झारखंड के देवघर जिले में स्थित गोपीडीह गांव के खेतों की तस्वीर अब तेजी से बदलने लगी है. एक समय था जब पानी की भारी किल्लत के कारण यहां की उपजाऊ जमीन भी बंजर नजर आती थी और किसान चाहकर भी खेतों में मेहनत का फल नहीं ले पाते थे. गांव में लगभग 45 से 50 एकड़ का ऐसा विस्तृत रकबा मौजूद था, जो सिंचाई का कोई पक्का साधन न होने की वजह से पूरी तरह मौसम की मेहरबानी पर निर्भर था. बारिश सामान्य नहीं रहने पर खेतों में धान या साधारण सब्जियां उगाना भी संभव नहीं हो पाता था. मेहनत करने की इच्छा और जमीन की उपलब्धता के बावजूद सिंचाई के बुनियादी इंतजाम के अभाव में इस पूरे क्षेत्र का कृषि दायरा बेहद सीमित बना हुआ था.
पटवन के अभाव में खाली छूट जाते थे खेत
गोपीडीह के स्थानीय किसान अम्बिका बताते हैं कि उनके पास लगभग 4 से 5 एकड़ कृषि योग्य भूमि है. कुछ वर्ष पहले तक इस जमीन पर नियमित खेती करना एक गंभीर चुनौती बना हुआ था. खेत तक पानी पहुंचाने का कोई स्थायी जरिया मौजूद नहीं था, जिसकी वजह से केवल मानसून के दौरान ही फसल की बुवाई संभव हो पाती थी. ऐसी नकदी फसलें या बागवानी, जिनमें समय-समय पर नमी और पटवन की सख्त दरकार होती है, उनकी बुवाई किसान चाहकर भी नहीं कर सकते थे. जमीन होने के बावजूद पानी के संकट के चलते किसान अपनी मेहनत और जमीन का आर्थिक लाभ हासिल करने में असमर्थ महसूस करते थे.
मनरेगा और सिंचाई योजना से तैयार हुए तीन कुएं
इस विकट समस्या का समाधान तब निकला जब प्रशासनिक स्तर पर चलाई जा रही योजनाओं का लाभ किसान तक पहुंचा. सिंचाई योजना और मनरेगा के समन्वित प्रयासों के तहत किसान को तीन पक्के कुओं की सुविधा उपलब्ध कराई गई. इन कुओं का निर्माण पूरा होते ही खेतों तक नियमित पानी पहुंचाने की व्यवस्था मजबूत हो गई. भूमिगत जल की उपलब्धता ने खेतों को स्थायी रूप से सींचने की राह आसान बना दी. अब किसानों को बुवाई या रोपाई के लिए केवल बादलों की ओर देखने की मजबूरी खत्म हो गई, जिससे वे साल भर के चक्र में योजनाबद्ध तरीके से खेती करने में सक्षम हो गए हैं.
गन्ना, पपीता और हल्दी की बहुफसली खेती से आय में बढ़ोतरी
सिंचाई के पक्के इंतजाम ने फसल चक्र और बुवाई के पारंपरिक ढर्रे को भी बदल दिया है. अम्बिका के अनुसार, अब खेतों में केवल एक पारंपरिक फसल पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं रह गई है. वे मौसम, बाजार की मांग और अपनी सुविधा के अनुसार गन्ने और पपीते जैसी नकदी फसलों की पैदावार ले रहे हैं. इसके साथ ही खेतों में हल्दी की बुवाई भी सफलतापूर्वक की जा रही है. बहुफसली पद्धति अपनाने से किसानों को अलग-अलग समय पर नियमित आमदनी हासिल करने के कई नए विकल्प मिल रहे हैं. पटवन की उपलब्धता ने जोखिम को कम करते हुए किसानों में कृषि को व्यावसायिक रूप से अपनाने का भरोसा जगाया है.
45 से 50 एकड़ के दायरे में खेती का विस्तार
पटवन की समुचित व्यवस्था हो जाने से गोपीडीह में खेतों को लंबे समय तक परती या बेकार छोड़ने का संकट अब दूर हो चुका है. अम्बिका जैसे किसानों के लिए बने ये कुएं केवल पानी का साधन नहीं, बल्कि जमीन की उत्पादकता को पुनर्जीवित करने का मजबूत माध्यम साबित हुए हैं. गांव के 45 से 50 एकड़ के दायरे में फैली जमीन पर अब खेती की गतिविधियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं. किसान अपनी जमीन से अधिक से अधिक उत्पादन लेने के लिए आधुनिक तरीकों से जुड़ रहे हैं. जिस मिट्टी पर कभी सिंचाई के अभाव में कुछ भी उगाना मुश्किल था, आज वहां गन्ना, पपीता और हल्दी जैसी उपज लहलहा रही है, जिससे इलाके में ग्रामीण समृद्धि की नई उम्मीद बंधी है.





















