महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने भारत निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक विस्तृत बयान जारी करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता अब सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा व्यवस्था में संस्थागत फैसलों को एकतरफा रूप से प्रभावित किया जा रहा है, जिससे निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया की बुनियाद कमजोर हो रही है।
आयोग के भीतर असहमति और दरकिनार किए जाने का आरोप
राज ठाकरे ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि निर्वाचन सदन के भीतर तीन में से दो चुनाव आयुक्तों की चिंताओं को नजरअंदाज किया जाना बेहद गंभीर मामला है। उनका कहना था कि चुनाव आयुक्त संधू और जोशी द्वारा आधिकारिक फाइलों पर दर्ज की गई आपत्तियां साफ इशारा करती हैं कि महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों में पूरे आयोग की सहमति नहीं ली गई। ठाकरे के अनुसार, जब शीर्ष स्तर पर ही सदस्यों को अंधेरे में रखकर फैसले लिए जाते हैं, तो मतदाता सूचियों में मनमाने बदलाव और प्रबंधन की विश्वसनीयता पर स्वाभाविक रूप से गहरे संदेह खड़े होते हैं।
पश्चिम बंगाल और गोवा के मामलों का हवाला
विशिष्ट घटनाक्रमों को रेखांकित करते हुए मनसे प्रमुख ने मतदाता सूची सॉफ्टवेयर में फेरबदल और कानूनी प्रक्रियाओं में बदलाव का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि पश्चिम बंगाल से जुड़ी 16.1 लाख अपीलों जैसे भारी भरकम कानूनी मामलों और नियमों में संशोधन के निर्देश पूरे आयोग की आधिकारिक सहमति के बिना कैसे जारी किए गए। इसके अतिरिक्त, उन्होंने गोवा का उदाहरण सामने रखा, जहां तकनीकी खराबी आने के कारण 97 प्रमाणित मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने से वंचित रह गए थे। ठाकरे ने इन उदाहरणों को केंद्रीकृत नियंत्रण और चुनावी तंत्र में हस्तक्षेप का प्रमाण बताया।
विपक्ष से एकजुटता और बैलेट पेपर की वापसी की अपील
आयोग की फाइलों पर अपनी असहमति दर्ज करने वाले दोनों आयुक्तों के कदम का स्वागत करते हुए ठाकरे ने देश के सभी विपक्षी दलों से अपील की कि वे इस मुद्दे पर एकजुट हों। उनका कहना था कि चुनावी गड़बड़ियों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी जनआंदोलन की आवश्यकता है। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल को बंद कर पारंपरिक मतपत्र यानी पेपर बैलेट व्यवस्था को फिर से लागू करने की मांग दोहराई।
इस्तीफे और उच्चस्तरीय जांच की मांग
मनसे नेता ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल त्यागपत्र की मांग की। साथ ही, उन्होंने यह भी आग्रह किया कि आयोग के कामकाज को पर्दे के पीछे से निर्देशित करने वाले कथित तत्वों की उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। ठाकरे ने कहा कि निष्पक्षता से समझौते के माहौल में चुनी गई सत्ता को भी पद छोड़ना चाहिए। उन्होंने टिप्पणी की कि किसी सरकार के निर्वाचन के बाद सड़कों पर जनता के बीच उत्साह या जश्न की कमी बहुत कुछ बयां करती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक निर्वाचन आयोग पूरी तरह स्वायत्त नहीं होगा, लोकतांत्रिक प्रक्रिया की साख बहाल नहीं हो सकती।
चुनावी नतीजों और लोकतांत्रिक चुनौती पर दो टूक
सार्वजनिक सभाओं में भारी जनसमर्थन मिलने के बावजूद चुनावों में सीटें न जीत पाने के राजनीतिक विश्लेषकों के पुराने सवालों का उल्लेख करते हुए राज ठाकरे ने कहा कि आयोग के भीतर से सामने आ रही बातें यह स्पष्ट करती हैं कि जनादेश कैसे प्रभावित होता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि संस्थागत निष्पक्षता को समय रहते पुनर्स्थापित नहीं किया गया, तो देश में लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धाओं का ढांचा स्थायी रूप से कमजोर हो जाएगा।


















