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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र राजनीति की अंदरूनी हकीकत, जानें प्रमुख संस्थान क्यों नहीं लड़ते केंद्रीय पैनल का मुकाबलादिल्ली
20 सित॰ 2026, 12:58 pm (40 दिन पहले)· 2

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र राजनीति की अंदरूनी हकीकत, जानें प्रमुख संस्थान क्यों नहीं लड़ते केंद्रीय पैनल का मुकाबला

दिल्ली विश्वविद्यालय के सालाना छात्र संघ चुनावों में हर कॉलेज भागीदारी नहीं करता। सेंट स्टीफेंस और लेडी श्रीराम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान प्रशासनिक स्वायत्तता और आंतरिक छात्र परिषदों के कारण इस प्रक्रिया से अलग रहते हैं।

देश की राजधानी में उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाने वाला दिल्ली विश्वविद्यालय हर साल सितंबर के महीने में जबर्दस्त चुनावी सरगर्मी का गवाह बनता है। चारों तरफ लगे पर्चे, दीवारों पर चस्पा प्रचार सामग्री और छात्र संगठनों के जोशीले नारों के बीच होने वाला यह मुकाबला किसी आम कॉलेज स्तर की गतिविधि जैसा बिल्कुल नजर नहीं आता। छात्र संघ के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव जैसे शीर्ष चार पदों पर कब्जा जमाने के लिए चलने वाली यह होड़ राष्ट्रीय स्तर के आम चुनावों जैसा माहौल तैयार कर देती है।

आम तौर पर परिसर से बाहर रहने वाले लोगों को लगता है कि विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त हर कॉलेज और संकाय इस लोकतांत्रिक महासमर का हिस्सा बनता है। वास्तविकता इससे एकदम जुदा है, क्योंकि इस विश्वविद्यालय का प्रशासनिक ताना-बाना बेहद व्यापक होने के साथ-साथ काफी पेचीदा भी है। दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में फैले दर्जनों महाविद्यालयों, नॉर्थ कैंपस, साउथ कैंपस और केंद्रीय परिसरों में से केवल एक निश्चित वर्ग ही केंद्रीय छात्र संघ की चुनावी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। कई नामी संस्थान इस पूरी प्रक्रिया से पूरी तरह किनारा कर अपनी स्वतंत्र व्यवस्था का संचालन करते हैं।

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केंद्रीय छात्र संघ मुकाबले में उतरने वाले प्रमुख संस्थान

विश्वविद्यालय का केंद्रीय छात्र संघ ढांचा मुख्य रूप से उन नियमित और गैर-व्यावसायिक महाविद्यालयों का साझा मंच है जो मुख्यधारा की शैक्षणिक व्यवस्था के तहत काम करते हैं। नॉर्थ और साउथ कैंपस के कई ऐतिहासिक संस्थान इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मुख्य रीढ़ माने जाते हैं।

इनमें शामिल प्रमुख संस्थानों की सूची इस प्रकार है

  • उत्तरी और दक्षिणी परिसर के संस्थान: हिंदू कॉलेज, हंसराज कॉलेज, किरोड़ीमल कॉलेज, रामजस कॉलेज, मिरांडा हाउस और दौलत राम कॉलेज जैसे जाने-माने संस्थान हर साल इस चुनावी समर में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। इसी क्रम में साउथ कैंपस के श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज और देशबंधु कॉलेज भी केंद्रीय पैनल के लिए अपनी मजबूत भागीदारी दर्ज कराते हैं।
  • मताधिकार का दायरा: इन सभी संस्थानों के पहले और दूसरे वर्ष में नियमित पढ़ाई करने वाले पंजीकृत छात्र केंद्रीय पैनल के चारों प्रमुख पदों के चुनाव में अपने वोट का प्रयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त कला संकाय, विज्ञान संकाय और सामाजिक विज्ञान संकाय के विभिन्न स्नातकोत्तर विभागों के नियमित अध्येता भी इस मतदान में हिस्सा लेते हैं।

कुछ नामी संस्थानों के चुनावी दौड़ से अलग रहने की वजहें

पूरे परिसर में जब चुनावी बिगुल बजता है, तब कुछ सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज पूरी तरह शांत और अपनी सामान्य शैक्षणिक दिनचर्या में लीन नजर आते हैं। इसके पीछे कई गंभीर प्रशासनिक, संरचनात्मक और नीतिगत कारण मौजूद हैं।

इन संस्थानों के दूर रहने के प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं

  • अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वायत्तता: सेंट स्टीफेंस कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थान अपनी प्रशासनिक स्वायत्तता और विशेष आंतरिक नियमों के संरक्षण के लिए केंद्रीय राजनीति से पूरी दूरी बनाकर रखते हैं। सिख अल्पसंख्यक प्रबंधन समितियों के अधीन संचालित होने वाले संस्थान भी अपनी गवर्निंग बॉडी के निर्धारित नियमों और अपनी आंतरिक छात्र परिषदों को ही प्राथमिकता देते हैं।
  • महिला कॉलेज और आंतरिक छात्र परिषद: लेडी श्रीराम कॉलेज जैसे प्रमुख महिला संस्थान भारी खर्च और तीखे राजनीतिक टकराव वाली केंद्रीय व्यवस्था के बजाय अपनी आंतरिक छात्र परिषदों को तरजीह देते हैं। उनका मानना है कि कॉलेज स्तर की लोकतांत्रिक बहसों और परिषदों से परिसर का शांत, सुरक्षित और अकादमिक माहौल बिना किसी व्यवधान के कायम रहता है।
  • चिकित्सा और तकनीकी संस्थान: मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज, यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज और फैकल्टी ऑफ टेक्नोलॉजी जैसे विशिष्ट संस्थान अपने अलग पेशेवर संगठनों और कड़े अकादमिक नियमों के तहत संचालित होते हैं। इन संस्थानों का प्राथमिक ध्यान पेशेवर प्रशिक्षण पर केंद्रित रहने के कारण वे सामान्य छात्र राजनीति की खींचतान से अलग रहते हैं।
  • दूरस्थ शिक्षा के छात्र: स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग से ताल्लुक रखने वाले छात्र विश्वविद्यालय के कुल नामांकन का एक विशाल हिस्सा तैयार करते हैं। इसके बावजूद पत्राचार और गैर-नियमित माध्यम से अध्ययन करने की वजह से इन लाखों विद्यार्थियों को केंद्रीय पैनल के लिए मतदान करने या उम्मीदवार के रूप में खड़े होने की अनुमति नहीं मिलती है।

सवाल-जवाब

डूसू के केंद्रीय पैनल में कौन-कौन से मुख्य पद शामिल होते हैं?
केंद्रीय पैनल के लिए मुख्य रूप से चार पदों पर चुनाव लड़ा जाता है, जिनमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव शामिल हैं।
किन नियमित कॉलेजों के छात्र डूसू चुनाव में मतदान करते हैं?
हिंदू कॉलेज, हंसराज कॉलेज, किरोड़ीमल कॉलेज, रामजस कॉलेज, मिरांडा हाउस, दौलत राम कॉलेज, श्री वेंकटेश्वर कॉलेज, आत्मा राम सनातन धर्म कॉलेज और देशबंधु कॉलेज के नियमित छात्र मतदान में भाग लेते हैं।
सेंट स्टीफेंस कॉलेज केंद्रीय छात्र संघ चुनावों में क्यों नहीं शामिल होता?
अल्पसंख्यक संस्थान होने के नाते सेंट स्टीफेंस कॉलेज अपनी प्रशासनिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए केंद्रीय चुनावी राजनीति से दूरी बनाकर रखता है।
लेडी श्रीराम कॉलेज चुनाव के लिए कौन सी वैकल्पिक व्यवस्था अपनाता है?
लेडी श्रीराम कॉलेज अत्यधिक खर्चीली केंद्रीय राजनीति के बजाय परिसर में पढ़ाई का शांत माहौल रखने के लिए अपनी आंतरिक छात्र परिषद का चुनाव कराता है।
क्या स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग के छात्रों को डूसू चुनाव में वोट डालने का अधिकार है?
नहीं, पत्राचार और दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से पढ़ाई करने के कारण इन छात्रों को केंद्रीय छात्र संघ चुनाव में मतदान का अधिकार नहीं मिलता है।
मेडिकल और तकनीकी संस्थान इस चुनावी प्रक्रिया से अलग क्यों रहते हैं?
मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज और फैकल्टी ऑफ टेक्नोलॉजी जैसे संस्थान अपने विशिष्ट पेशेवर संघों और कड़े अकादमिक नियमों के कारण मुख्यधारा की छात्र राजनीति से अलग रहते हैं।
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टिप्पणियाँ 5

Kavya Nair@kavya-nair·39 दिन पहले

दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति केवल सत्ता का मुकाबला नहीं, बल्कि राजधानी के कैंपस कल्चर और युवा जीवनशैली को तय करने वाला एक बड़ा सांस्कृतिक ढांचा है। नॉर्थ और साउथ कैंपस का यह चुनावी माहौल जहाँ युवाओं की सक्रियता, नेटवर्किंग और जीवंत परिसर अनुभव को बढ़ावा देता है, वहीं स्वायत्त संस्थानों का अलग रहना शैक्षणिक शांति और विशिष्ट कॉलेज संस्कृति को बनाए रखता है। विविधता से भरा यह ढांचा दिखाता है कि एक ही विश्वविद्यालय के भीतर छात्र जीवन के दो बिल्कुल अलग अनुभव और जीवनशैली पैटर्न किस तरह एक साथ अस्तित्व में बने हुए हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·39 दिन पहले

छात्र राजनीति केवल परिसर तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीति के लिए एक नर्सरी का काम करती है। दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय पैनल से कुछ शीर्ष और स्वायत्त संस्थानों का बाहर रहना इस बात को रेखांकित करता है कि प्रशासनिक स्वायत्तता और दलीय राजनीति के बीच का संतुलन कितना संवेदनशील है। जब प्रमुख कॉलेज अपनी आंतरिक व्यवस्था को प्राथमिकता देते हैं, तो इससे केंद्रीय छात्र संघ के प्रतिनिधित्व और समावेशिता पर असर पड़ता है। भविष्य में नीतिगत स्तर पर छात्र निकायों के पुनर्गठन और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के एकीकरण पर बहस और तेज़ हो सकती है।

Vikram Yadav@vikram-yadav·39 दिन पहले

स्वायत्त संस्थानों के केंद्रीय छात्र संघ से अलग रहने का सीधा असर चुनावी विमर्श की गुणवत्ता पर पड़ता है। इससे केंद्रीय पैनल का चुनाव कई बार केवल दलीय कैडर और संसाधनों की होड़ तक सीमित हो जाता है, जबकि बौद्धिक और नीतिगत मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। जब एक ही विश्वविद्यालय के भीतर दो अलग-अलग छात्र-प्रशासन व्यवस्थाएं चलती हैं, तो पूरे संस्थान में एक समान लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का अभाव साफ दिखता है। यदि भविष्य में छात्र संघ के ढांचे में सुधार नहीं किया गया, तो दलीय राजनीति और शैक्षणिक माहौल के बीच यह खाई और चौड़ी होगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·39 दिन पहले

छात्र राजनीति के केंद्रीय पैनल चुनावों में अक्सर भारी धनबल, बाहुबल और सार्वजनिक संपत्ति के विरूपण जैसे कानून-व्यवस्था से जुड़े गंभीर मुद्दे सामने आते हैं। सुरक्षा और शांति के लिहाज से देखा जाए तो प्रतिष्ठित संस्थानों का केंद्रीय प्रक्रिया से दूर रहना उन्हें चुनाव-संबंधी गुटबाजी, हिंसा और बाहरी उपद्रवियों के सीधे प्रभाव से बचाता है। आंतरिक छात्र परिषदों के माध्यम से ये कॉलेज प्रशासनिक नियंत्रण, परिसर की सुरक्षा और शैक्षणिक माहौल को उपद्रवमुक्त रखने में सफल रहते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·39 दिन पहले

करण की बात सही है। प्रशासनिक और नीतिगत दृष्टिकोण से देखें तो यह संरचनात्मक विभाजन छात्र राजनीति में दो अलग लोकतांत्रिक मॉडलों को जन्म देता है। जहां केंद्रीय पैनल चुनाव मुख्यधारा की राष्ट्रीय-क्षेत्रीय राजनीति की प्रयोगशाला बन चुके हैं, वहीं स्वायत्त संस्थान अकादमिक अनुशासन और प्रत्यक्ष छात्र जवाबदेही को प्राथमिकता देते हैं। यदि लिंगदोह समिति के दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन कराकर चुनावी खर्च और उपद्रव पर रोक नहीं लगाई गई, तो यह अंतर और गहराएगा। आने वाले समय में परिसर की सुरक्षा के लिहाज से अन्य संस्थान भी केंद्रीय प्रक्रिया से दूरी बना सकते हैं।

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