बिहार के समस्तीपुर जिले में बाढ़ ने आम जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। मोहनपुर इलाके में हालात इस हद तक गंभीर हो चुके हैं कि लोगों के आशियाने पानी में डूब गए हैं और परिवारों के सामने सिर छिपाने का संकट खड़ा हो गया है। घरों के भीतर चूल्हे और जरूरी सामान जलमग्न होने के कारण लोगों को सुरक्षित ठिकानों की तलाश में अपने घर छोड़ने पड़े हैं। बाढ़ की विभीषणता ने कई परिवारों को दाने-दाने के लिए मोहताज कर दिया है और उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह थम गई है।
घर की छत तक पहुंचा पानी और गर्भवती की चिंता
स्थानीय निवासी शोखसंवती देवी ने अपने इलाके के हालात बयां करते हुए बताया कि उनके घर की स्थिति बेहद दयनीय हो चुकी है और चारों तरफ पानी ही पानी नजर आ रहा है। उनके घर में एक गर्भवती बहू भी है, जिसकी सेहत को लेकर परिवार की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। गांव के भीतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध न होने के कारण इस संकट के समय में उनकी मुश्किलें और अधिक बढ़ गई हैं। परिवार के कुछ सदस्य अब भी पानी के बीच फंसे हुए हैं, जबकि कुछ लोगों को राज्य आपदा मोचन बल यानी SDRF की मदद से सुरक्षित बाहर निकाला जा सका है। उन्हें अपने घरों में कई दिनों तक चौकी और मचान के सहारे वक्त गुजारना पड़ा। रात के अंधेरे में डर और अनिश्चितता का माहौल और गहरा जाता है, क्योंकि न तो खाना पकाने के लिए कोई जगह बची है और न ही सामान्य जीवन जीने का कोई अन्य साधन बचा है।
सड़क किनारे बसाई झोपड़ियां और भोजन का संकट
अपने घरों से बेघर हुए लोग अब ऊंची सड़कों और उनके डिवाइडर के आसपास प्लास्टिक व तिरपाल डालकर अस्थायी झोपड़ियां बनाने को मजबूर हैं। हालांकि उन्हें सिर छिपाने की एक मामूली जगह तो मिल गई है, लेकिन जीवन की बुनियादी जरूरतें आज भी एक बड़ा और अनुत्तरित सवाल बनी हुई हैं। सुमन देवी ने इस आपदा को लेकर कहा कि इस बार की बाढ़ ने लोगों को ऐसा जख्म दिया है जिसे वे कभी नहीं भूल पाएंगे। उनके अनुसार सबसे बड़ी समस्या खाने-पीने की चीजों को लेकर आ रही है। सामुदायिक रसोई से मिलने वाला भोजन भी समय पर नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि कई बार रात को नौ बजे के आसपास खाना मिलता है और फिर अगली सुबह बहुत देर से भोजन नसीब होता है। छोटे-छोटे बच्चों के लिए इतनी लंबी भूख सहन करना और भी कठिन हो जाता है। इसके अलावा जलाने के लिए लकड़ी या गैस सिलेंडर न होने के कारण सड़क किनारे चूल्हा जलाना नामुमकिन साबित हो रहा है। पीने के साफ पानी का भी भारी अभाव है और लोगों को मजबूरी में गंगा नदी के पानी पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है। इसके साथ ही महिलाओं के लिए खुले में शौच जाना पड़ रहा है, जो उनकी गरिमा और सुरक्षा के लिहाज से एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया है।
पांच फीट पानी में डूबे मकान और मवेशियों का चारा
मटियोर गांव की रहने वाली पार्वती देवी की आपबीती भी इससे अलग नहीं है। उनका कहना है कि इंसान के लिए अपने घर जैसा सुरक्षित और सुकूनदायक स्थान दुनिया में कोई दूसरा नहीं होता, लेकिन इस प्राकृतिक आपदा ने उन्हें अपना आशियाना छोड़कर खुले आसमान के नीचे शरण लेने पर मजबूर कर दिया है। उनके घर के अंदर पांच फीट से भी अधिक पानी भरा हुआ है, जो किसी की भी जान के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। घर छोड़कर सड़क के किनारे दिन गुजारने वाली पार्वती देवी भी सामुदायिक लंगर पर ही पूरी तरह आश्रित हैं। वहां भी भोजन मिलने में भारी देरी होती है और सुबह काफी इंतजार के बाद भी लोगों को खाली हाथ बैठना पड़ता है। इंसानों की भूख के अलावा उन्हें अपने मवेशियों की भी गहरी चिंता सता रही है। बाढ़ के पानी में खेतों और मैदानों का सारा हरा चारा डूब चुका है, जिसके कारण उनके पालतू पशुओं के सामने भी भुखमरी जैसी स्थिति पैदा हो गई है।



















