पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में गणेश पूजा के एक भव्य आयोजन के दौरान राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी जब पारंपरिक बंगाली लिबास यानी धोती-कुर्ता और शॉल पहनकर पूजा का उद्घाटन करने पहुंचे, तो पूरा पंडाल सनातन संस्कृति के नारों से गूंज उठा। इस कार्यक्रम में उनका पारंपरिक अंदाज सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है और इसके जरिए राजनीतिक गलियारों में एक नया संदेश गया है।
बदलते माहौल में गणेश उत्सव की वापसी
कोलकाता में आयोजित इस गणेशोत्सव में लोगों का भारी उत्साह देखने को मिला। जानकारों का मानना है कि पिछले कई वर्षों से बंगाल में धार्मिक आयोजनों और विशेषकर दुर्गा पूजा के दौरान पाबंदियों और विवादों का माहौल रहता था। लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद अब स्थिति बदलती नजर आ रही है। मुख्यमंत्री और उनके सहयोगियों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस के कार्यकाल में राज्य की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को राजनीति के घेरे में जकड़ दिया गया था, जिससे अब उन्हें मुक्ति मिल रही है।
तुष्टिकरण के आरोपों पर सियासत
गणेश पूजा के मंच से दिए गए संबोधन में सुवेंदु अधिकारी ने पूर्ववर्ती सरकार के दौरान हुए कथित तुष्टिकरण पर खुलकर बात की। बंगाल में पिछले डेढ़ दशक के दौरान मूर्ति विसर्जन और धार्मिक जुलूसों को लेकर कई तरह की प्रशासनिक अड़चनें देखने को मिलती रही हैं। मुहर्रम के आयोजनों के चलते कई बार दुर्गा पूजा के विसर्जन पर समय सीमा तय की जाती थी या रोक लगाई जाती थी। अब बिना किसी सरकारी दबाव के लोगों को अपने पर्व मनाने की पूरी स्वतंत्रता मिलने की बात कही जा रही है। इस कार्यक्रम का एक वीडियो PTI News के सोशल मीडिया हैंडल पर भी साझा किया गया है।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान की ओर कदम
पूर्ववर्ती शासन के दौर में रामनवमी, हनुमान जयंती और गणेश पूजा जैसे पर्वों के जुलूसों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और मामलों का सामना करना पड़ता था। इसके उलट, भारत सेवाश्रम संघ जैसे सामाजिक और धार्मिक संगठनों को मिल रहा खुला समर्थन बंगाल में एक नए सांस्कृतिक दौर का संकेत दे रहा है। आयोजकों का मानना है कि पहले एक खास वर्ग को साधने के लिए बहुसंख्यक समाज के आयोजनों को नजरअंदाज किया जाता था, जो अब बदल रहा है।
आगामी दुर्गा पूजा को लेकर बड़े संकेत
गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर जनसमूह को संबोधित करते हुए सुवेंदु अधिकारी ने आगामी पर्वों को लेकर बड़ी बात कही। उन्होंने साफ किया कि जनता अब डर के माहौल से बाहर आ चुकी है। इस संदर्भ में उन्होंने आने वाली दुर्गा पूजा का जिक्र करते हुए कहा कि इस बार का यह उत्सव केवल एक साधारण त्योहार नहीं होगा, बल्कि यह बंगाल की संस्कृति और सनातन मूल्यों की जीत का प्रतीक बनेगा। जनता ने अपनी परंपराओं को बचाने के लिए लंबा संघर्ष किया है।
बंगाली अस्मिता और राजनीतिक संदेश
तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से राजनीतिक विरोधियों पर बाहरी होने का आरोप लगाती रही है और ममता बनर्जी खुद को बंगाल की बेटी बताती आई हैं। ऐसे में सुवेंदु अधिकारी का ठेठ बंगाली वेशभूषा में मंच पर आना इस राजनीतिक नैरेटिव का सीधा जवाब माना जा रहा है। वे खुद को राज्य की मिट्टी से जुड़ा नेता साबित कर रहे हैं जो स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर और स्वामी प्रणवानंद के मार्ग पर चलने की बात करते हैं।
आगामी राजनीतिक रणभूमि
कोलकाता के प्रतिष्ठित संस्थान में आयोजित इस कार्यक्रम से यह साफ हो गया है कि आने वाले समय में होने वाले धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन केवल आस्था तक सीमित नहीं रहेंगे। ये आयोजन राज्य के राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने में भी बड़ी भूमिका निभाएंगे और आने वाले उत्सव राज्य की राजनीति का नया केंद्र बनेंगे।
















