पश्चिम एशिया में गहराते सैन्य गतिरोध के बीच ऊर्जा बाजारों में हलचल तेज हो गई है, जहां वैश्विक कूटनीति और तेल आपूर्ति मार्गों पर नए सिरे से चर्चा छिड़ गई है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान संघर्ष को विराम देना अब सीधे तौर पर अमेरिकी रुख पर निर्भर करता है। बातचीत के जरिए मसलों को सुलझाने की वकालत करते हुए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि उनका देश सैन्य टकराव को लंबा खींचना नहीं चाहता। उनके अनुसार इस पूरे संकट की शुरुआत इजरायल की तरफ से की गई उकसावे वाली कार्रवाइयों से हुई, जिसके चलते यह युद्ध उन पर थोपा गया। कूटनीतिक गलियारों में अब इस बात पर नजरें टिकी हैं कि क्या दोनों पक्ष तनाव घटाने के लिए किसी व्यावहारिक समझौते पर आगे बढ़ सकते हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य और आर्थिक प्रतिबंधों से जुड़ा संभावित शांति फार्मूला
तेहरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मौजूदा गतिरोध को समाप्त करने की दिशा में एक चरणबद्ध रूपरेखा का खाका सामने रखा है। इस संभावित व्यवस्था के तहत यदि अमेरिका अपने कड़े आर्थिक प्रतिबंधों को हटाता है और ईरान की जब्त संपत्तियों तक उसकी पहुंच बहाल करता है, तो ईरान भी दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक गलियारे यानी होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित कर सकता है। वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी तरह के व्यवधान की आशंका अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों को तुरंत प्रभावित करती है। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि आर्थिक नाकेबंदी हटाने और संपत्ति तक पहुंच देने का यह प्रस्ताव दोनों देशों को बातचीत की मेज पर लाने की दिशा में एक बड़ा आधार बन सकता है।
संयुक्त राष्ट्र में कतर ने इजरायल के आरोपों को सिरे से नकारा
इस बीच संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर भी कूटनीतिक टकराव देखने को मिला। कतर ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के उन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिनमें दोहा पर इजरायल विरोधी अभियान चलाने का आरोप लगाया गया था। कतर ने अपने औपचारिक संबोधन में कहा कि इस तरह के बेबुनियाद हमले जमीनी स्तर पर अपनी राजनीतिक नीतियों की जवाबदेही से ध्यान भटकाने की एक सोची-समझी कोशिश भर हैं। क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर चल रहे इस बहुपक्षीय तनाव ने दुनिया भर के नीति निर्माताओं और व्यापारिक संस्थानों की चिंताओं को और गहरा कर दिया है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और प्रमुख तकनीकी स्तर
भू-राजनीतिक घटनाक्रमों का सीधा असर कमोडिटी बाजारों पर देखने को मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI कच्चे तेल में 0.80% की तेजी दर्ज की गई और यह 92.86 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। ताजा कारोबारी सत्र के समापन पर तेल की लाइव कीमत 93.92 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई, जो पिछले बंद भाव 92.16 डॉलर के मुकाबले 1.91% की मजबूती को दर्शाती है। बीते 52 हफ्तों के दौरान इसका दायरा 54.98 डॉलर से 119.48 डॉलर के बीच रहा है, जबकि मौजूदा कारोबारी वॉल्यूम 20 दिनों के औसत का 0.02 गुना दर्ज किया गया।
तकनीकी संकेतकों पर नजर डालें तो 14-दिवसीय आरएसआई यानी रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स 52 पर स्थिर है, जो बाजार में संतुलित स्थिति का संकेत देता है। एमएसीडी सूचक 2.82 पर है जबकि इसकी सिग्नल लाइन 3.84 पर दर्ज की गई है, जिसका हिस्टोग्राम -1.02 के साथ मंदी का हल्का रुझान दिखा रहा है। हालांकि मूविंग एवरेज के मोर्चे पर लंबी अवधि का रुझान सकारात्मक बना हुआ है, जहां 50-दिवसीय ईएमए 89.84 डॉलर और 200-दिवसीय ईएमए 79.98 डॉलर पर मौजूद है, जो एक मजबूत गोल्डन क्रॉस की पुष्टि करते हैं। इसके अलावा 20-दिवसीय ईएमए 94.55 डॉलर पर है, जबकि साधारण मूविंग एवरेज में 50-दिवसीय एसएमए 87.76 डॉलर और 200-दिवसीय एसएमए 81.37 डॉलर पर स्थित है।
बाजार की अस्थिरता मापने वाले बोलिंजर बैंड्स 82.17 डॉलर से 107.49 डॉलर के दायरे में हैं, जिनका मध्य स्तर 94.83 डॉलर है और मौजूदा भाव इन्हीं सीमाओं के भीतर बना हुआ है। एडीएक्स इंडेक्स 28 पर ट्रेंडिंग गति को दर्शा रहा है, जबकि स्टोकेस्टिक की फास्ट लाइन 29 और सिग्नल लाइन 27 पर चल रही है। 4.45 डॉलर के एटीआर स्तर को देखते हुए ट्रेडर्स के लिए 20-दिवसीय सपोर्ट लगभग 80.65 डॉलर और रेजिस्टेंस 106.75 डॉलर पर आंका गया है। आगामी सत्रों के लिए दैनिक पिवट बिंदु 94.19 डॉलर पर केंद्रित है, जिसमें पहला रेजिस्टेंस 94.48 डॉलर और दूसरा 95.04 डॉलर पर बना है, जबकि पहला सपोर्ट 93.63 डॉलर और दूसरा 93.34 डॉलर पर स्थित है।
WTI क्रूड क्या है और वैश्विक आपूर्ति में इसकी क्या भूमिका है
डब्ल्यूटीआई क्रूड दुनिया भर में व्यापार किए जाने वाले कच्चे तेल की तीन प्रमुख श्रेणियों में से एक है, जिसमें ब्रेंट और दुबई क्रूड भी शामिल हैं। कम घनत्व और सल्फर की बेहद कम मात्रा की वजह से इसे उद्योग जगत में हल्का और मीठा तेल कहा जाता है। इसे आसानी से रिफाइन किया जा सकता है और इसका उत्पादन संयुक्त राज्य अमेरिका में होता है। अमेरिका का कुशिंग हब, जिसे पाइपलाइन क्रॉसरोड्स ऑफ द वर्ल्ड के नाम से जाना जाता है, इस तेल के वितरण का प्रमुख केंद्र है। वित्तीय मीडिया और अंतरराष्ट्रीय अनुबंधों में इस क्रूड के भाव को मूल्य निर्धारण का मानक माना जाता है।
किसी भी अन्य संपत्ति की तरह तेल की कीमतों का निर्धारण मुख्य रूप से मांग और आपूर्ति के संतुलन पर निर्भर करता है। दुनिया भर में मजबूत आर्थिक विकास से ईंधन की खपत बढ़ती है, जबकि आर्थिक मंदी के दौर में मांग घटने लगती है। इसके अलावा युद्ध, राजनीतिक उथल-पुथल और व्यापारिक पाबंदियां आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करके कीमतों में अप्रत्याशित उछाल ला सकती हैं। चूंकि कच्चे तेल का अधिकांश वैश्विक कारोबार अमेरिकी डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव भी इसके आकर्षण को प्रभावित करता है। कमजोर डॉलर अन्य मुद्रा धारकों के लिए तेल को सस्ता बना देता है, जिससे मांग में तेजी आ सकती है।
इन्वेंट्री आंकड़े और ओपेक की उत्पादन नीतियां
तेल के उतार-चढ़ाव को समझने में साप्ताहिक भंडार रिपोर्ट बेहद अहम मानी जाती हैं। अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट यानी एपीआई प्रत्येक मंगलवार को अपने आंकड़े जारी करता है, जबकि अगले दिन सरकारी एजेंसी एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन यानी ईआईए की रिपोर्ट आती है। लगभग 75% मौकों पर दोनों एजेंसियों के नतीजे एक प्रतिशत के अंतर के भीतर समान रहते हैं, हालांकि आधिकारिक निकाय होने के नाते ईआईए के आंकड़ों को बाजार में अधिक विश्वसनीय माना जाता है। भंडारों में आने वाली कमी मजबूत मांग की ओर इशारा करती है, जिससे कीमतों को सहारा मिलता है, जबकि भंडारण बढ़ने पर अतिरिक्त आपूर्ति के दबाव में भाव गिरते हैं।
विश्व बाजार में पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन यानी ओपेक एक निर्णायक भूमिका निभाता है। 12 सदस्य देशों का यह समूह साल में दो बार बैठक करके उत्पादन कोटा तय करता है। जब यह संगठन उत्पादन में कटौती का फैसला करता है तो बाजार में आपूर्ति सीमित हो जाती है और भाव चढ़ जाते हैं, जबकि कोटा बढ़ाने पर विपरीत असर दिखाई देता है। इसके विस्तृत प्रारूप को ओपेक प्लस के रूप में जाना जाता है, जिसमें रूस सहित 10 अन्य गैर-सदस्य उत्पादक देश भी शामिल होकर वैश्विक आपूर्ति रणनीति तय करते हैं।
करेंसी, बॉन्ड और बहुमूल्य धातुओं के बाजारों का रुख
वैश्विक वित्तीय बाजारों में व्यापक स्तर पर रीपोजिशनिंग देखी गई। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले लगातार चौथे दिन गिरावट के साथ 0.7000 के अहम दायरे के करीब पहुंच गया, साथ ही इसने अपने 200-दिवसीय साधारण मूविंग एवरेज के महत्वपूर्ण स्तर को भी नीचे की ओर तोड़ दिया। फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की उम्मीदों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी ने डॉलर को व्यापक मजबूती दी है।
दूसरी ओर जापानी बाजार में एक ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला। बैंक ऑफ जापान ने अपनी मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00% से बढ़ाकर 1.25% कर दिया। नीति समिति के नौ सदस्यों में से सात ने इस वृद्धि के पक्ष में और दो ने विरोध में मतदान किया, जो बाजार के पूर्व अनुमानों के पूरी तरह अनुकूल रहा। जापानी बॉन्ड यील्ड में उछाल और सरकारी दखल के जोखिमों के बीच यूएसडी/जेपीवाई तीन सप्ताह के उच्च स्तर से फिसलकर एशियाई कारोबार में 158.00 के करीब आ गया, हालांकि मजबूत अमेरिकी आंकड़ों ने डॉलर की बढ़त को बनाए रखा। इसके विपरीत सोने में मुनाफावसूली हावी रही और यह 4,250 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के नीचे फिसलने के बाद हल्की रिकवरी की कोशिश करता नजर आया। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड की तेजी और दरों में बढ़ोतरी की आशंकाएं पीली धातु पर लगातार दबाव बनाए हुए हैं।



















