तेजाब हमले का दंश झेलने वाले लोगों को बेहतर इलाज के लिए दूरदराज के बड़े अस्पतालों तक पहुंचने में मदद करने के मकसद से रेलवे रियायत देने की कवायद चल रही है। देश की शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के तहत काम करने वाले दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग को इस नीति को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में सक्रिय तौर पर शामिल किया जाना चाहिए। इससे पीड़ितों को अपने इलाज के लिए उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधाओं तक रेल यात्रा करना काफी सुगम हो सकेगा।
नीति के मसौदे पर विचार और शीर्ष अदालत का सुझाव
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष पीठ इस मामले पर सुनवाई कर रही थी। पीठ के सामने यह तथ्य आया कि केंद्र सरकार ने याचिका दायर करने वाले एनजीओ अतिजीवन सोसाइटी सहित अन्य साझेदारों के साथ विचार-विमर्श करके पहले ही नीति का एक मसौदा तैयार कर लिया है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि जब अंतिम नीति को मूर्त रूप दिया जा रहा हो, तो दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग की भागीदारी भी इसमें अनिवार्य रूप से सुनिश्चित की जानी चाहिए, जिससे नीति के सभी पहलू व्यापक और समावेशी बन सकें।
केंद्र सरकार की सैद्धांतिक सहमति और समयसीमा
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए तारीख तय कर दी है। इससे पहले बीते 13 अगस्त को सरकार ने शीर्ष अदालत को सूचित किया था कि वह एसिड अटैक सर्वाइवर्स को ट्रेन किराए में छूट प्रदान करने वाली नीति तैयार करने पर सैद्धांतिक रूप से राजी हो चुकी है। उस दौरान अदालत ने रेल मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह इस मानवीय मुद्दे पर खुले दिल से और उदारतापूर्वक विचार करे। इसके साथ ही अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे को निर्देश दिया गया था कि वे छह सप्ताह के भीतर इस प्रस्तावित नीति का मसौदा अदालत के आधिकारिक रिकॉर्ड पर पेश करें।
मरीज श्रेणी के तहत रियायत देने का विकल्प
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने पीठ के समक्ष बताया कि केंद्र सरकार एसिड अटैक पीड़ितों को यह सुविधा 'मरीज कैटेगरी' के अंतर्गत देने पर विचार कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार को पीड़ितों को दिव्यांगजन की एक अलग श्रेणी में शामिल करने को लेकर कुछ आपत्तियां हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि वर्तमान समय में उस दिव्यांग वर्ग के अन्य लोगों को रेलवे की ओर से किराए में किसी तरह की छूट नहीं दी जाती है। इस तकनीकी अड़चन को देखते हुए सरकार इसे चिकित्सा या मरीज श्रेणी के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रस्ताव कर रही है।











