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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ में दशकों से जाट और गुर्जर दबदबा क्यों बना हुआ है, जानिए जमीनी समीकरणदिल्ली
21 सित॰ 2026, 3:25 pm (39 दिन पहले)· 0

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ में दशकों से जाट और गुर्जर दबदबा क्यों बना हुआ है, जानिए जमीनी समीकरण

डूसू में सोशल मीडिया की चमक-दमक के पीछे असल चुनावी जंग सामाजिक ताने-बाने, कम मतदान और स्थानीय बाहुबल के इर्द-गिर्द सिमटी रहती है।

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ यानी डूसू के चुनावी घमासान का असर इन दिनों इंटरनेट और सोशल मीडिया मंचों पर साफ दिखाई दे रहा है। चारों तरफ रंग-बिरंगे पोस्टर, रील्स, मीम्स और हैशटैग की भरमार देखने को मिल रही है, जिससे ऐसा आभास होता है मानो चुनावी लड़ाई पूरी तरह डिजिटल हो चुकी है। वास्तविकता यह है कि इस आभासी प्रचार के पीछे कैंपस की जमीनी सियासत बिल्कुल अलग धरातल पर काम करती है। वर्ष 2014 से लेकर 2026 तक के डूसू के चुनावी सफर को देखें, तो छात्रसंघ अध्यक्ष पद की कुर्सी अमूमन दो प्रमुख जातियों जाट और गुर्जर के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। हाई-टेक कैंपेन के इस दौर में भी कैंपस की राजनीति पर इन दो समुदायों की मजबूत पकड़ के पीछे गहरे सामाजिक, भौगोलिक और सांगठनिक कारण छिपे हैं।

कम मतदान और संगठित स्थानीय वोट बैंक का गणित

डूसू से जुड़े 52 कॉलेजों और संस्थानों में करीब 1.5 लाख पंजीकृत छात्र मतदाता हैं। इसके बावजूद मतदान का प्रतिशत अमूमन केवल 40 फीसदी के आसपास ही सिमट कर रह जाता है। इस सीमित मतदान प्रतिशत के बीच दिल्ली, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के स्थानीय छात्र सबसे निर्णायक शक्ति बनकर उभरते हैं। आम छात्र जहां वोटिंग के दिन को छुट्टी मानकर घर बैठ जाते हैं या कैंपस से दूर रहते हैं, वहीं ये स्थानीय छात्र अपनी बिरादरी, गांव और उम्मीदवार के समर्थन में एकजुट होकर मतदान केंद्रों तक पहुंचते हैं और भारी मतदान सुनिश्चित करते हैं।

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कैंपस का भौगोलिक बंटवारा और कॉलेजों की बनावट

यूनिवर्सिटी के कॉलेजों की भौगोलिक अवस्थिति भी इस दबदबे को तय करने में अहम भूमिका निभाती है। बाहरी दिल्ली और नजफगढ़ बेल्ट के कॉलेजों में जाट छात्रों की संख्या काफी ज्यादा रहती है। इसके उलट, साउथ कैंपस और कालकाजी के आसपास के कॉलेजों में गुर्जर छात्रों का मजबूत जनाधार मौजूद है। कॉलेजों का यह भौगोलिक और जनसांख्यिकीय विभाजन दोनों समुदायों को अपने-अपने प्रभाव वाले इलाकों में निर्णायक बढ़त दिलाता है, जिसका सीधा असर अंतिम चुनावी नतीजों पर पड़ता है।

प्रमुख छात्र संगठनों की चुनावी मजबूरी और टिकट वितरण

छात्र राजनीति में भले ही बड़ी-बड़ी वैचारिक बातें की जाती हों, लेकिन टिकट बांटते समय प्रमुख छात्र संगठन जमीनी समीकरणों को ही प्राथमिकता देते हैं। छात्र के काम या योग्यता से कहीं अधिक उसकी जीत की संभावना और जातीय ताकत को देखा जाता है। उदाहरण के तौर पर, यदि एक प्रमुख छात्र संगठन जाट समुदाय से उम्मीदवार उतारता है, तो दूसरा दल तुरंत गुर्जर बिरादरी का मजबूत चेहरा सामने लाकर या उसी जाति का प्रत्याशी देकर मुकाबला साधने की रणनीति अपनाता है।

साधनों की प्रचुरता और भारी-भरकम प्रचार अभियान

डूसू के चुनाव अब देश के सबसे महंगे छात्र चुनावों में तब्दील हो चुके हैं। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संपन्न व जमींदार परिवारों से ताल्लुक रखने वाले प्रत्याशियों के पास आर्थिक संसाधनों की कोई कमी नहीं होती। लग्जरी गाड़ियों के लंबे काफिले, दिल्ली भर में लगाए जाने वाले विशालकाय होर्डिंग्स और महंगे प्रचार अभियानों का खर्च ये संपन्न परिवार आसानी से वहन कर लेते हैं। इस प्रचंड आर्थिक और शारीरिक प्रभाव के सामने साधारण परिवार से आने वाला आम छात्र दौड़ में शामिल होने से पहले ही पिछड़ जाता है।

ग्रामीण ताना-बाना और खाप पंचायतों का समर्थन

इन दोनों समुदायों के पास एक विशिष्ट सामाजिक नेटवर्क मौजूद है, जो अन्य राज्यों या दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों के पास नहीं होता। राष्ट्रीय राजधानी के आसपास के ग्रामीण इलाकों और खाप पंचायतों का मौन अथवा खुला समर्थन इन प्रत्याशियों को मिलता है। गांवों के प्रभावशाली बड़े-बुजुर्ग, स्थानीय प्रधान और सीनियर छात्र इस प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं। वे यूनिवर्सिटी में नया दाखिला लेने वाले अपने क्षेत्र के युवाओं को एकजुट करने और उनके वोट को एकमुश्त दिलाने में सफल रहते हैं।

पीजी और हॉस्टल नेटवर्क पर स्थानीय नियंत्रण

यूनिवर्सिटी कैंपस के आसपास स्थित प्रमुख छात्र बस्तियों जैसे ढाका, मुखर्जी नगर, मौरिस नगर और सत्यनिकेतन में बड़े पैमाने पर पेइंग गेस्ट आवास और निजी हॉस्टल चलते हैं। इनमें से अधिकतर हॉस्टलों का संचालन स्थानीय लोगों के हाथों में है। स्थानीय और बिरादरी के संबंधों के कारण खास उम्मीदवारों को इन हॉस्टलों और रिहायशी क्षेत्रों में सीधे जाने, प्रचार करने और समर्थन जुटाने की विशेष छूट मिल जाती है, जो किसी बाहरी राज्य के उम्मीदवार के लिए जुटा पाना बेहद कठिन होता है।

दैनिक यात्रियों की मौजूदगी और सीधी रेल-सड़क कनेक्टिविटी

दिल्ली विश्वविद्यालय का कैंपस हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीमाओं के बेहद करीब है। रोहतक, सोनीपत, झज्जर, बागपत और गाजियाबाद जैसे शहरों से रोजाना हजारों विद्यार्थी लोकल ट्रेनों, मेट्रो और निजी वाहनों के जरिए डीयू पहुंचते हैं। यह रोज आने-जाने वाले छात्रों का ऐसा बड़ा वर्ग है, जो कक्षाएं खत्म होते ही शाम को अपने घर लौट जाता है, लेकिन चुनाव वाले दिन अपने क्षेत्र और जाति से जुड़े प्रत्याशी के पक्ष में पूरी ताकत से मतदान करने पहुंचता है।

दबंग छवि और नए विद्यार्थियों को सुरक्षा का भरोसा

कॉलेज में दाखिला लेने वाले नए विद्यार्थियों के बीच अक्सर जाट और गुर्जर नेताओं की छवि मजबूत, दबंग और मददगार के रूप में पेश की जाती है। एडमिशन के समय फॉर्म भरने से लेकर हॉस्टल दिलाने या स्थानीय स्तर पर किसी विवाद और टकराव की स्थिति में सुरक्षा का भरोसा देकर ये नेता नए छात्रों का विश्वास हासिल कर लेते हैं। शुरुआत में मिला यही सहारा बाद में एक वफादार और भरोसेमंद वोट बैंक में तब्दील हो जाता है।

मुख्यधारा के सियासी दलों की रणनीतिक नजर

देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां डूसू को मुख्यधारा की राजनीति की नर्सरी के रूप में देखती हैं। दिल्ली और हरियाणा के आगामी विधानसभा तथा लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर वे छात्र राजनीति के इन जातीय समीकरणों को पूरा संरक्षण देती हैं। बड़े राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता भी उन्हीं छात्र चेहरों पर समय और संसाधन लगाते हैं, जो आगे चलकर उनकी अपनी जाति के विशाल वोट बैंक को साधने में मददगार साबित हो सकें।

पूर्वांचली छात्रों की संख्या और सांगठनिक बिखराव

संख्या बल के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय के भीतर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाले पूर्वांचली विद्यार्थियों की तादाद बहुत बड़ी है। इसके बावजूद वे राजनीतिक तौर पर एकजुट होकर कोई मजबूत मोर्चा नहीं बना पाते। किसी एक सर्वमान्य चेहरे का अभाव, स्थानीय संबंधों की कमी तथा वित्तीय और सांगठनिक मजबूती न होने के कारण वे चुनाव के समय बिखर जाते हैं। इस बिखराव का सीधा लाभ संगठित स्थानीय लॉबी को मिलता है और डूसू की सत्ता की चाबी पारंपरिक जातीय गठजोड़ के पास ही बनी रहती है।

सवाल-जवाब

डूसू में कुल कितने पंजीकृत छात्र मतदाता हैं और आमतौर पर कितना मतदान होता है?
डूसू से जुड़े कॉलेजों में लगभग 1.5 लाख छात्र मतदाता हैं, लेकिन आमतौर पर केवल 40 प्रतिशत के आसपास ही मतदान दर्ज किया जाता है।
डूसू अध्यक्ष पद पर किन समुदायों का सबसे ज्यादा प्रभाव रहा है?
साल 2014 से लेकर 2026 तक के इतिहास में डूसू अध्यक्ष पद पर मुख्य रूप से जाट और गुर्जर समुदायों का दबदबा रहा है।
डूसू के तहत कुल कितने कॉलेज और सेंटर शामिल हैं?
डूसू चुनाव के दायरे में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुल 52 कॉलेज और संस्थान शामिल हैं।
पूर्वांचल के छात्र संख्या में अधिक होने के बावजूद चुनाव में निर्णायक क्यों नहीं बन पाते?
पूर्वांचल के छात्र राजनीतिक रूप से किसी एक चेहरे या संगठन के पीछे एकजुट नहीं हो पाते और स्थानीय व वित्तीय साधनों की कमी के कारण बिखर जाते हैं।
डे-स्कॉलर्स छात्र डूसू चुनाव में क्या भूमिका निभाते हैं?
रोहतक, सोनीपत, झज्जर, बागपत और गाजियाबाद से रोज आने-जाने वाले हजारों छात्र चुनाव के दिन अपने स्थानीय व क्षेत्रीय प्रत्याशियों के पक्ष में भारी मतदान करते हैं।
कैंपस के आसपास के किन इलाकों के पीजी और हॉस्टलों में स्थानीय प्रभाव दिखता है?
ढाका, मुखर्जी नगर, मौरिस नगर और सत्यनिकेतन जैसे इलाकों के हॉस्टलों व पीजी में स्थानीय संबंधों के कारण खास प्रत्याशियों को प्रचार की सीधी सहूलियत मिलती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·38 दिन पहले

डूसू चुनावों का यह ढांचा केवल एक स्थानीय छात्र राजनीति का मामला नहीं है, बल्कि यह इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे पारंपरिक पहचान, क्षेत्रीय जनसांख्यिकी और आर्थिक संसाधन आधुनिक और डिजिटल प्रचार प्रणालियों पर भारी पड़ सकते हैं। जब तक 40 प्रतिशत का कम मतदान प्रतिशत और स्थानीय वोट-बैंक का गणित प्रभावी रहेगा, तब तक बड़े राजनीतिक दलों और छात्र संगठनों की रणनीति व्यावहारिक बाध्यताओं के इर्द-गिर्द ही घूमती रहेगी।

Arjun Mehta@arjun-mehta·38 दिन पहले

डूसू चुनावों में यह जातीय एकाधिकार इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय स्तर के बड़े छात्र संगठन भी सैद्धांतिक राजनीति के बजाय क्षेत्रीय और सामाजिक गोलबंदी के आगे झुकने को मजबूर हैं। केवल चालीस प्रतिशत मतदान और भौगोलिक एकाग्रता का यह संयोजन भविष्य के मुख्यधारा के चुनावों की उस प्रयोगशाला को दर्शाता है जहाँ विचारधारा से अधिक जाति और बाहुबल निर्णायक होते हैं।

Vikram Yadav@vikram-yadav·38 दिन पहले

विक्रम यादव के रूप में मेरा मानना है कि यह प्रवृत्ति केवल परिसरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बिहार से लेकर दिल्ली तक की चुनावी संस्कृति का कड़वा सच बन चुकी है। जहाँ मतदान का स्तर गिरता है, वहाँ वैचारिक बहसें दम तोड़ देती हैं और क्षेत्रीय-जातीय गोलबंदी ही पूरी व्यवस्था को नियंत्रित करने लगती है। भविष्य में मुख्यधारा की राजनीति का यही मॉडल पूरे देश में राजनीतिक दलों की टिकट वितरण नीति और चुनावी रणनीतियों को और अधिक गहराई से प्रभावित करेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·38 दिन पहले

डूसू चुनावों में बाहुबल, वित्तीय संसाधनों की भारी प्रचुरता और लक्जरी गाड़ियों के काफिले का उपयोग कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है। 40 प्रतिशत मतदान के बीच यह आपराधिक मामलों, डराने-धमकाने और धनबल के प्रभाव को सीधा बढ़ावा देता है, जिसकी जाँच और रोकथाम के लिए प्रशासन को सख्त कदम उठाने चाहिए।

Rohan Verma@rohan-verma·38 दिन पहले

डूसू चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के आपराधिक व बाहुबली तत्वों का बढ़ता दखल केवल कैंपस की शांति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की समग्र कानून-व्यवस्था के लिए भी एक बड़ा खतरा है। जब संगठित जातीय गुट और धनबल चुनाव परिणामों को तय करने लगते हैं, तब लोकतांत्रिक मूल्य पीछे छूट जाते हैं। यदि जिला प्रशासन और पुलिस ने समय रहते इन लग्जरी काफिलों और अवैध वित्तीय स्रोतों पर अंकुश नहीं लगाया, तो यह प्रवृत्ति मुख्यधारा की राजनीति को भी दूषित करेगी।

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