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हरिद्वार में 172 साल पुराने ये पुल आज भी नए कंक्रीट ढांचों को दे रहे हैं मातउत्तराखंड
5 सित॰ 2026, 7:04 am (17 दिन पहले)· 2

हरिद्वार में 172 साल पुराने ये पुल आज भी नए कंक्रीट ढांचों को दे रहे हैं मात

हरिद्वार में गंगा नहर पर बने चूने-सुर्खी के कई पुल 172 साल बाद भी आधुनिक कंक्रीट के पुलों से ज्यादा मजबूत बने हुए हैं, इनमें हाथी पुल, ललतारव पुल और मायापुर पुल जैसे ऐतिहासिक ढांचे शामिल हैं।

हरिद्वार में गंगा नहर पर टिके कुछ पुराने पुल आज भी उतनी ही मजबूती से खड़े हैं जितनी मजबूती से वे डेढ़ सदी पहले खड़े किए गए थे, जबकि इनके इर्द-गिर्द बने कई नए कंक्रीट ढांचे उम्र से पहले ही कमजोर पड़ने लगे हैं। चूने और सुर्खी से तैयार ये पुल सीमेंट या सरिए के बिना ही बनाए गए थे, फिर भी 172 साल बाद भी इनकी नींव नहीं हिली।

नहर और उसके पुलों की नींव कैसे पड़ी

यह पूरी कहानी 1842 से शुरू होती है, जब ब्रिटिश इंजीनियर सर प्रोबी थॉमस कॉटले ने हरिद्वार से लेकर कानपुर देहात तक फैली ऊपरी गंग नहर की रूपरेखा तैयार की थी। इस विशाल परियोजना को धरातल पर उतारने में करीब 12 साल लगे और आखिरकार 1854 में यह नहर पूरी तरह बनकर तैयार हो गई। उस वक्त के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने इसका उद्घाटन किया था। नहर बन जाने के बाद सबसे बड़ी दिक्कत यही थी कि इसके दोनों किनारों पर रहने वाले लोग आपस में कैसे आएं-जाएं, इसी वजह से नहर के ऊपर जगह-जगह पुल खड़े किए गए, जो आज भी उस दौर की इंजीनियरिंग सूझबूझ की गवाही देते हैं।

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हाथी पुल से गुजरते हैं लाखों श्रद्धालु

हर की पैड़ी के पास मेला नियंत्रण भवन से सटा हाथी पुल श्रद्धालुओं के आवागमन का सबसे व्यस्त जरिया माना जाता है। इतिहासकार मनोज कुमार बताते हैं कि यही पुल यात्रियों को बड़ा बाजार और मोती बाजार जैसे प्रमुख कारोबारी इलाकों तक पहुंचाता है। भारी वाहनों को रोकने के लिए इसके गेट पर करीब तीन फीट ऊंचे लोहे के खंभे गाड़े गए हैं, इसलिए यहां से सिर्फ बाइक-स्कूटर और पैदल लोग ही निकल पाते हैं। गंगा आरती हो या कुंभ का मेला, करोड़ों लोगों की भीड़ झेल चुका यह पुल आज भी बिना किसी दरार के डटा हुआ है।

ललतारव पुल जिसका नाम एक देवी पर पड़ा

चंडी चौक इलाके में बना ललतारव पुल इतिहास के साथ-साथ आस्था से भी जुड़ा है। मनोज कुमार के मुताबिक यह नाम श्री मंत्र की देवी ललिता देवी से लिया गया है। इसी पुल के रास्ते होकर पोस्ट ऑफिस की तरफ पहाड़ों से उतरती एक छोटी नदी गुजरती है, और वहीं ललिता देवी का एक मंदिर भी मौजूद है, उसी मंदिर के नाम पर पुल का नामकरण हुआ। अंग्रेजों के जमाने में जब यह पुल तैयार किया गया, तब इसकी बुनियाद इतनी सोच-समझकर रखी गई कि आज भी यह अपने भीतर इतिहास, श्रद्धा और तकनीक तीनों को समेटे खड़ा है।

मायापुर का पुल जोड़ता है स्टेशन और बस स्टैंड को

शहर में थोड़ा आगे बढ़ने पर मायापुर का पुराना पुल अपनी खास बनावट की वजह से पहचाना जाता है। एक तरफ यह राजकीय अतिथि गृह से जुड़ता है तो दूसरी तरफ रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, मुख्य फायर स्टेशन और प्रशासनिक दफ्तरों तक रास्ता खोलता है। इस अंग्रेजी दौर की धरोहर को बचाने के लिए उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग ने इसके एक सिरे पर भारी वाहनों की एंट्री रोकने वाला बोर्ड लगा रखा है। गंगा की तेज धारा के बीचोंबीच खड़ा यह पुल दशकों से लगातार लोगों और गाड़ियों का बोझ बड़े आराम से उठा रहा है।

सिंहद्वार पुल और उसके बराबर बना नया विकल्प

मनोज कुमार आगे बताते हैं कि सिंहद्वार पुल शहर के बड़े कारोबारी केंद्रों को आपस में मिलाता है। यह रानीपुर मोड़ जैसे व्यस्त औद्योगिक और कमर्शियल इलाके को धार्मिक नगरी कनखल तक पहुंचाने वाले कई अहम रास्तों से भी जुड़ा हुआ है। ट्रैफिक का दबाव बढ़ने पर प्रशासन ने इसके ठीक बगल में एक नया कंक्रीट पुल भी बनवा दिया, लेकिन स्थानीय लोग अब भी पुराने पुल पर ही ज्यादा भरोसा करते हैं। बिना किसी सीमेंट और सरिए के तैयार यह ढांचा साबित करता है कि सर कॉटले की तकनीक उस दौर में कितनी आगे की सोच पर टिकी थी।

ज्वालापुर का जटवाड़ा पुल आज भी यातायात की धुरी

उपनगर ज्वालापुर में बना जटवाड़ा पुल आज भी यहां की सबसे व्यस्त सड़क का हिस्सा है। यह पुल ज्वालापुर के सबसे बड़े बाजार को आसपास के ग्रामीण और उपनगरीय इलाकों से जोड़ता है। जमालपुर कलां, सराय और आसपास की बस्तियों से रोज हजारों कारोबारी और स्थानीय निवासी इसी पुराने रास्ते से गुजरते हैं। डेढ़ सदी से ज्यादा वक्त तक लगातार भारी ट्रैफिक झेलने के बावजूद इस पुल की मजबूती में रत्ती भर भी कमी नहीं आई, और यह अंग्रेजी दौर का ढांचा आज भी पूरी ताकत से खड़ा है।

सवाल-जवाब

हरिद्वार की ऊपरी गंग नहर की योजना किसने और कब बनाई थी?
ब्रिटिश इंजीनियर सर प्रोबी थॉमस कॉटले ने 1842 में इसकी योजना बनाई थी और यह 1854 में बनकर तैयार हुई।
नहर का उद्घाटन किसने किया था?
तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने नहर का उद्घाटन किया था।
हाथी पुल से किस तरह के वाहन नहीं गुजर सकते?
इसके गेट पर लोहे के पिलर लगे होने से चार पहिया वाहन नहीं जा सकते, सिर्फ दोपहिया और पैदल यात्री ही गुजरते हैं।
ललतारव पुल का नाम किस देवी पर रखा गया है?
यह नाम श्री मंत्र की देवी ललिता देवी पर रखा गया है, जिनका मंदिर पुल के पास ही स्थित है।
सिंहद्वार पुल के पास प्रशासन ने क्या नया कदम उठाया?
बढ़ते ट्रैफिक के चलते प्रशासन ने इसके समानांतर एक नया कंक्रीट पुल बनवाया, हालांकि स्थानीय लोग पुराने पुल पर ही ज्यादा भरोसा करते हैं।
ये ऐतिहासिक पुल किस चीज से बने हैं?
ये पुल चूने और सुर्खी के मिश्रण से बने हैं, बिना किसी सीमेंट और सरिए के इस्तेमाल के।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·17 दिन पहले

हरिद्वार की ऊपरी गंगा नहर के ये 172 साल पुराने चूने-सुर्खी वाले पुल न केवल औपनिवेशिक इंजीनियरिंग की मजबूती दिखाते हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग द्वारा इनके संरक्षण और भारी वाहनों की आवाजाही रोकने के लिए उठाए गए कदम भी सराहनीय हैं। लोक नीति और बुनियादी ढांचे के दृष्टिकोण से, यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि किस प्रकार दीर्घकालिक योजना और उचित रख-रखाव से ऐतिहासिक धरोहरों को बचाया जा सकता है, जो आज के कमजोर कंक्रीट निर्माणों के लिए एक बड़ा सबक है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·17 दिन पहले

इन ऐतिहासिक पुलों का डेढ़ सदी से अधिक समय तक सुरक्षित रहना यह रेखांकित करता है कि निर्माण कार्यों में गुणवत्ता और नियमित रख-रखाव कितने अहम हैं। भारी वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित कर प्रशासन ने इनके जीवनकाल को और बढ़ाने का जो कदम उठाया है, वह बुनियादी ढांचे के संरक्षण के लिहाज से एक अनुकरणीय मॉडल है। आज जब आधुनिक कंक्रीट संरचनाएं कुछ ही वर्षों में जर्जर होने लगती हैं, तब यह मामला निर्माण और लोक-नीति नियोजन में दूरदर्शिता की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से उजागर करता है।

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