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हरिद्वार में हर की पौड़ी के अलावा इन घाटों पर भी पिंडदान का है महात्म्य, भगवान राम से भी जुड़ा है गहरा नाताउत्तराखंड
17 सित॰ 2026, 4:25 pm (5 दिन पहले)· 1

हरिद्वार में हर की पौड़ी के अलावा इन घाटों पर भी पिंडदान का है महात्म्य, भगवान राम से भी जुड़ा है गहरा नाता

पितृ पक्ष के दौरान हरिद्वार के विभिन्न घाटों पर पिंडदान और तर्पण का विशेष महत्व है, जिसमें कुशावर्त घाट और नारायणी शिला जैसे पवित्र स्थल शामिल हैं।

हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे पवित्र काल माना जाता है। इस अवधि में लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। पितृ पक्ष की शुरुआत इस बार 27 सितंबर से होने जा रही है, जो 10 अक्टूबर को समाप्त होगी। इस 15 दिवसीय विशेष अवधि में गंगा नदी के पावन तटों पर तर्पण, जलांजलि और पिंडदान करने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचते हैं। हरिद्वार को मोक्ष की नगरी कहा जाता है और जब बात पूर्वजों के श्राद्ध कर्म की आती है, तो हर की पौड़ी का नाम स्वतः ही लोगों के मानस पटल पर उभर आता है। हालांकि, हरिद्वार में हर की पौड़ी के अलावा भी कई ऐसे अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक घाट हैं, जहां पितृ कर्म करने का विशेष धार्मिक महत्व शास्त्रों में बताया गया है।

पितृ तर्पण के लिए क्यों खास हैं हरिद्वार के ये चुनिंदा घाट

धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान विशिष्ट स्थानों पर किया गया श्राद्ध और पिंडदान पूर्वजों को सीधे तृप्ति प्रदान करता है। ज्योतिषी पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि अमूमन अधिकांश लोग केवल हर की पौड़ी को ही श्राद्ध का मुख्य केंद्र मानते हैं, लेकिन हरिद्वार में कई अन्य विशिष्ट घाट भी हैं जिनका अपना पौराणिक महत्व है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि इन विशेष स्थलों पर विधि-विधान से किए गए अनुष्ठान से पितरों की भटकती आत्माओं को शांति मिलती है और वे अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर विदा होते हैं। इन पवित्र घाटों पर किए जाने वाले श्राद्ध कर्म से न केवल कुल का कल्याण होता है, बल्कि जीवन में आ रही अनेक बाधाएं भी दूर हो जाती हैं।

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कुशावर्त घाट: जहाँ भगवान श्रीराम ने किया था पूर्वजों का श्राद्ध

हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड के बिल्कुल समीप स्थित अस्थि प्रवाह घाट और कुशावर्त घाट को पितृ कर्म के लिए सबसे सर्वोत्तम माना गया है। इनमें से कुशावर्त घाट का इतिहास अत्यंत प्राचीन और महिमामय है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह घाट महान दत्तात्रेय ऋषि की घोर तपस्थली रहा है। इसके साथ ही इस घाट का संबंध त्रेतायुग से भी जोड़ा जाता है। ऐसी मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने स्वयं इसी कुशावर्त घाट पर आकर अपने पूर्वजों का विधि-विधान से श्राद्ध और तर्पण किया था। इस ऐतिहासिक घटना के कारण इस घाट की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है।

कुशावर्त घाट पर श्राद्ध करने की एक विशेष पद्धति है। यहाँ पर विशेष रूप से कुशा (एक प्रकार की पवित्र घास) और काले तिल का उपयोग करके तिलांजलि देने का विधान है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ दी गई तिलांजलि सीधे पितरों तक पहुंचती है। यही कारण है कि दूर-दूर से श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए यहाँ आकर तर्पण और पिंडदान की क्रियाएं संपन्न करते हैं ताकि उनके पूर्वज जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकें।

कनखल का शीतला माता घाट और नील धारा

हरिद्वार के ही पौराणिक क्षेत्र कनखल में स्थित शीतला माता घाट भी पितृ पक्ष के अनुष्ठानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। ज्योतिषी पंडित श्रीधर शास्त्री के अनुसार, शीतला माता घाट पर विशेष रूप से शांति हवन और तर्पण करने की परंपरा है। ऐसा विश्वास है कि यहाँ हवन करने से पितरों के कष्टों का निवारण होता है। इसके अलावा, हरिद्वार की नील धारा यानी चंडी घाट को भी पितृ मोक्ष के लिए एक बेहद पावन और फलदायी स्थान माना गया है। यहाँ बहती गंगा की मुख्य धारा में तर्पण करने से जातकों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और पितरों को परम गति मिलती है।

नारायणी शिला: गया के समान मोक्षदायिनी भूमि

धार्मिक दृष्टिकोण से हरिद्वार की ऐतिहासिक नारायणी शिला का स्थान अत्यंत ऊंचा है। सनातन धर्म ग्रंथों में इस शिला का विशेष रूप से वर्णन किया गया है। मान्यता है कि नारायणी शिला साक्षात भगवान विष्णु का वास स्थान है। जिस प्रकार बिहार के गया जी में पिंडदान करने का अत्यंत उच्च महत्व है और उसे मोक्ष की सर्वोत्तम भूमि माना जाता है, ठीक उसी प्रकार हरिद्वार की नारायणी शिला पर भी पिंडदान करने की बहुत बड़ी महिमा है। ऐसा कहा जाता है कि जिन मृत आत्माओं को अन्य कहीं शांति नहीं मिलती, उन्हें नारायणी शिला पर श्रद्धापूर्वक पिंडदान करने से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। यहाँ आकर लोग अपने उन पूर्वजों के निमित्त भी पूजा-अर्चन करते हैं जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो या जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो।

पितृ दोष निवारण के लिए विशेष अनुष्ठान और पूजा

यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली में पितृ दोष की समस्या है, जिसके कारण उसके जीवन में प्रगति रुकी हुई है, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बनी रहती हैं या पारिवारिक कलह रहती है, तो ज्योतिषी पितृ पक्ष के दौरान इन धार्मिक स्थलों पर विशेष पूजा कराने की सलाह देते हैं। पंडित श्रीधर शास्त्री बताते हैं कि पितृ दोष की शांति के लिए इन पावन घाटों पर ब्राह्मण भोज का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा पिंडदान, दीपदान और पितरों की प्रसन्नता के लिए विशेष वैदिक हवन भी कराए जाते हैं। इन समस्त धार्मिक क्रियाओं का उद्देश्य पितरों के प्रति आदर व्यक्त करना और उनकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करना है। इन्हीं गहरी आस्थाओं और मान्यताओं के कारण हर वर्ष पितृ पक्ष के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से लाखों लोग हरिद्वार के इन पवित्र घाटों की शरण में आते हैं और श्रद्धापूर्वक अपने पूर्वजों को याद करते हैं।

सवाल-जवाब

इस वर्ष पितृ पक्ष कब से कब तक है?
इस साल पितृ पक्ष 27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर को समाप्त होगा।
भगवान राम ने हरिद्वार के किस घाट पर श्राद्ध किया था?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम ने हरिद्वार के कुशावर्त घाट पर अपने पूर्वजों का श्राद्ध किया था।
कुशावर्त घाट पर तर्पण की क्या विधि है?
कुशावर्त घाट पर विशेष रूप से कुशा (पवित्र घास) और काले तिल से तिलांजलि देने का विशेष महत्व है।
नारायणी शिला का क्या महत्व है?
नारायणी शिला को भगवान विष्णु का स्थान माना जाता है, जहाँ पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है। इसकी तुलना गया जी से की जाती है।
कनखल के किस घाट पर अनुष्ठान किया जाता है?
कनखल के शीतला माता घाट पर पितृ पक्ष के दौरान शांति हवन और तर्पण करने का विधान है।
पितृ दोष निवारण के लिए कौन से अनुष्ठान किए जाते हैं?
पितृ दोष की शांति के लिए इन घाटों पर ब्राह्मण भोज, पिंडदान, दीपदान और विशेष हवन का आयोजन किया जाता है।
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टिप्पणियाँ 5

Divya Reddy@divya-reddy·4 दिन पहले

यह लेख पितृ पक्ष के धार्मिक आयोजनों के दौरान तीर्थनगरी में उमड़ने वाली भारी भीड़ और उससे उत्पन्न होने वाले प्रबंधन व अवसंरचनात्मक दबाव की ओर एक बहुत ही महत्वपूर्ण व्यावहारिक संकेत देता है। हर की पौड़ी के अलावा कुशावर्त जैसे प्राचीन घाटों की ऐतिहासिक महत्ता उजागर करने से स्थानीय पर्यटन, जिला प्रशासन और नागरिक निकायों पर धार्मिक मेलों के सुचारू संचालन, स्वच्छता प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था को समय रहते और अधिक मजबूत करने का दबाव स्पष्ट रूप से बढ़ता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

यह आलेख पितृ पक्ष के धार्मिक महत्व को तो रेखांकित करता है, साथ ही यह भी दर्शाता है कि कैसे ऐसे पर्व देश के धार्मिक पर्यटन को गति देते हैं। हरिद्वार में तर्पण के लिए उमड़ने वाली भारी भीड़ न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था और आतिथ्य सत्कार उद्योग को बूस्ट करती है, बल्कि राज्य प्रशासन के लिए भीड़ प्रबंधन और बुनियादी ढांचे की परीक्षा भी होती है।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

यह धार्मिक अनुष्ठान केवल आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह एक विशाल मौसमी अर्थव्यवस्था को संचालित करता है। पितृ पक्ष के दौरान होटल, परिवहन, पुरोहिती और स्थानीय हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में करोड़ों का लेन-देन होता है, जो टियर-2 और टियर-3 शहरों की आर्थिकी में सीधा योगदान देता है। भविष्य में इस प्रकार के धार्मिक आयोजनों का डिजिटल एकीकरण और उन्नत परिवहन बुनियादी ढांचा तीर्थयात्रियों के अनुभव को और बेहतर बनाएगा, जिससे क्षेत्रीय जीडीपी में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिलेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

पितृ पक्ष के दौरान हर की पौड़ी के अलावा कुशावर्त और अन्य घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा के नज़रिए से, घाटों के इस विस्तार को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस प्रशासन के लिए भीड़ नियंत्रण, जल सुरक्षा और आपातकालीन प्रबंधन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। ऐसे अवसरों पर संकीर्ण घाटों पर अव्यवस्था रोकने और नागरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निरंतर निगरानी और प्रभावी सुरक्षा बल तैनात करना अनिवार्य है।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

करण की बात को आगे बढ़ाते हुए, यह देखना आवश्यक है कि कुशावर्त और अन्य auxiliary घाटों पर श्रद्धालुओं के बिखराव को संभालने के लिए केवल पुलिस व्यवस्था ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्थायी नागरिक बुनियादी ढांचे की ज़रूरत है। पितृ पक्ष जैसे आयोजनों में बाहरी पार्किंग से घाटों तक सुगम मार्ग, विशेष शटल परिवहन और प्रशिक्षित गोताखोर इकाइयों का पूर्व-नियोजन बेहद ज़रूरी है। यदि स्थानीय प्रशासन इन वैकल्पिक धार्मिक स्थलों पर मूलभूत सुविधाओं, साइनबोर्ड और त्वरित आपदा प्रबंधन तंत्र को दीर्घकालिक नीति के तहत मजबूत करे, तो मुख्य हर की पौड़ी पर बनने वाले अत्यधिक दबाव को स्थाई रूप से कम किया जा सकता है।

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