पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने युवा जोड़ों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मजबूत करते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत प्यूबर्टी (यौवन) हासिल कर चुका कोई भी व्यक्ति अपनी पसंद के साथी से विवाह करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। यह आदेश एक युवा मुस्लिम जोड़े द्वारा दायर की गई सुरक्षा याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिन्होंने अपने परिवारों की मर्जी के खिलाफ जाकर निकाह किया था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि सामाजिक या पारिवारिक विरोध के बावजूद, भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकार सर्वोपरि हैं। अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि कोई विपरीत मेडिकल या दस्तावेजी प्रमाण न हो, तो 15 वर्ष की आयु पूरी होने पर कानूनन यह मान लिया जाएगा कि व्यक्ति ने प्यूबर्टी हासिल कर ली है।
15 साल की उम्र में प्यूबर्टी की कानूनी धारणा
हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले में कानूनी सिद्धांतों का गहराई से विश्लेषण किया और सर दिनशाह फरदूनजी मुल्ला की प्रसिद्ध पुस्तक 'प्रिंसिपल्स ऑफ महोमडन लॉ' के आर्टिकल 195 का विशेष रूप से उल्लेख किया। इस कानूनी ढांचे के अंतर्गत, शादी करने की योग्यता के मामले में प्यूबर्टी प्राप्त करने को वयस्कता (मेजॉरिटी) के समान माना गया है। माननीय अदालत ने इस संबंध में तीन अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांतों को रेखांकित किया। सबसे पहला सिद्धांत 'फ्री विल' यानी स्वतंत्र इच्छा का है, जिसके अनुसार प्यूबर्टी हासिल कर चुका कोई भी मुस्लिम लड़का या लड़की अपनी पसंद के जीवनसाथी से विवाह करने का पूरा कानूनी अधिकार रखता है।
दूसरा सिद्धांत 'पेरेंटल वीटो' यानी माता-पिता या अभिभावकों के हस्तक्षेप को पूरी तरह खारिज करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि परिवार या संरक्षकों के पास ऐसी शादी को रोकने, उसे अवैध घोषित करने या उसमें दखल देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। तीसरा बिंदु 'लीगल प्रिजंपशन' यानी कानूनी धारणा का है, जिसके तहत जब तक कोई ठोस मेडिकल या दस्तावेजी सबूत विपरीत परिस्थिति को साबित न करे, तब तक 15 साल की उम्र पार करने वाले हर व्यक्ति को कानूनन प्यूबर्टी हासिल कर चुका माना जाएगा।
आर्टिकल 21 और जीवन व सुरक्षा का मौलिक अधिकार
यह पूरा मामला तब अदालत के समक्ष आया जब एक नवविवाहित मुस्लिम जोड़े ने सुरक्षा की गुहार लगाते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। इस जोड़े का आरोप था कि अपनी मर्जी से शादी करने के कारण उन्हें अपने ही परिजनों से जान-माल का गंभीर खतरा सता रहा है। इस संवेदनशील मुद्दे पर सुनवाई करते हुए अदालत ने भारतीय संविधान के आर्टिकल 21 का हवाला दिया, जो देश के प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हाईकोर्ट ने दृढ़ता से कहा कि जब देश के किसी नागरिक की जान और आजादी पर खतरा मंडरा रहा हो, तो अदालतें अपनी आंखें बंद नहीं रख सकतीं। भले ही यह निकाह परिवार के सदस्यों की सहमति के बिना हुआ हो, लेकिन इस आधार पर किसी भी व्यक्ति को सुरक्षा और गरिमा के साथ जीने के उसके बुनियादी संवैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
पर्सनल लॉ और सामान्य कानूनों के बीच का कानूनी द्वंद्व
हाईकोर्ट का यह फैसला भारत में चल रही एक बेहद व्यापक और जटिल कानूनी बहस को दोबारा चर्चा के केंद्र में ले आया है। इस बहस के एक छोर पर विभिन्न पर्सनल लॉ हैं, तो दूसरी तरफ POCSO (पॉक्सो) और PCMA (बाल विवाह निषेध अधिनियम) जैसे बेहद कड़े सामान्य कानून मौजूद हैं। सामान्य नागरिक कानूनों के तहत भारत में शादी के लिए लड़कियों की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष निर्धारित की गई है। इसके विपरीत, जब अपनी मर्जी से घर छोड़कर शादी करने वाले जोड़ों के जीवन और स्वतंत्रता पर बन आती है, तो विभिन्न उच्च न्यायालयों ने बार-बार मानवीय और संवैधानिक रुख अपनाया है। ऐसे मामलों में अदालतों ने अक्सर पर्सनल लॉ के तहत प्यूबर्टी के नियमों को मान्यता दी है ताकि संकट में घिरे जोड़ों को आवश्यक पुलिस सुरक्षा प्रदान की जा सके और उनके जीवन की रक्षा की जा सके।


















