दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत को अवैध ठहराने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। हाईकोर्ट ने न केवल छात्रा की लगभग पांच महीने की हिरासत को कानूनन गलत माना था, बल्कि पीड़ित छात्रा के पक्ष में 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश भी दिया था। विशेष बात यह है कि अदालत ने यह वित्तीय जुर्माना सरकारी खजाने पर डालने के बजाय डीएम समेत संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की व्यक्तिगत सैलरी से वसूलने के कड़े निर्देश दिए थे।
नोएडा प्रदर्शन से एनएसए हिरासत तक का पूरा घटनाक्रम
यह पूरा प्रकरण नोएडा क्षेत्र में आयोजित एक विरोध प्रदर्शन से शुरू हुआ था, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी को नामजद करते हुए कड़े कानून एनएसए के तहत हिरासत में लिया गया था। इस निरुद्धता के कारण आकृति चौधरी को लगभग पांच महीने तक हिरासत में रहना पड़ा। बाद में इस फैसले को कानूनी तौर पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद 2 सितंबर को हाईकोर्ट की बेंच ने अपना फैसला सुनाते हुए एनएसए के तहत की गई कार्रवाई को पूरी तरह से गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित कर दिया था।
अधिकारियों के आचरण पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और मुआवजे का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सितंबर को दिए अपने फैसले में प्रशासनिक अधिकारियों के आचरण और प्रक्रियात्मक कमियों पर बेहद सख्त टिप्पणियां की थीं। अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था कि किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को इस प्रकार प्रशासनिक अधिकारों के दुरुपयोग के जरिए बाधित नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि गैरकानूनी हिरासत के लिए जिम्मेदार अफसरों को ही इसका वित्तीय बोझ उठाना होगा। इसी मंशा से कोर्ट ने 5 लाख रुपये का मुआवजा तय किया और इसे दोषी पाए गए अधिकारियों की मासिक सैलरी से काटने का निर्देश जारी किया था।
सुप्रीम कोर्ट अपील पर सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास का तीखा हमला
नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम द्वारा हाईकोर्ट के इस आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर किए जाने के बाद राजनीतिक विवाद गहरा गया है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रवक्ता सौरव दास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराते हुए प्रशासनिक कदम का कड़ा विरोध किया। दास ने कहा कि इतने गंभीर और स्पष्ट अदालती फैसले के बाद भी जिलाधिकारी द्वारा ऊपरी अदालत में अपील दायर करना उनके निरंकुश रवैये को उजागर करता है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हर्जाने की राशि को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर देना चाहिए।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का रुख और सुप्रीम कोर्ट में भावी सुनवाई
शीर्ष अदालत में इस मामले का पहुंचना पहले से तय माना जा रहा था, क्योंकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी पहले ही संकेत दिए थे कि हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ अपील की जाएगी। अब जब मेधा रूपम ने आधिकारिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी है, तब कानूनी बहस इस बिंदु पर केंद्रित होगी कि क्या प्रशासनिक अधिकारियों पर व्यक्तिगत रूप से जुर्माना लगाना उचित है। पूरे देश की नजरें अब सर्वोच्च अदालत के आने वाले रुख पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि हाईकोर्ट द्वारा अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही और सैलरी से कटौती के दिए गए आदेश पर रोक लगती है या उसे कायम रखा जाता है।



















