भीलवाड़ा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रस्तावित नियमों को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ये नियम केवल एक प्रस्ताव के रूप में हैं और इनका कानून बनना तय नहीं है। राजस्थान समेत पूरे देश में इन प्रस्तावित संशोधनों को लेकर काफी हलचल और विरोध देखने को मिल रहा है।
भीलवाड़ा में जैन संत से मुलाकात
सोमवार को राजस्थान के भीलवाड़ा शहर में मोहन भागवत ने जैन संत आचार्य पुलकसागर महाराज से शिष्टाचार भेंट की। दोनों के बीच यह बैठक लगभग 40 मिनट तक चली, जिसमें उच्च शिक्षण संस्थानों से जुड़े इन नए प्रावधानों के अलावा देश की सामाजिक समरसता और जाति व्यवस्था जैसे गंभीर विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।
कानून न बनने का दिया आश्वासन
इस मुलाकात के दौरान आचार्य पुलकसागर महाराज ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इन प्रस्तावित नियमों का विशेष रूप से मुद्दा उठाया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मोहन भागवत ने उन्हें आश्वस्त किया कि वर्तमान स्थिति में यह केवल एक प्रस्ताव भर है जिसे अभी तक पारित नहीं किया गया है। उन्होंने दो टूक कहा कि न तो यह कानून का रूप ले चुका है और न ही भविष्य में ऐसा होगा।
क्या हैं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रस्तावित नियम
गौरतलब है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में किसी भी प्रकार के भेदभाव पर रोक लगाने के उद्देश्य से नए प्रावधान तैयार किए थे। इन बदलावों का मुख्य लक्ष्य कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के परिसरों में जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान या अन्य किसी भी आधार पर होने वाले पक्षपात को पूरी तरह समाप्त करना है। इसके साथ ही इसका उद्देश्य छात्रों की शिकायतों के निवारण तंत्र को अधिक मजबूत बनाना भी था।
क्यों मचा हुआ है देश भर में बवाल
इन नियमों के सामने आते ही देश भर के शिक्षण जगत और विभिन्न संगठनों के बीच तीखा विवाद खड़ा हो गया। कई संगठनों का यह गंभीर आरोप रहा है कि सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के हितों की रक्षा और उनकी शिकायतों के निस्तारण को लेकर प्रावधानों में स्पष्टता का अभाव है। आलोचकों को इस बात का भी अंदेशा सता रहा है कि इन नियमों की आड़ में शिक्षण संस्थानों में झूठी या निराधार शिकायतें दर्ज कराने का सिलसिला शुरू हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
इन नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा और शिकायतों की पूरी प्रक्रिया को लेकर कई तरह के सवाल खड़े किए गए। यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा, जहाँ अदालत ने शुरुआती सुनवाई में इन नियमों के कई हिस्सों को अस्पष्ट करार दिया और इनके कार्यान्वयन पर फिलहाल रोक लगा दी। इस अदालती हस्तक्षेप के बाद केंद्र सरकार ने भी इन प्रावधानों पर फिर से विचार करने की बात कही है।



















