भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक नई स्वायत्त ड्रोन प्रणाली के निर्माण पर कार्य कर रहा है। इस योजना का केंद्रबिंदु पारंपरिक मिसाइल या लड़ाकू जेट प्रणालियों से इतर स्वदेशी ड्रोन तकनीक का विस्तार करना है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने एक ऐसा उन्नत ड्रोन स्वार्म विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ाया है, जो दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग प्रयासों के बावजूद निर्बाध रूप से कार्य करने में सक्षम होगा। इस महत्वाकांक्षी पहल को आधिकारिक तौर पर 'डेवलपमेंट ऑफ क्लोज फॉर्मेशन फ्लाइंग ऑफ मल्टीपल ड्रोन्स' परियोजना का नाम दिया गया है।
डीआरडीओ की टीडीएफ योजना और घरेलू स्टार्टअप्स की भागीदारी
इस आधुनिक सैन्य तकनीक के निर्माण के लिए डीआरडीओ ने देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) और स्टार्टअप्स से प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं। इस परियोजना को टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (टीडीएफ) योजना के अंतर्गत क्रियान्वित किया जा रहा है। टीडीएफ योजना का मुख्य ध्येय घरेलू रक्षा उद्योग को वित्तीय व तकनीकी सहायता प्रदान कर आत्मनिर्भरता को गति देना है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस विशिष्ट परियोजना में बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को शामिल न करके पूरी तरह से जमीनी स्तर के नवोन्मेषकों और निजी स्टार्टअप्स पर भरोसा जताया गया है। भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा आधुनिक युद्धक्षेत्र में स्वायत्त उपकरणों की बढ़ती मांग को देखते हुए यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ऑपरेशन सिंदूर का अनुभव और आधुनिक युद्धक्षेत्र की आवश्यकताएं
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार मई 2025 में संचालित 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान अनमैन्ड एरियल सिस्टम (यूएवी) की उपयोगिता स्पष्ट रूप से सामने आई थी। उस दौरान निगरानी रखने, खुफिया जानकारी जुटाने और सटीक निशानों पर हमला करने में यूएवी प्रणालियों ने मुख्य भूमिका निभाई थी। उस सैन्य अनुभव के बाद यह महसूस किया गया कि भविष्य के संघर्षों में एक-दूसरे के साथ तालमेल बिठाकर उड़ने वाले स्वदेशी और सुरक्षित ड्रोन नेटवर्क का होना अति आवश्यक है। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए 50 ड्रोन्स के इस नए स्वार्म को तैयार किया जा रहा है।
मास्टर-स्लेव नेटवर्क और 500 मिलीमीटर दूरी की तकनीकी चुनौती
डीआरडीओ के तकनीकी दिशानिर्देशों के तहत इस 50 ड्रोन वाले स्वार्म में 1 'मास्टर ड्रोन' होगा, जो शेष 49 'स्लेव ड्रोन्स' का संचालन और समन्वय करेगा। मास्टर ड्रोन सीधे ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन से निर्देश प्राप्त करेगा और पूरे ग्रिड को निर्धारित दिशा में संचालित रखेगा। इस परियोजना की सबसे बड़ी तकनीकी जटिलता यह है कि सभी 50 ड्रोन्स को उड़ान के दौरान आपस में केवल 500 मिलीमीटर (आधा मीटर) की दूरी बनाए रखनी होगी। हवा में उड़ते समय आपस में टकराए बिना स्थिर रहने के लिए प्रत्येक ड्रोन को सभी दिशाओं में अधिकतम 5 सेंटीमीटर तक की स्थितिगत सटीकता बनाए रखना अनिवार्य होगा।
दुर्गम पर्वतीय परिस्थितियों और एंटी इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग क्षमता
यह ड्रोन स्वार्म विषम भौगोलिक और मौसमीय चुनौतियों का सामना करने के उद्देश्य से डिजाइन किया जा रहा है। ये ड्रोन्स 5,000 मीटर तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में उड़ान भरने, मंडराने और अपना कार्य पूरा कर सुरक्षित वापस लौटने में सक्षम होंगे। इसके अतिरिक्त 20 मीटर प्रति सेकंड की गति से चलने वाली तेज हवाओं में भी ड्रोन्स की उड़ान स्थिरता प्रभावित नहीं होगी। दुश्मन द्वारा संचार तंत्र को बाधित करने की आशंका को ध्यान में रखते हुए स्वार्म में अत्यधिक सुरक्षित और एंटी इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग कम्यूनिकेशन सिस्टम लगाना अनिवार्य किया गया है।
पेलोड क्षमता, त्वरित तैनाती और बैटरी प्रदर्शन
प्रणाली के प्रत्येक ड्रोन में 2 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने की क्षमता होगी, जिसमें विभिन्न प्रकार के कैमरे, सेंसर अथवा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर उपकरण शामिल हो सकते हैं। परिचालन सुगमता के लिए यह शर्त रखी गई है कि पूरे सिस्टम को पैकिंग बक्से से निकालने के महज 5 मिनट के भीतर उड़ान के लिए पूरी तरह तैयार किया जा सके। बैटरियों के संबंध में मानक तय किए गए हैं कि वे कम से कम 30 मिनट की निरंतर उड़ान प्रदान कर सकें और केवल 15 मिनट की अवधि में तेजी से दोबारा चार्ज हो सकें।
मेक इन इंडिया मानदंड, 90 प्रतिशत अनुदान और 24 महीने का लक्ष्य
'मेक इन इंडिया' नीति का पालन करते हुए डीआरडीओ ने स्पष्ट किया है कि ड्रोन प्रणाली के कुल घटकों का कम से कम 70 प्रतिशत हिस्सा स्वदेशी होना चाहिए। किसी भी प्रतिद्वंद्वी देश से आयातित व्यावसायिक पुर्जों के उपयोग पर पूरी तरह से प्रतिबंध रहेगा। इस प्रोजेक्ट के विकास के लिए डीआरडीओ विकास लागत का 90 प्रतिशत तक अनुदान के रूप में वित्तीय सहायता देगा। चयनित कंपनी को 12 महीने के भीतर क्रियाशील प्रोटोटाइप तैयार करना होगा, जिसके बाद अगले 12 महीने तक डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं व सुविधाओं में इसका गहन परीक्षण किया जाएगा। 24 महीने की कुल परियोजना अवधि पूरी होने पर विकासकर्ता कंपनी को 50 ड्रोन्स, अतिरिक्त बैटरियां और संपूर्ण सॉफ्टवेयर सोर्स कोड डीआरडीओ को सौंपना होगा।



















