गन्ने की खेती में बेहतर बढ़वार के साथ-साथ फसल को खेत में सुरक्षित खड़ा रखना किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती होता है। गन्ना शोध संस्थान के प्रसार अधिकारी डॉ. संजीव कुमार पाठक के अनुसार, गन्ने के पौधों की बंधाई कृषि प्रबंधन का एक बेहद अहम हिस्सा है। जब गन्ने के पौधे 12 से 14 फीट की पूरी लंबाई हासिल कर लेते हैं, तब वजन बढ़ने और सिंचाई के बाद आई नमी के कारण तेज हवाओं में उनके गिरने का जोखिम काफी अधिक हो जाता है। अगर समय रहते फसल को सहारा न दिया जाए तो किसान को भारी वित्तीय क्षति उठानी पड़ सकती है।
गन्ने की फसल में बंधाई का महत्व और सही समय
खेती के विशेषज्ञों का मानना है कि गन्ने की बंधाई का समय किसी तय कैलेंडर तारीख के आधार पर निर्धारित करने के बजाय पौधे की भौतिक लंबाई के अनुसार तय किया जाना चाहिए। जब खेत में गन्ने की ऊँचाई लगभग 5 फीट के स्तर पर पहुँच जाए, तभी से पहली बंधाई का कार्य शुरू कर देना चाहिए। इस चरण में जमीन की सतह से करीब 1 से 1.5 फीट की ऊँचाई तक मौजूद सूखी पत्तियों को हटा दिया जाता है। इसके बाद एक ही पंक्ति में स्थित गन्ने के थानों को सूखी पत्तियों की मदद से आपस में सहारा देकर बांधा जाता है, जिससे पौधे की जड़ों को शुरुआती मजबूती मिलती है।
फसल गिरने से होने वाले नुकसान और प्रकाश संश्लेषण पर असर
गन्ने के पौधे जब खेत में गिर जाते हैं, तो उनकी हरी पत्तियाँ सीधी धूप और खुली हवा से पूरी तरह वंचित हो जाती हैं। जमीन की नमी के संपर्क में लगातार रहने से पत्तियाँ सड़ने लगती हैं, जिससे पौधे की प्रकाश संश्लेषण यानी भोजन बनाने की प्राकृतिक प्रक्रिया पूरी तरह रुक जाती है। "अच्छी बढ़वार के बाद यदि गन्ना गिर जाता है, तो पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पूरी तरह बाधित हो जाती है," डॉ. संजीव कुमार पाठक ने बताया। ऐसी स्थिति में पौधा जीवित रहने के लिए अपनी संचित ऊर्जा का इस्तेमाल करने लगता है, जिससे तने का विकास ठप हो जाता है और गन्ने की मोटाई व रस में गिरावट आने लगती है।
तीन चरणों में बंधाई करने की सटीक वैज्ञानिक तकनीक
गन्ने के पौधों को सीधा खड़ा रखने के लिए बंधाई का कार्य तीन अलग-अलग चरणों में पूरा किया जाता है। पहली बंधाई के लगभग 15 से 20 दिन बीत जाने के बाद दूसरी बंधाई की प्रक्रिया अपनाई जाती है। यह दूसरी बंधाई पहली बंधाई वाले स्थान से तकरीबन 50 सेंटीमीटर ऊपर की तरफ की जाती है। इसमें भी पौधों की निचली सूखी पत्तियों को बटोरकर गन्नों को ऊपर की ओर मजबूती से बांधा जाता है। जैसे-जैसे गन्ने का पौधा लंबा और भारी होता जाता है, यह बंधाई उसे तेज हवा के थपेड़ों से सुरक्षित रखती है और तने को झुकने नहीं देती।
कैंची बंधाई की तकनीक और खेत का संपूर्ण ढांचा
बंधाई का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण अगस्त के अंतिम सप्ताह या सितंबर के पहले सप्ताह में पूरा किया जाता है। कृषि विज्ञान में इसे 'कैंची बंधाई' या क्रॉस बाइंडिंग के नाम से जाना जाता है। इस विशेष तकनीक में एक कतार के दो थानों को पास वाली दूसरी कतार के एक थाने के साथ कैंची के आकार में मिलाकर मजबूती से बांधा जाता है। इसके अगले क्रम में दूसरी लाइन के दो थानों को पहली लाइन के एक थाने के साथ जोड़ा जाता है। इस तरह पूरे खेत के पौधे आपस में एक सुदृढ़ जाल की तरह बंध जाते हैं, जिससे भयंकर आंधी में भी फसल नहीं गिरती।
उत्पादन, चीनी परता और बीज की गुणवत्ता पर प्रभाव
समय पर और वैज्ञानिक तरीके से की गई बंधाई फसल को विपरीत मौसम के दुष्प्रभावों से बचाती है। यदि गन्ना गिर जाता है, तो किसान को कुल उपज में 18 प्रतिशत से लेकर 38 प्रतिशत तक का सीधा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। इसके अलावा गन्ने में मौजूद शर्करा की मात्रा यानी चीनी परता में भी भारी कमी आ जाती है। जमीन पर पड़े गन्ने की आंखें सड़ने लगती हैं या समय से पहले अंकुरित हो जाती हैं, जिससे वह गन्ना अगले सत्र में बीज के रूप में इस्तेमाल करने लायक नहीं बचता। उचित प्रबंधन से खेत में हवा और धूप की आवाजाही बनी रहती है और फसल की गुणवत्ता उच्चतम बनी रहती है।



















