गाय और भैंस के दूध उत्पादन में अचानक गिरावट आना पशुपालकों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय होता है। कई बार सही खानपान, स्वच्छता और उचित दिनचर्या की अनदेखी के कारण पशुओं की दूध देने की क्षमता पर सीधा असर पड़ता है। आगरा के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. संजीव नेहरू ने पशुपालकों को सलाह दी है कि अगर वे अपने गाय और भैंस का स्वास्थ्य बेहतर रखने के साथ-साथ दूध उत्पादन बढ़ाना चाहते हैं, तो उन्हें दैनिक रखरखाव और पोषण प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना होगा। सही समय पर सही देखभाल से न केवल पशु स्वस्थ रहते हैं बल्कि उनकी दूध उत्पादन क्षमता में भी बढ़ोतरी होती है।
पर्याप्त जल आपूर्ति और संतुलित आहार का महत्व
पशुओं के शरीर में पोषण और तरल पदार्थों का सही संतुलन बनाए रखना दूध उत्पादन का सबसे पहला नियम है। डॉ. संजीव नेहरू के मुताबिक पशुओं को दिनभर स्वच्छ और ताजा पानी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। पानी की कमी से पशुओं में डिहाइड्रेशन हो सकता है, जिसका सीधा असर दूध की मात्रा पर पड़ता है। इसके साथ ही पशुओं को हमेशा ताजा, साफ और सुरक्षित हरा चारा खिलाना चाहिए। हरे चारे के साथ संतुलित आहार देने से पशुओं को सभी आवश्यक पोषक तत्व आसानी से मिल जाते हैं।
खनिज मिश्रण और नमक का सही इस्तेमाल
केवल हरा चारा देना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि आहार में सूक्ष्म पोषक तत्वों का होना भी उतना ही जरूरी है। पशुओं के शरीर में खनिज तत्वों की पूर्ति के लिए चारे में मिनरल मिक्सचर मिलाना आवश्यक है। इसके लिए पशु चिकित्सक की सलाह अनुसार उचित मात्रा में खनिज मिश्रण शामिल करना चाहिए। इसके अलावा, पशुओं के रहने के स्थान पर नमक का ढेला रखा जा सकता है, जिसे पशु अपनी आवश्यकता के अनुसार चाट लेते हैं। हालांकि यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि नमक का ढेला केवल चाटने के लिए है, यह पानी की कमी या डिहाइड्रेशन का विकल्प नहीं हो सकता। इसलिए पानी का निरंतर इंतजाम अनिवार्य है।
आवास की सफाई, मौसम प्रबंधन और विश्राम
दूध देने वाले पशुओं के लिए उनका परिवेश बहुत मायने रखता है। जिस जगह पशु बांधे जाते हैं, वह स्थान साफ-सुथरा, सूखा और हवादार होना चाहिए। मौसम में बदलाव या गर्मी के दिनों में पशुओं को विशेष देखभाल की दरकार होती है। पशुओं को सही समय पर चारा और पानी देने के अलावा पर्याप्त विश्राम मिलना भी उतना ही जरूरी है। यदि पशु तनावमुक्त रहेगा और उसे आरामदायक माहौल मिलेगा, तो उसका दूध उत्पादन बना रहेगा।
पेट के कीड़ों की दवा और टीकाकरण
कई बार पशु बाहर से पूरी तरह स्वस्थ नजर आता है, लेकिन उसके पेट में अंदरूनी कीड़े मौजूद हो सकते हैं। ये कीड़े पशु द्वारा खाए गए भोजन का पोषण खुद सोख लेते हैं, जिससे पशु कमजोर होने लगता है और उसका दूध उत्पादन घट जाता है। इससे बचाव के लिए समय-समय पर पशु चिकित्सक से परामर्श लेकर पेट के कीड़ों की दवा देनी चाहिए। दवा की खुराक पशु की उम्र, वजन और शारीरिक स्थिति के आधार पर निर्धारित की जानी चाहिए। साथ ही, निर्धारित समय-सारणी के अनुसार संक्रामक बीमारियों से बचाने के लिए पशुओं का टीकाकरण कराना भी बेहद जरूरी है।
दूध उत्पादन में अचानक गिरावट पर लें चिकित्सीय सलाह
यदि गाय या भैंस का दूध अचानक बहुत कम हो जाए या पशु अचानक दूध देना बंद कर दे, तो केवल घरेलू उपायों के भरोसे नहीं बैठना चाहिए। ऐसी स्थिति में तुरंत किसी योग्य पशु चिकित्सक से जांच करानी चाहिए ताकि बीमारी या समस्या के सटीक कारण का पता लगाकर सही समय पर उचित इलाज शुरू किया जा सके।



















