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छत्तीसगढ़ के सरगुजा में बूढ़ा नाग धाम से जुड़ी रहस्यमयी लोककथाएं, बारिश में बाजे की आवाज और जलपरी का अनोखा रहस्यछत्तीसगढ़
9 सित॰ 2026, 10:33 am (16 दिन पहले)· 2

छत्तीसगढ़ के सरगुजा में बूढ़ा नाग धाम से जुड़ी रहस्यमयी लोककथाएं, बारिश में बाजे की आवाज और जलपरी का अनोखा रहस्य

सरगुजा के परपटिया में स्थित बूढ़ा नाग स्थल पर बारिश के दौरान सुरीले बाजों की आवाजें और नथुनी वाली मछली की कहानियां प्रचलित हैं। जानिए इस पवित्र स्थान की 5 किलोमीटर लंबी गुप्त सुरंग और जलपरी से जुड़ी रहस्यमयी लोककथाओं के बारे में।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित परपटिया का ग्रामीण क्षेत्र अपनी अनूठी लोकमान्यताओं और पौराणिक कथाओं के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र में एक विशेष स्थान है जिसे पर्यटक जलपरी स्थल के रूप में पहचानते हैं, जबकि स्थानीय आदिवासी समुदाय इसे बाबा बूढ़ा नाग के नाम से पूजता है। देखने में यह स्थल एक मनमोहक छोटे झरने जैसा नजर आता है, लेकिन इसके साथ सदियों पुराना इतिहास और कई तरह के अद्भुत रहस्य जुड़े हुए हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इन मान्यताओं ने इस स्थल को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है।

बारिश के मौसम में गूंजती रहस्यमयी संगीत की आवाजें

बूढ़ा नाग स्थल से जुड़ी सबसे प्रमुख मान्यताओं में से एक बारिश के मौसम से संबंधित है। गांव के निवासी नरेश पटेल के अनुसार, वर्षा काल के दौरान यहां नाग और नागिन के एकत्र होने तथा आपस में विचार-विमर्श करने की परंपरा मानी जाती है। इसी दौरान इस पूरे परिसर के आसपास विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों की ध्वनियां सुनाई देती हैं। रात के समय यहां आने वाले लोगों को कभी घसिया बाजा, कभी शहनाई तो कभी पारंपरिक बैंड-बाजे जैसी सुरीली आवाजें स्पष्ट रूप से सुनाई देती हैं। नरेश पटेल का कहना है कि यह अनुभव अत्यंत दिव्य है और इसे रात के समय स्वयं महसूस किया जा सकता है।

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स्थानीय जनजातीय समाज में बूढ़ा नाग की पूजा और मान्यता कई सौ वर्ष पुरानी है। बुजुर्गों से सुनी कहानियों को आज भी ग्रामीण बड़ी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। नरेश पटेल बताते हैं कि उनके पूर्वज भी इन ध्वनियों और मान्यताओं की पुष्टि करते आए हैं, जिससे इस परंपरा की जड़ें क्षेत्र में बहुत गहरी जमा चुकी हैं।

5 किलोमीटर लंबी गुप्त सुरंग और बांसेन देव से जुड़ा संबंध

इस पावन स्थल से जुड़ी एक अन्य प्रमुख लोककथा जमीन के नीचे बनी एक लंबी सुरंग से संबंधित है। मान्यताओं के अनुसार, बूढ़ा नाग स्थल से लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित बांसेन देव तक एक गुप्त भूमिगत मार्ग बना हुआ है। प्राचीन काल में स्थानीय बैगा और गांव के जानकार लोग इस सुरंग से जुड़ी अनेक घटनाएं और संस्मरण सुनाया करते थे। यद्यपि इस 5 किलोमीटर लंबी सुरंग का कोई आधुनिक वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है, फिर भी स्थानीय जनमानस में इस कथा की स्वीकार्यता आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है।

नथुनी वाली मछली और जलपरी की अनोखी आकृतियां

झरने के जलप्रपात क्षेत्र से जुड़ी एक और दिलचस्प कहानी नथुनी वाली मछली और जलपरी की उपस्थिति से संबंधित है। ग्रामीणों का दावा है कि दोपहर के समय जब सूर्य का प्रकाश पानी पर पड़ता है, तब जल में एक विशिष्ट आकृति उभरती है जिसे स्थानीय लोग जलपरी की संज्ञा देते हैं। नरेश पटेल के अनुसार, गांव के कई लोगों ने दोपहर के वक्त इस जलपरी जैसी आकृति को स्वयं देखा है। इसके साथ ही, जल क्षेत्र में नथुनी पहनी हुई मछली की पौराणिक कथा भी प्रचलित है, जो पर्यटकों और श्रद्धालुओं के कौतूहल को और बढ़ा देती है।

सवाल-जवाब

सरगुजा का बूढ़ा नाग स्थल कहाँ स्थित है?
यह पावन स्थल छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंतर्गत आने वाले परपटिया ग्रामीण क्षेत्र में स्थित है।
बारिश के दौरान बूढ़ा नाग स्थल पर क्या मान्यता प्रचलित है?
मान्यता है कि बारिश में नाग-नागिन एकत्र होते हैं और परिसर में घसिया बाजा, शहनाई तथा बैंड-बाजे जैसी रहस्यमयी संगीत की आवाजें सुनाई देती हैं।
बांसेन देव और बूढ़ा नाग के बीच सुरंग की लंबाई कितनी बताई जाती है?
स्थानीय लोककथाओं के अनुसार बूढ़ा नाग और 5 किलोमीटर दूर स्थित बांसेन देव के बीच जमीन के अंदर एक गुप्त रास्ता बना हुआ है।
दोपहर के समय झरने के जल में ग्रामीणों को क्या दिखाई देने का दावा है?
ग्रामीणों का दावा है कि दोपहर के समय जल में एक विशिष्ट आकृति दिखाई देती है जिसे वे जलपरी की संज्ञा देते हैं।
इन मान्यताओं की जानकारी किसने साझा की है?
परपटिया गांव के निवासी नरेश पटेल ने अपने बुजुर्गों से सुनी इन पौराणिक मान्यताओं और घटनाओं के बारे में जानकारी दी है।
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