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हिमाचल प्रदेश के करोड़ों रुपये वाले शिक्षा निधि गबन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रजनीश बंसल की गिरफ्तारी पर लगी रोक हटाईहिमाचल प्रदेश
22 जुल॰ 2026, 2:58 pm (107 दिन पहले)· 1

हिमाचल प्रदेश के करोड़ों रुपये वाले शिक्षा निधि गबन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रजनीश बंसल की गिरफ्तारी पर लगी रोक हटाई

सुप्रीम कोर्ट ने 250 करोड़ रुपये के छात्रवृत्ति घोटाले में हिमालयन ग्रुप ऑफ प्रोफेशनल इंस्टीट्यूशंस के चेयरमैन रजनीश बंसल की अग्रिम जमानत रद्द कर दी है। अदालत ने माना कि मनी लॉन्ड्रिंग की गहरी साजिश को उजागर करने के लिए प्रवर्तन निदेशालय द्वारा आरोपी से हिरासत में पूछताछ करना आवश्यक है।

हिमाचल प्रदेश के बहुचर्चित और करोड़ों रुपये के पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति गबन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने हिमालयन ग्रुप ऑफ प्रोफेशनल इंस्टीट्यूशंस के चेयरमैन रजनीश बंसल को मिली अग्रिम जमानत तत्काल प्रभाव से खारिज कर दी है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इस जमानत का कड़ा विरोध करते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। जांच एजेंसी का तर्क था कि करीब 250 करोड़ रुपये के इस विशाल वित्तीय फर्जीवाड़े में पैसों के जटिल लेन-देन को समझने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ करना बेहद जरूरी है। अदालत ने एजेंसी की इस दलील को स्वीकार करते हुए जांच का रास्ता पूरी तरह से साफ कर दिया है।

प्रभावी जांच के लिए हिरासत जरूरी

इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की संयुक्त पीठ कर रही थी। पीठ ने आर्थिक अपराधों की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा कि ऐसे पेचीदा मामलों में जांच एजेंसियों को स्वतंत्र और प्रभावी रूप से काम करने का पूरा मौका मिलना ही चाहिए। अदालत का मानना था कि मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अपराधों में धन के प्रवाह को ट्रैक करना एक बहुत ही मुश्किल काम होता है, जिसके लिए अक्सर आरोपी को हिरासत में लेकर कड़ाई से सवाल-जवाब करना अनिवार्य हो जाता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि जमानत रद्द करने का यह कदम केवल जांच को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है और इसे किसी भी तरह से आरोपी के अंतिम अपराध-बोध या मामले के अंतिम फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

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जांच में आ रही थी रुकावट

सुनवाई के दौरान प्रवर्तन निदेशालय के वकीलों ने घोटाले के सामाजिक प्रभाव पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने अदालत को बताया कि जिन पैसों की हेराफेरी की गई है, वे विशेष रूप से अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से आने वाले कमजोर छात्रों की उच्च शिक्षा के लिए आवंटित किए गए थे। ईडी ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी के बाहर रहने से पूरी जांच प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित हो रही थी। एजेंसी के मुताबिक, जब तक आरोपी को कस्टडी में नहीं लिया जाता, तब तक इस पूरे सिंडिकेट और मनी लॉन्ड्रिंग के असली नेटवर्क का पर्दाफाश करना लगभग असंभव है।

कैसे रची गई 250 करोड़ के फर्जीवाड़े की साजिश

यह पूरा विवाद केंद्र और राज्य सरकार की एक साझा कल्याणकारी योजना से जुड़ा हुआ है। इस पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना का मुख्य लक्ष्य हाशिए पर मौजूद वर्गों के होनहार छात्रों को कॉलेज की पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद पहुंचाना था। लेकिन साल 2018 में जब राज्य के शिक्षा विभाग ने एक नियमित ऑडिट किया, तो धन वितरण में भारी गड़बड़ियों का चौंकाने वाला खुलासा हुआ।

बाद की जांच में यह बात सामने आई कि साल 2012 से लेकर 2018 के बीच एक गहरी साजिश रची गई थी। राज्य के कई निजी शिक्षण संस्थानों ने फर्जी छात्रों के नाम पर एडमिशन दिखाए, जाली कागजात तैयार किए और सरकारी सिस्टम को धोखा देकर स्कॉलरशिप का सारा पैसा अपने खातों में ट्रांसफर करवा लिया। सरकारी खजाने को इस सुनियोजित फर्जीवाड़े से लगभग 250 करोड़ रुपये की भारी चपत लगने का अनुमान लगाया गया है। शुरुआती छानबीन में ही 22 से अधिक निजी शैक्षणिक संस्थानों की संदिग्ध भूमिका उजागर हो गई थी।

केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई और अगला कदम

घोटाले की व्यापकता को देखते हुए साल 2019 में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया और जांच का जिम्मा केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया। सीबीआई ने इस पर कड़ी कार्रवाई करते हुए कई संस्थान संचालकों, सरकारी अधिकारियों और अन्य बिचौलियों के खिलाफ धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश के तहत मामले दर्ज किए। सीबीआई द्वारा जुटाई गई इसी जानकारी के आधार पर, प्रवर्तन निदेशालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत एक अलग मामला दर्ज किया और अपनी मनी लॉन्ड्रिंग जांच शुरू कर दी। सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला अब केंद्रीय एजेंसियों को इस सार्वजनिक धन की लूट के मुख्य सूत्रधारों तक पहुंचने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है।

सवाल-जवाब

रजनीश बंसल कौन हैं?
वह हिमालयन ग्रुप ऑफ प्रोफेशनल इंस्टीट्यूशंस के चेयरमैन हैं, जिन पर 250 करोड़ रुपये के छात्रवृत्ति फर्जीवाड़े में शामिल होने का आरोप है।
सुप्रीम कोर्ट ने उनकी जमानत क्यों रद्द की?
अदालत ने जमानत इसलिए रद्द की ताकि प्रवर्तन निदेशालय आरोपी को हिरासत में लेकर पैसों के अवैध लेन-देन और मनी लॉन्ड्रिंग के नेटवर्क का पता लगा सके।
हिमाचल का यह स्कॉलरशिप घोटाला आखिर क्या है?
साल 2012 से 2018 के बीच कई निजी शिक्षण संस्थानों ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों की उच्च शिक्षा के लिए आए 250 करोड़ रुपये हड़प लिए थे।
इस मामले की जांच कौन सी एजेंसियां कर रही हैं?
आपराधिक साजिश और धोखाधड़ी की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) कर रही है, जबकि पैसों की हेराफेरी के मामले को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) देख रहा है।
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