आधुनिक सैन्य संघर्षों में किसी भी राष्ट्र की हवाई ताकत केवल आसमान में मंडराने वाले लड़ाकू विमानों की गिनती तक सीमित नहीं रहती है। किसी भी वायुसेना का असली दम उसके जमीनी संचालन आधार, यानी एयरफील्ड की निरंतर कार्यक्षमता पर टिका होता है। यदि एयर ट्रैफिक कंट्रोल टावर, मुख्य रनवे, विमानों को जोड़ने वाले टैक्सी ट्रैक, सुरक्षित हैंगर, भूमिगत बंकर, निगरानी रडार तथा ईंधन व गोला-बारूद के डिपो क्षतिग्रस्त हो जाएं, तो सबसे उन्नत लड़ाकू विमान भी जमीन पर लाचार खड़े रह जाते हैं। भारतीय वायुसेना को इसी सामरिक बढ़त से लैस करने के मकसद से रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने पूरी तरह स्वदेशी स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन (एसएएडब्ल्यू) तैयार किया है। यह लंबी दूरी से सटीक वार करके विरोधी सेना के पूरे उड़ान तंत्र को ठप करने की बेजोड़ क्षमता रखता है।
परंपरागत ग्रेविटी बमों से किस तरह अलग है यह हथियार
सामान्य तौर पर गिराए जाने वाले पारंपरिक बम गुरुत्वाकर्षण के सहारे सीधे नीचे गिरते हैं और उनके निशाने पर सटीक वार करने की संभावना मौसम या ऊंचाई पर निर्भर करती है। इसके विपरीत एसएएडब्ल्यू कोई साधारण फ्री-फॉल बम नहीं है, बल्कि यह हवा से जमीन पर अचूक प्रहार करने वाला प्रिसिजन-गाइडेड ग्लाइड बम है। इसे लड़ाकू विमान से लक्ष्य से काफी पहले ही सुरक्षित दूरी पर रिलीज किया जा सकता है। विमान से अलग होते ही इसके एयरोडायनामिक विंग्स और आंतरिक मार्गदर्शन प्रणाली सक्रिय हो जाते हैं, जिसके दम पर यह लंबी दूरी तय करते हुए निर्धारित लक्ष्य पर सटीक हमला बोलता है। इस तरह के हथियारों को सैन्य शब्दावली में स्टैंड-ऑफ हथियार कहा जाता है, जिनका प्राथमिक ध्येय अपने पायलट और विमान को विरोधी सुरक्षा घेरे में घुसे बिना भारी तबाही मचाना होता है।
दुश्मन के महत्वपूर्ण जमीनी ठिकानों पर प्रहार का लक्ष्य
डीआरडीओ ने इस हथियार की संरचना सीधे दुश्मन के विमानों से हवा में लड़ने के लिए नहीं, बल्कि जमीन पर मौजूद उन सभी ढांचों को तबाह करने के लिए रची है जिनके दम पर लड़ाकू जेट उड़ान भरते हैं। आधिकारिक परीक्षणों के दौरान इस हथियार ने साबित किया है कि यह एयरफील्ड से जुड़े महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नेस्तनाबूद करने की क्षमता रखता है। इनमें मजबूत कंक्रीट रनवे, आपातकालीन टैक्सी ट्रैक, एयर ट्रैफिक कंट्रोल और रडार इंस्टॉलेशन शामिल हैं। इसके अलावा गोला-बारूद भंडारण स्थल, रिफ्यूलिंग डिपो, सुरक्षित विमान हैंगर, सुरक्षा बंकर और कमांड सेंटर इसके निशाने पर आते हैं। रनवे की सतह या सहायक उपकरणों को क्षति पहुंचाकर यह विरोधी सेना के पूरे एयरबेस को उड़ान भरने के अयोग्य बना देता है।
सौ किलोमीटर की स्टैंड-ऑफ रेंज और पायलट की सुरक्षा
इस ग्लाइड बम की सबसे बड़ी सामरिक खूबी इसकी लगभग 100 किलोमीटर तक की मारक दूरी है। इस लंबी रेंज की बदौलत हमलावर लड़ाकू विमान को दुश्मन के एयरफील्ड के ठीक ऊपर मंडराने की रत्ती भर भी जरूरत नहीं पड़ती। विमान विरोधी हवाई सुरक्षा रडार और जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइलों (एसएएम) की घातक जद में जाए बिना, लगभग 100 किलोमीटर की सुरक्षित दूरी से ही इसे रिलीज करके वापस अपनी दिशा में मुड़ सकता है। आधुनिक युद्धक्षेत्र में जहां सतह से हवा में मार करने वाले एयर डिफेंस सिस्टम बेहद सघन और घातक हो चुके हैं, वहां यह स्टैंड-ऑफ क्षमता हमारे पायलटों और बहुमूल्य लड़ाकू विमानों को खतरे से बाहर रखते हुए अभियान को शत-प्रतिशत सफल बनाती है।
125 किलो का हल्का ढांचा और 72.5 किलो का विस्फोटक वारहेड
तकनीकी संरचना के लिहाज से एसएएडब्ल्यू को 125 किलोग्राम वर्ग के बेहद हल्के और फुर्तीले हथियार के रूप में ढाला गया है। डीआरडीओ के अनुसार, इस श्रेणी के दुनिया भर में मौजूद अन्य हथियारों की तुलना में यह काफी हल्का और प्रभावी है। उपलब्ध तकनीकी विवरण के आधार पर
- कुल वजन और वारहेड: इस हथियार का कुल वजन 125 किलोग्राम वर्ग में आता है, जिसमें लगभग 72.5 किलोग्राम का शक्तिशाली वारहेड समाहित किया गया है जो कंक्रीट और बंकरों को भेदने में सक्षम है।
- शारीरिक लंबाई: इस ग्लाइड हथियार की कुल लंबाई लगभग 1.85 मीटर दर्ज की गई है, जिससे इसका एयरोडायनामिक ड्रैग न्यूनतम रहता है।
- प्रोग्रामेबल फ्यूज तकनीक: इसमें लक्ष्य पर आघात को नियंत्रित करने के लिए प्रोग्रामेबल इम्पैक्ट-डिले फ्यूज तकनीक दी गई है, जो वारहेड को कंक्रीट शेल्टर या रनवे की मोटी परतों के भीतर घुसने के बाद विस्फोट करने की अनुमति देती है।
हल्का वजन होने के कारण एक ही लड़ाकू विमान अपने विंग्स और पाइलन्स पर ऐसे कई बम एक साथ लोड करके उड़ान भर सकता है, जिससे एक ही मिशन में पूरे एयरबेस के कई ठिकानों पर एक साथ वार संभव हो जाता है।
गगन, जीपीएस और आईएनएस से लैस सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली
लक्ष्य तक अपनी राह बनाने के लिए इस हथियार का एक प्रमुख संस्करण उपग्रह आधारित नेविगेशन का इस्तेमाल करता है। इस संस्करण में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (आईएनएस), ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) और भारत की अपनी उपग्रह आधारित संवर्धन प्रणाली गगन (जीएजीएएन) का संयुक्त मार्गदर्शन इस्तेमाल किया जाता है। यह त्रिस्तरीय संयोजन हथियार की दिशा, ऊंचाई और स्थिति को उड़ान के दौरान लगातार सुधारता रहता है। इस मजबूत नेविगेशन प्रणाली की सहायता से उपग्रह आधारित एसएएडब्ल्यू 7 मीटर से भी कम की त्रुटि सीमा के भीतर लक्ष्य को नष्ट करने की सटीकता प्रदान करता है।
इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल तकनीक और इमेजिंग इन्फ्रा-रेड सीकर
सैटेलाइट नेविगेशन के अलावा डीआरडीओ ने इसके उन्नत इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल (ईओ) संस्करण का भी विकास और परीक्षण किया है। वर्ष 2021 के दौरान डीआरडीओ ने सैटेलाइट नेविगेशन तथा इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर दोनों से सुसज्जित संस्करणों के सफल उड़ान परीक्षण संपन्न किए थे। इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल संस्करण में इमेजिंग इन्फ्रा-रेड (आईआईआर) सीकर लगाया गया है, जो इस हथियार की सटीकता को एक अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचा देता है। इसका अर्थ यह है कि हथियार केवल पहले से भरे गए अक्षांश और देशांतर निर्देशांकों के भरोसे नहीं रहता, बल्कि टर्मिनल चरण में अपने आईआईआर सीकर से वास्तविक लक्ष्य की तस्वीर देखकर उस पर सीधे प्रहार करता है। इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल एसएएडब्ल्यू की आघात सटीकता 3 मीटर से भी कम आंकी गई है, जो इसे पिन-पॉइंट स्ट्राइक का अचूक साधन बनाती है।
किन लड़ाकू विमानों से दागा जा सकता है यह हथियार
भारतीय वायुसेना के विभिन्न बेड़ों की संचालन जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इस ग्लाइड बम का निर्माण किया गया है। प्रारंभिक विकास चरणों में इसे जगुआर लड़ाकू विमान से सफलतापूर्वक टेस्ट किया गया था, जिसके बाद इसे हॉक-एमके132 प्रशिक्षण एवं लड़ाकू विमान से भी सफलतापूर्वक परखा गया। रक्षा मंत्रालय द्वारा 23 सितंबर 2026 को जारी विवरण के मुताबिक, सैटेलाइट आधारित एसएएडब्ल्यू (सैट-एसएएडब्ल्यू) को जगुआर, हॉक और सुखोई-30 एमकेआई जैसे तीनों प्रमुख लड़ाकू विमानों से संचालित किया जा सकता है। सुखोई-30 एमकेआई जैसे भारी लड़ाकू विमान में जुड़ने से इसकी पहुंच और अभियान क्षमता में अत्यधिक इजाफा हो जाता है।
एसएएडब्ल्यू और सैट-एसएएडब्ल्यू में क्या अंतर है
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इन दोनों नामों के बीच का तकनीकी फर्क समझना आवश्यक है। एसएएडब्ल्यू इस संपूर्ण स्वदेशी हथियार परिवार का मूल नाम है, जबकि सैट-एसएएडब्ल्यू इसका विशेष सैटेलाइट नेविगेशन आधारित मॉडल है। रक्षा मंत्रालय ने 23 सितंबर 2026 को सैट-एसएएडब्ल्यू को हवा से जमीन पर मार करने वाला प्रिसिजन-गाइडेड ग्लाइड बम करार दिया है, जिसे डीआरडीओ द्वारा पूर्णतः डिजाइन और विकसित किया गया है। यह कोई स्व-संचालित रॉकेट या मिसाइल नहीं है, बल्कि वायुसेना के विमानों से प्रक्षेपित होने वाला उच्च तकनीकी प्रिसिजन ग्लाइड हथियार है जो बिना अपने रॉकेट मोटर के भी पंखों और लिफ्ट के सहारे 100 किलोमीटर तक तैरता हुआ लक्ष्य को मिटा देता है।
















