गुजरात के आणंद जिले में नाबालिग पीड़िता से दुष्कर्म और उत्पीड़न से जुड़े एक पॉक्सो मामले में कानूनी प्रक्रिया सोशल मीडिया के एक तकनीकी साक्ष्य पर केंद्रित हो गई है। मुकदमे की सुनवाई बालिग के तौर पर विशेष पॉक्सो अदालत में होगी या जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के समक्ष किशोर के रूप में, यह सवाल एक विवादित इंस्टाग्राम संदेश के विश्लेषण पर निर्भर हो गया है। गुजरात हाईकोर्ट ने इस तकनीकी पेंच को देखते हुए मामले को दोबारा जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के पास भेज दिया है ताकि फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी से नए सिरे से रिपोर्ट हासिल कर आरोपी की सही कानूनी उम्र निर्धारित की जा सके।
एफआईआर की पृष्ठभूमि और दो आरोपियों की भूमिका
यह कानूनी विवाद साल 2023 में दर्ज एक प्राथमिकी से शुरू हुआ था। एक पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि दो युवकों ने उनकी नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म किया और बाद में सोशल मीडिया पर संदेश भेजकर लगातार प्रताड़ित किया। पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत के विवरण के अनुसार, शारीरिक शोषण की कथित वारदात फरवरी 2023 में हुई थी। इसके पश्चात इंस्टाग्राम पर आपत्तिजनक संदेश भेजकर लड़की को मानसिक तौर पर परेशान करने का सिलसिला जारी रहा।
मामले में नामजद दोनों आरोपियों की उम्र को लेकर कानूनी स्थिति भिन्न है। साल 2003 में जन्मे पहले आरोपी की उम्र घटना के समय बालिग होने के दायरे में आती है, लिहाजा उसका मुकदमा विशेष पॉक्सो अदालत में चलना पहले से तय है। असल कानूनी विवाद 15 जुलाई 2005 को जन्मे दूसरे आरोपी की उम्र को लेकर खड़ा हुआ है। दूसरे आरोपी के बचाव पक्ष का तर्क है कि जब फरवरी 2023 में कथित शारीरिक शोषण हुआ, तब उसकी आयु केवल 17 साल 7 महीने थी। बचाव पक्ष की दलील है कि 18 वर्ष से कम आयु होने के कारण उसे किशोर माना जाए और उस पर बालिग की तरह नियमित अदालत में नहीं बल्कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के तहत कार्यवाही की जाए।
चिल्ड्रन्स कोर्ट का आदेश और आखिरी संदेश का विवाद
जनवरी 2024 में, पॉक्सो अदालत के तौर पर सुनवाई कर रही चिल्ड्रन्स कोर्ट ने दूसरे आरोपी को बालिग मानते हुए उसके खिलाफ सामान्य अदालत में मुकदमा चलाने का फैसला सुनाया था। अदालत ने अपने फैसले में 22 जुलाई 2023 की तारीख को आधार बनाया, जब मोबाइल से कथित तौर पर आखिरी आपत्तिजनक संदेश भेजा गया था। उस तारीख पर आरोपी की उम्र 18 साल और सात दिन दर्ज की गई थी। चिल्ड्रन्स कोर्ट ने शारीरिक शोषण और उसके बाद ऑनलाइन भेजे गए संदेशों को एक ही निरंतर चलने वाला अपराध माना और निष्कर्ष निकाला कि अपराध की आखिरी घटना के समय आरोपी बालिग हो चुका था।
इस निर्णय के खिलाफ आरोपी के पिता ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अक्टूबर 2024 में गुजरात हाईकोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को निर्देश दिया था कि वह अपराध की आखिरी तारीख पर आरोपी की उम्र का निर्धारण करे और फॉरेंसिक रिपोर्ट पर विचार करे। उस समय फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट के आधार पर यह माना गया था कि आरोपी के फोन से आखिरी संदेश उसके 18 वर्ष का होने के एक सप्ताह बाद भेजा गया था। इसके बाद विशेष पॉक्सो अदालत में ट्रायल की प्रक्रिया आगे बढ़ी, जहां फॉरेंसिक अधिकारी से जिरह और पूछताछ की गई।
फॉरेंसिक साक्ष्य में प्राप्तकर्ता को लेकर अनिश्चितता
मुकदमे की सुनवाई पूरी होने से ठीक पहले आरोपी ने सबूत दर्ज किए जाने के दौरान सामने आए नए तथ्यों का हवाला देते हुए खुद को नाबालिग घोषित कराने के लिए दोबारा हाईकोर्ट में अपील दायर की। बचाव पक्ष के वकील ने फॉरेंसिक रिपोर्ट और फॉरेंसिक अधिकारी के अदालती बयानों को रेखांकित करते हुए दलील दी कि यद्यपि संदेश भेजे जाने का टाइमस्टैम्प 22 जुलाई 2023 है, लेकिन दस्तावेज यह साबित नहीं करते कि वह संदेश वास्तव में पीड़िता को ही भेजा गया था या किसी तीसरे व्यक्ति को।
गुजरात हाईकोर्ट ने इस कानूनी बिंदु को बेहद महत्वपूर्ण माना। अदालत ने दर्ज किया कि जब तक यह स्पष्ट नहीं हो जाता कि आखिरी संदेश पीड़िता को मिला था या नहीं, तब तक अपराध की अंतिम तारीख निर्धारित करने का आधार कमजोर पड़ जाता है। संदेश के प्राप्तकर्ता की पहचान संदिग्ध होने के चलते हाईकोर्ट ने मामले की फाइल फिर से जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के पास भेज दी ताकि नए सिरे से फॉरेंसिक राय प्राप्त की जा सके।
सोशल मीडिया चैट और जुवेनाइल कानून के मायने
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की चैट के आधार पर किसी आरोपी की कानूनी उम्र और जुवेनाइल स्थिति तय करने का यह एक दुर्लभ कानूनी मामला है। फॉरेंसिक टीम को अब यह प्रमाणित करना होगा कि विवादित इंस्टाग्राम संदेश किस निश्चित तारीख और समय पर भेजा गया था और उसका वास्तविक प्राप्तकर्ता कौन था।
जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड अब फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के नए निष्कर्षों के आधार पर तय करेगा कि आरोपी को सत्र अदालत भेजा जाए अथवा बोर्ड स्वयं मामले का निपटारा करे। यदि आरोपी बालिग साबित होता है, तो पॉक्सो कानून के गंभीर प्रावधानों के तहत उसे उम्रकैद जैसी सख्त सजा हो सकती है। वहीं, यदि उसे घटना के समय किशोर माना जाता है, तो कानून के तहत अधिकतम तीन साल तक सुधार गृह में रखे जाने का प्रावधान लागू होगा।


















