सुप्रीम कोर्ट में हिमाचल प्रदेश की बड़ी जीत, बीबीएमबी विवाद सुलझा, सालाना 1000 करोड़ तक का होगा फायदातकनीकी दबाव में फिसला यूरो, अमेरिकी डॉलर के सामने 1.1200 का अहम स्तर टूटामहज 100 रुपये से शुरू किया कारोबार, अब लाखों की कमाई कर रहे हैं मुरादाबाद के मोहम्मद फिरोजओबीसी क्रीमी लेयर मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र सरकार की अर्जी खारिजहिमाचल के सम्मू गांव में दिवाली पर क्यों पसरा रहता है सन्नाटा, जानिए सात पीढ़ियों से चली आ रही अनूठी परंपराराजस्थान में बीजेपी की स्थाई सत्ता का मदन राठौड़ ने जताया भरोसा, डोटासरा और गहलोत पर किए तीखे प्रहारझालावाड़ में मिलावट के खिलाफ बड़ी कार्रवाई, तीन हजार किलो संदिग्ध मावा सीज और मिठाइयां नष्टअमेज़न पर ₹699 की शुरुआती कीमत से मिल रहे रूम हीटर, ओरिएंट इलेक्ट्रिक और फास्ट्रॉन के मॉडलों पर भारी छूटबल्लभगढ़ बस स्टैंड पर बढ़ी बसों की संख्या, आगरा और अलीगढ़ जाने वालों के लिए राहतदिवाली 2026 पर संडे को होगी मुहूर्त ट्रेडिंग और 10 नवंबर को बंद रहेगा शेयर बाजार, नया शेड्यूल जारी
गाड़ी की कंडक्टरी छोड़ गांव में शुरू किया बकरी पालन, उत्तराखंड के प्रेम सिंह बने मिसालउत्तराखंड
29 अक्तू॰ 2026, 2:12 am (8 दिन पहले)· 2

गाड़ी की कंडक्टरी छोड़ गांव में शुरू किया बकरी पालन, उत्तराखंड के प्रेम सिंह बने मिसाल

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में स्थित झोपड़ा गांव के निवासी प्रेम सिंह पिछले एक दशक से बकरी पालन के जरिए अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। बस परिचालक की नौकरी छोड़ गांव में स्वरोजगार अपनाने वाले प्रेम सिंह की यह पहल पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन रोकने की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण है।

उत्तराखंड के पहाड़ी अंचलों में आजीविका के अवसरों की हमेशा से कमी रही है, जिसके कारण बड़ी संख्या में युवा अपने घरों को छोड़कर मैदानी इलाकों का रुख करते हैं। ऐसे माहौल में बागेश्वर जिले के झोपड़ा गांव से एक ऐसी कहानी सामने आई है जो आत्मनिर्भरता की राह दिखाती है। गांव के निवासी प्रेम सिंह पिछले करीब 10 वर्षों से बकरी पालन करके अपने पूरे परिवार का खर्च सफलता से चला रहे हैं। बाहर रहकर नौकरी करने के बजाय उन्होंने अपनी मिट्टी में ही स्वरोजगार की जड़ें जमाने का फैसला किया और आज वह ग्रामीण अर्थशास्त्र के लिए एक मिसाल बन चुके हैं।

वाहनों की परिचालकी छोड़ गांव में शुरू की अपनी राह

बकरी पालन को अपनी कमाई का जरिया बनाने से पहले प्रेम सिंह कई सालों तक यात्री वाहनों में परिचालक के तौर पर काम करते थे। इस नौकरी के दौरान उनका अधिकांश समय अपने घर और परिवार से दूर सड़कों पर ही बीतता था। समय बीतने के साथ उन्होंने महसूस किया कि अपनों से दूर रहकर काम करने के बजाय गांव में रहकर ही आजीविका का कोई टिकाऊ साधन खोजना बेहतर होगा। परिवार के साथ वक्त बिताने और गांव की आबोहवा में रहने के इसी संकल्प ने उन्हें बकरी पालन का काम शुरू करने के लिए प्रेरित किया।

ये भी पढ़ें

शुरुआत में छोटे स्तर पर बकरियां खरीदकर काम शुरू करने वाले प्रेम सिंह ने धीरे-धीरे अपने पशुधन को बढ़ाया। आज बकरी पालन ही उनकी आय का मुख्य जरिया बन चुका है। वह बकरियों का पालन करते हैं और परिवार की वित्तीय जरूरतों के अनुसार उन्हें बाजार में बेचकर आमदनी हासिल करते हैं। उनका कहना है कि इस काम से उनके परिवार का गुजारा बेहद अच्छी तरह से चल रहा है और उन्हें अब काम के सिलसिले में घर से बाहर जाने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती।

दुर्गम रास्तों और बदलते मौसम के बीच कड़ी मेहनत

पहाड़ों में बकरी पालन को जितना आसान समझा जाता है, धरातल पर यह उतना ही चुनौतीपूर्ण काम है। बकरियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखने से लेकर उनके खाने-पीने का समय तय करना एक जिम्मेदारी भरा काम है। पर्वतीय भूगोल की कठिन परिस्थितियों के कारण पशुपालकों को बकरियों को चराने के लिए कई किलोमीटर दूर तक पैदल जाना पड़ता है। इस दौरान हर एक बकरी पर लगातार नजर रखनी होती है ताकि वे ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर भटक न जाएं या किसी हादसे का शिकार न हों।

इसके अलावा मौसम का मिजाज बदलने पर पशुओं को ठंड, बारिश या तेज धूप से बचाना भी एक बड़ी परीक्षा होती है। यदि कोई बकरी बीमार पड़ जाए तो उसके तुरंत इलाज और देखभाल का इंतजाम करना पड़ता है। पशुओं के स्वास्थ्य में थोड़ी सी भी लापरवाही सीधे तौर पर आय को प्रभावित कर सकती है। इसलिए इस व्यवसाय में शारीरिक मेहनत के साथ-साथ अत्यधिक धैर्य, समय और चौकसी की जरूरत होती है।

पहाड़ की अर्थव्यवस्था और पलायन रोकने में पशुपालन की भूमिका

प्रेम सिंह की यह सफलता उन तमाम ग्रामीण युवाओं के लिए एक दिशा-निर्देश है जो अपने गांव में रहकर ही रोजगार तलाशना चाहते हैं। पहाड़ी राज्यों में सीमित संसाधनों और कम खेती योग्य भूमि के बीच पशुपालन हमेशा से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा सहारा रहा है। बकरी पालन जैसे कम लागत वाले स्वरोजगार के अवसरों से न केवल स्थानीय स्तर पर आय पैदा होती है, बल्कि यह गांवों से होने वाले जबरन पलायन को रोकने में भी बेहद कारगर साबित हो सकता है।

हालांकि, विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का मानना है कि इस तरह के पारंपरिक व्यवसायों को और अधिक बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर सुविधाएं मिलना बेहद जरूरी है। गांवों में पशु स्वास्थ्य सेवाओं की आसान उपलब्धता, गुणवत्तापूर्ण चारे का प्रबंध और पशुपालकों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए संगठित बाजार की व्यवस्था होना आवश्यक है। अगर प्रेम सिंह जैसी मेहनत और सही नीतियां एक साथ मिल जाएं, तो पहाड़ में मौजूद संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर ग्रामीण जीवन को खुशहाल बनाया जा सकता है।

सवाल-जवाब

प्रेम सिंह किस गांव और जिले के रहने वाले हैं?
प्रेम सिंह उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में स्थित झोपड़ा गांव के निवासी हैं।
बकरी पालन शुरू करने से पहले प्रेम सिंह क्या काम करते थे?
बकरी पालन अपनाने से पहले वह कई वर्षों तक यात्री वाहनों में परिचालक यानी कंडक्टर के रूप में काम करते थे।
उन्होंने बस कंडक्टर की नौकरी क्यों छोड़ी?
वाहनों में काम करने के कारण उनका अधिकतर समय घर से बाहर बीतता था, इसलिए उन्होंने परिवार के साथ गांव में रहकर आजीविका कमाने का निर्णय लिया।
प्रेम सिंह को बकरी पालन करते हुए कितना समय हो चुका है?
वह पिछले लगभग 10 वर्षों से लगातार बकरी पालन का काम कर रहे हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों में बकरी पालन में क्या प्रमुख चुनौतियां आती हैं?
बकरियों को चराने के लिए दुर्गम रास्तों पर लंबी दूरी तय करना, बदलते मौसम से बचाना और बीमारियों का सही समय पर इलाज कराना मुख्य चुनौतियां हैं।
बकरी पालन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पलायन पर क्या असर पड़ता है?
यह स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार पैदा करता है, जिससे गांव के लोगों को रोजगार के लिए बाहर जाने की मजबूरी कम होती है और ग्रामीण अर्थशास्त्र मजबूत होता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·8 दिन पहले

कंडक्टरी छोड़कर पहाड़ों में खुद का काम शुरू करना आसान नहीं, गज़ब का हौसला है प्रेम सिंह का।

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 दिन पहले

पलायन रोकना है तो ऐसी आत्मनिर्भरता ही रास्ता दिखाएगी।

Ravikash Gupta@ravikash·8 दिन पहले

अर्जुन जी, बागेश्वर के इस झोपड़ा गांव का नाम पहली बार सुना, लेकिन प्रेम सिंह का बस की कंडक्टरी छोड़ना सही फैसला लगा।

Rohan Verma@rohan-verma·8 दिन पहले

पहाड़ों में बस कंडक्टर की नौकरी छोड़ना और फिर घर लौटकर इस तरह मेहनत से बकरी पालन करना वाकई हिम्मत का काम है। बस यह समझ नहीं आया कि प्रेम सिंह ने शुरुआती दिनों में बकरियां खरीदने के लिए पैसे जुटाए कहाँ से थे?

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 दिन पहले

रोहन भाई, आपने बिल्कुल सही सवाल उठाया। बस की कण्डक्टरी से हटकर सीधे बकरियों पर आना आसान नहीं होता, शुरुआती पैसों का जुगाड़ कैसे हुआ यह वाकई जानने वाली बात है।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp