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गोबर और पराली से बनेगी गैस, 23731 करोड़ रुपये की गोबरधन योजना में सरकार करेगी पूरी खरीदबिहार
20 सित॰ 2026, 2:55 pm (5 दिन पहले)· 0

गोबर और पराली से बनेगी गैस, 23731 करोड़ रुपये की गोबरधन योजना में सरकार करेगी पूरी खरीद

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 23,731 करोड़ रुपये के वित्तीय आवंटन के साथ गोबरधन योजना के संचालन को मंजूरी दे दी है। इसके तहत सीबीजी उत्पादकों को तय कीमत, वित्तीय मदद और शत-प्रतिशत गैस खरीद का भरोसा दिया गया है।

ग्रामीण क्षेत्रों में जैविक अपशिष्ट के प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को रफ्तार देने के लिए केंद्र सरकार ने 23,731 करोड़ रुपये की व्यापक गोबरधन योजना का आधिकारिक खाका लागू कर दिया है। इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण यह है कि ग्रामीण इलाकों में प्रचुर मात्रा में मिलने वाले पशुओं के गोबर, फसल अवशेष और जैविक कचरे को ऊर्जा में बदला जा सकेगा। सबसे अहम बात यह है कि इस नई व्यवस्था के तहत कंप्रेस्ड बायोगैस तैयार करने वाले उद्यमियों को अपने उत्पाद के विपणन को लेकर परेशान नहीं होना पड़ेगा, क्योंकि सरकारी व्यवस्था के तहत उनके समूचे उत्पादन की खरीद का मुकम्मल प्रबंध किया गया है।

दस वर्षों के लिए तय किया गया ढांचा

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार, यह महत्वाकांक्षी पहल वित्त वर्ष 2026-27 से प्रभावी होकर वित्त वर्ष 2035-36 तक कुल दस वर्षों की अवधि के लिए संचालित की जाएगी। इसका प्राथमिक लक्ष्य देश के भीतर सीबीजी निर्माण क्षमताओं का विस्तार करना, संयंत्रों के लिए एक स्थिर और सुरक्षित बाजार तंत्र तैयार करना तथा निजी निवेशकों को इस क्षेत्र में पूंजी लगाने के लिए प्रेरित करना है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत पशुओं के गोबर, कृषि जनित अवशेषों, रसोई व खाद्य अपशिष्ट और तमाम तरह के जैविक कचरों का उपयोग करके बायोगैस, कंप्रेस्ड बायोगैस और उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद का उत्पादन किया जाना है। इस तरह तैयार सीबीजी को प्राकृतिक गैस ग्रिड के साथ मिश्रित करके सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाएगा।

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योजना के छह प्रमुख स्तंभ और वित्तीय कवच

मंत्रालय द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों में इस संपूर्ण तंत्र को सुदृढ़ बनाने के लिए छह मुख्य प्रावधान तय किए गए हैं। इन प्रावधानों में सीबीजी की शत-प्रतिशत खरीद की गारंटी, पारदर्शी मूल्य निर्धारण व्यवस्था, पूंजीगत वित्तीय सहायता, आवश्यक पाइपलाइन अवसंरचना का विकास, ऋण गारंटी सुरक्षा और सीबीजी पारिस्थितिकी चैलेंज फंड शामिल हैं। नई व्यवस्था के तहत पात्र संयंत्र संचालकों को यह विशेष विकल्प मिलेगा कि वे अपने संयंत्र में बिक्री के लिए तैयार होने वाली कुल गैस की 100 फीसदी मात्रा सीधे सुनिश्चित तंत्र के जरिए बेच सकें। इसके अलावा संयंत्र स्थापित करने वाले निवेशकों को पूरे दस वर्षों तक निर्धारित प्रशासित मूल्य और पूंजीगत सब्सिडी का लाभ भी दिया जाएगा।

गैस वितरण कंपनियों के लिए खरीद का अनिवार्य लक्ष्य

उत्पादित गैस की नियमित खपत सुनिश्चित करने के लिए सप्लाई नेटवर्क को शहरी गैस वितरण यानी सीजीडी कंपनियों और उनके अधिकृत भौगोलिक क्षेत्रों से सीधे लिंक किया जाएगा। इसके अतिरिक्त जहां सीबीजी क्लस्टर स्थापित होंगे, वहां से गैस को एकत्र करके मुख्य ट्रांसमिशन पाइपलाइन में डालने का ढांचा भी तैयार होगा। नीतिगत नियमों के तहत नगर गैस वितरण कंपनियों के लिए अपने सीएनजी परिवहन और घरेलू पीएनजी आपूर्ति में सीबीजी का निश्चित अनुपात खरीदना और बेचना अनिवार्य बना दिया गया है। यह बाध्यता वित्त वर्ष 2026-27 में 3 फीसदी से आरंभ होगी, जो वित्त वर्ष 2027-28 में बढ़कर 4 फीसदी और वित्त वर्ष 2028-29 से 5 फीसदी के स्तर पर लागू रहेगी।

मूल्य निर्धारण और उत्पादकों के लिए दरें

सरकार ने सीबीजी उत्पादकों के आर्थिक स्थायित्व को ध्यान में रखते हुए 2,110 रुपये प्रति यूनिट (एमएमबीटीयू) की दर निर्धारित की है। 95 फीसदी मीथेन की मात्रा के आधार पर यह दर लगभग 98 रुपये प्रति किलोग्राम बैठती है। इस निर्धारित दर में स्थानीय कर और कंप्रेशन से जुड़ा खर्च शामिल नहीं है। सरकार द्वारा तय की गई यह आधार दर कम से कम 31 मार्च 2036 तक प्रभावी रहेगी। हालांकि उत्पादन लागत में होने वाले उतार-चढ़ाव, मुद्रास्फीति और अन्य बाजार परिस्थितियों की नियमित समीक्षा के आधार पर आगामी समय में इस दर में जरूरी संशोधन करने का विकल्प भी खुला रखा गया है।

सवाल-जवाब

गोबरधन योजना का कुल वित्तीय बजट कितना है?
इस योजना के लिए सरकार ने 23,731 करोड़ रुपये का कुल वित्तीय आवंटन निर्धारित किया है।
यह योजना कब से कब तक लागू रहेगी?
यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से आरंभ होकर वित्त वर्ष 2035-36 तक कुल दस वर्षों के लिए लागू रहेगी।
सीबीजी के लिए सरकार ने क्या खरीद दर तय की है?
सरकार ने 2,110 रुपये प्रति यूनिट (एमएमबीटीयू) की दर तय की है, जो 95 फीसदी मीथेन के आधार पर करीब 98 रुपये प्रति किलोग्राम बैठती है।
कंप्रेस्ड बायोगैस बनाने के लिए किस कच्चे माल का उपयोग किया जाएगा?
इसमें पशुओं का गोबर, कृषि अवशेष, पराली, खाद्य अपशिष्ट और अन्य जैविक कचरे का उपयोग किया जाएगा।
योजना के तहत उत्पादकों को कितने प्रतिशत गैस खरीद का भरोसा दिया गया है?
पात्र उत्पादक अपनी बिक्री योग्य कंप्रेस्ड बायोगैस की 100 फीसदी तक सुनिश्चित खरीद का विकल्प चुन सकते हैं।
शहरी गैस वितरण कंपनियों के लिए सीबीजी खरीद के क्या लक्ष्य तय किए गए हैं?
कंपनियों को वित्त वर्ष 2026-27 में 3 फीसदी, 2027-28 में 4 फीसदी और 2028-29 से 5 फीसदी सीबीजी खरीदना और आपूर्ति में मिलाना अनिवार्य होगा।
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टिप्पणियाँ 5

Amit Patel@amit-patel·4 दिन पहले

इस नीति का सबसे बड़ा आर्थिक पहलू यह है कि १० साल की शत-प्रतिशत खरीद गारंटी और निर्धारित मूल्य व्यवस्था से बायोगैस क्षेत्र का व्यावसायिक जोखिम लगभग खत्म हो जाएगा। अब तक वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजनाओं में बाजार की अनिश्चितता सबसे बड़ी बाधा थी। २३,७३१ करोड़ रुपये के इस वित्तीय कवच और अनिवार्य खरीद लक्ष्यों के बाद, यह क्षेत्र घरेलू और विदेशी निजी निवेशकों के लिए एक सुरक्षित और दीर्घकालिक निवेश का जरिया बनेगा। इससे न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था में स्टार्टअप्स और उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि पर्यावरण-अनुकूल स्वच्छ ऊर्जा बुनियादी ढांचे में निजी पूंजी का प्रवाह भी तेजी से बढ़ेगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

नीतिगत और प्रशासनिक दृष्टि से यह योजना भारत की ऊर्जा सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बीच रणनीतिक सेतु का काम करेगी। 23,731 करोड़ रुपये के परिव्यय और शत-प्रतिशत खरीद की गारंटी ने निजी पूंजी के लिए बाजार जोखिम को लगभग समाप्त कर दिया है। यह पहल आयातित गैस पर निर्भरता घटाने के साथ-साथ पराली और जैविक अपशिष्ट जैसी गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं का व्यावहारिक आर्थिक समाधान पेश करती है। हालांकि, इस नीति की दीर्घकालिक सफलता राज्यों के साथ प्रशासनिक समन्वय, ग्रामीण बायोमास आपूर्ति श्रृंखला की निरंतरता और नगर गैस वितरण कंपनियों द्वारा खरीद अनुपालन की सख्त निगरानी पर निर्भर करेगी।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

वित्तीय और बाज़ार के दृष्टिकोण से, 100% खरीद गारंटी और 10 वर्षों का प्रशासित मूल्य तंत्र सीबीजी परियोजनाओं के बाज़ार जोखिम को पूरी तरह समाप्त कर देता है। अब तक अनिश्चित मांग और कीमतों के उतार-चढ़ाव के कारण संस्थागत निवेशक और बैंक इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पूंजी लगाने से हिचकिचाते थे। यह नीतिगत ढांचा इन बायो-एनर्जी परिसंपत्तियों को 'बैंकेबल' बनाएगा, जिससे ग्रीन-टेक स्टार्टअप्स और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर में निजी निवेश व बैंक ऋण का प्रवाह तेज़ी से बढ़ेगा। इसके अलावा, नगर गैस वितरण में अनिवार्य सम्मिश्रण से सुनिश्चित राजस्व मिलेगा, जो लंबी अवधि में देश के महंगे एलएनजी आयात पर निर्भरता घटाकर चालू खाता घाटे को भी सहारा देगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

पराली जलाने की समस्या लंबे समय से अदालती मुकदमों, दंडात्मक कार्यवाहियों और प्रशासन के साथ किसानों के टकराव का बड़ा कारण रही है। सर्वोच्च न्यायालय की लगातार सख्ती और वायु गुणवत्ता नियमों के तहत दर्ज होने वाली एफआईआर ने ग्रामीण स्तर पर कानून-व्यवस्था के कई पेचीदा सवाल खड़े किए हैं। यदि पराली और जैविक कचरे की शत-प्रतिशत खरीद का यह ढांचा जमीन पर सफल रहता है, तो इससे पर्यावरणीय अपराधों और प्रशासनिक टकराव में खासी कमी आ सकती है। हालांकि, 23,731 करोड़ रुपये के भारी आवंटन और सब्सिडी व्यवस्था को देखते हुए फर्जी संयंत्रों और वित्तीय गड़बड़ियों से बचाव के लिए कड़े कानूनी ऑडिट और निगरानी तंत्र की भी सख्त दरकार रहेगी।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

करण के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, उत्तर प्रदेश जैसे विशाल कृषि-प्रधान राज्य में इस योजना का वास्तविक परीक्षण इसके ज़मीनी क्रियान्वयन में होगा। ब्लॉक और पंचायत स्तर पर कचरा संग्रह केंद्रों की स्थापना में बिचौलियों और स्थानीय रसूखदारों के दखल को रोकना प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। यदि पारदर्शी डिजिटल ट्रैकिंग जैसी व्यवस्था नहीं की गई, तो यह भारी-भरकम सब्सिडी ज़मीनी किसानों के बजाय केवल कागज़ी संयंत्रों तक सीमित रह सकती है। बुनियादी ढाँचे का पारदर्शी विकास ही इसे सफल बनाएगा।

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