इस पूरे सिंडिकेट में और कौन-कौन लोग शामिल हैं।





















