सुप्रीम COURT ने वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्गों और हाथी गलियारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि राज्यों द्वारा फसलों की सुरक्षा का तर्क देकर हाथियों के पारंपरिक आवाजाही वाले रास्तों को बंद या बाधित नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने जोर देकर कहा कि जंगली जानवरों की आवाजाही बिना किसी बाधा के जारी रहनी चाहिए क्योंकि यह उनके प्राकृतिक जीवन चक्र का अनिवार्य हिस्सा है।
हाथी गलियारों का नया सर्वे और राज्यों को सख्त निर्देश
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई में सुनवाई करते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि हाथियों के झुंड लंबी दूरियां तय करते हैं और यह उनका स्वाभाविक व्यवहार है। किसी भी राज्य सरकार को केवल इसलिए उनके रास्तों में रोड़े अटकाने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि हाथी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस समस्या का समाधान हाथियों का रास्ता रोककर नहीं निकाला जा सकता।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को पूरे देश में मौजूद हाथी गलियारों का नए सिरे से सर्वे करने का आदेश दिया है। मंत्रालय को अदालत में एक विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। इस रिपोर्ट में यह साफ करना होगा कि इन प्राकृतिक रास्तों में कहां-कहां अतिक्रमण या रुकावटें हैं और हाथियों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन की ओर से अब तक क्या व्यावहारिक कदम उठाए गए हैं। अदालत ने माना कि हालांकि मंत्रालय ने पहले भी दिशा-निर्देश जारी किए हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर कई कारणों से इन गलियारों में गंभीर रुकावटें पैदा हो चुकी हैं।
'हुल्ला पार्टी' और फायरिंग पर कोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान हाथियों को भगाने के लिए अपनाए जाने वाले हिंसक और कठोर तरीकों का मुद्दा भी जोर-शोर से उठा। याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ को बताया कि कई इलाकों में हाथियों को डराने और भगाने के लिए 'हुल्ला पार्टियां' बनाई जाती हैं। लोगों की उग्र भीड़ एकत्र होकर शोर मचाती है और हाथियों को खदेड़ती है, जिससे स्थिति शांत होने के बजाय और ज्यादा खतरनाक हो जाती है। इसके अलावा हाथियों की सामान्य आवाजाही को रोकने के लिए उन पर फायरिंग करने जैसे घातक कदम भी उठाए जाते हैं।
वकील की इन दलीलों पर चिंता व्यक्त करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हाथियों को भगाने के लिए की जाने वाली फायरिंग और हुल्ला पार्टियों के इस्तेमाल को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। अदालत ने केंद्र सरकार और संबंधित प्राधिकारियों से इस बारे में विस्तृत जानकारी मांगी है कि इन हिंसक प्रथाओं पर रोक लगाने के लिए क्या प्रशासनिक और कानूनी उपाय किए जा रहे हैं।
कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
एक अन्य महत्वपूर्ण सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के बीच पानी के बंटवारे से जुड़े संवेदनशील मुद्दे पर भी दिशा-निर्देश जारी किए। शीर्ष अदालत ने कर्नाटक सरकार को निर्देश दिया कि वह तमिलनाडु को कावेरी नदी का पानी छोड़ने के संबंध में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (सीडब्ल्यूएमए) द्वारा समय-समय पर जारी किए गए निर्देशों का कड़ाई से पालन करे।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कावेरी जल छोड़ने की मांग वाली तमिलनाडु सरकार की याचिका पर विचार करते हुए अगली सुनवाई के लिए 24 अगस्त की तारीख तय की है। पीठ ने कहा कि निर्धारित तिथि पर सुनवाई के दौरान कावेरी नदी से पानी छोड़ने की वास्तविक स्थिति और आंकड़ों का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा ताकि मामले की वर्तमान स्थिति स्पष्ट हो सके।

















