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हिमाचल सरकार ने बीबीएमबी को सशर्त मंजूरी दी, पंडोह में 10 मेगावॉट बिजली परियोजना को मिली हरी झंडीहिमाचल प्रदेश
5 सित॰ 2026, 9:02 am (17 दिन पहले)· 2

हिमाचल सरकार ने बीबीएमबी को सशर्त मंजूरी दी, पंडोह में 10 मेगावॉट बिजली परियोजना को मिली हरी झंडी

हिमाचल सरकार ने पंडोह डैम के पास बीबीएमबी के 10 मेगावॉट पावर प्रोजेक्ट को सरप्लस जमीन लौटाने की शर्त पर सशर्त एनओसी दे दी है, जिसके बाद अब दोनों पक्षों में बातचीत जारी है।

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में पंडोह डैम के पास बन रहे 10 मेगावॉट के पावर प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। राज्य सरकार ने भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) को इस प्रोजेक्ट के लिए सशर्त एनओसी जारी कर दी है। सरकार ने साफ कहा है कि निर्माण कार्य शुरू किया जा सकता है, लेकिन इसके बदले बीबीएमबी को सरप्लस जमीन राज्य को वापस लौटानी होगी। इसी शर्त को लेकर अब बीबीएमबी प्रबंधन और प्रदेश सरकार के बीच बातचीत चल रही है।

सरप्लस जमीन को लेकर पेच

बीबीएमबी का कहना है कि उसके पास फिलहाल कोई सरप्लस जमीन बची ही नहीं है, क्योंकि जो भी अतिरिक्त जमीन थी उसे पहले ही राज्य सरकार को सौंपा जा चुका है। बीबीएमबी पंडोह के अतिरिक्त अधीक्षण अभियंता चंद्रमणि शर्मा ने इस बात की पुष्टि की कि सरकार ने सरप्लस जमीन लौटाने की शर्त पर ही एनओसी दी है। उनके मुताबिक बीबीएमबी के वरिष्ठ अधिकारी इस मुद्दे को सुलझाने के लिए सरकार के साथ सीधी बातचीत में जुटे हैं, ताकि प्रोजेक्ट का काम बिना रुकावट आगे बढ़ सके। शर्मा ने यह भी बताया कि प्रोजेक्ट पूरा होने पर राज्य को हिस्सेदारी के तहत मुफ्त बिजली भी मिलेगी, जो हिमाचल के लिए अतिरिक्त फायदे की बात होगी।

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50 साल पुरानी टनल से निकलेगी बिजली

इस पूरी योजना की जड़ें करीब 50 साल पुरानी हैं। जब पंडोह डैम बनाया जा रहा था, तब ब्यास नदी के पानी को मोड़ने के लिए 30 डायामीटर की एक टनल तैयार की गई थी। बीबीएमबी प्रबंधन ने गौर किया कि पंडोह डैम से जो 15 प्रतिशत पानी अभी सीधे ब्यास नदी में छोड़ा जा रहा है, अगर उसी पानी को इस पुरानी टनल के रास्ते छोड़ा जाए तो उससे बिजली बनाई जा सकती है। यानी जो पानी अब तक बिना किसी उपयोग के बह रहा था, उसका इस्तेमाल अब बिजली उत्पादन के लिए किया जाएगा।

5-5 मेगावॉट के दो प्रोजेक्ट प्रस्तावित

इसी विचार के आधार पर बीबीएमबी ने पंडोह में 5-5 मेगावॉट क्षमता के दो अलग-अलग पावर प्रोजेक्ट प्रस्तावित किए हैं, जिनकी कुल क्षमता 10 मेगावॉट होगी। चंद्रमणि शर्मा के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के लिए फिलहाल 80 करोड़ रुपये की प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट यानी पीएफआर तैयार की जा चुकी है, जबकि लागत से जुड़ी अंतिम विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर पर अभी काम चल रहा है। डीपीआर पूरी होने के बाद ही प्रोजेक्ट की असल लागत और तय समयसीमा साफ हो पाएगी।

सवाल-जवाब

पंडोह डैम के पास कौन सा प्रोजेक्ट बनाया जा रहा है?
बीबीएमबी 10 मेगावॉट क्षमता का पावर प्रोजेक्ट बना रहा है, जिसमें 5-5 मेगावॉट के दो अलग यूनिट होंगे।
राज्य सरकार ने एनओसी किस शर्त पर दी है?
सरकार ने कहा है कि प्रोजेक्ट का काम शुरू हो सकता है, लेकिन इसके बदले बीबीएमबी को सरप्लस जमीन राज्य को वापस करनी होगी।
बीबीएमबी का इस शर्त पर क्या कहना है?
बीबीएमबी का कहना है कि उसके पास अब कोई सरप्लस जमीन नहीं बची, क्योंकि जो भी अतिरिक्त जमीन थी वह पहले ही सरकार को लौटाई जा चुकी है।
बिजली बनाने के लिए किस टनल का इस्तेमाल होगा?
50 साल पहले पंडोह डैम बनाते समय ब्यास नदी का पानी मोड़ने के लिए बनाई गई 30 डायामीटर की टनल का इस्तेमाल किया जाएगा।
इस प्रोजेक्ट से हिमाचल को क्या फायदा होगा?
प्रोजेक्ट बनने पर राज्य को हिस्सेदारी के तहत मुफ्त बिजली मिलेगी।
प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत क्या है?
अभी 80 करोड़ रुपये की प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट यानी पीएफआर बनी है, जबकि फाइनल डीपीआर तैयार की जा रही है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·16 दिन पहले

यह मामला प्रशासनिक और कानूनी समन्वय का एक दिलचस्प उदाहरण है। हालांकि यह कोई पारंपरिक आपराधिक मामला नहीं है, लेकिन सार्वजनिक संपत्ति, भूमि आबंटन और वैधानिक अनुपालनों से जुड़े ऐसे नीतिगत गतिरोध अक्सर लंबे कानूनी विवादों और जनहित याचिकाओं का रूप ले लेते हैं। यदि राज्य सरकार और बीबीएमबी समय रहते आपसी सहमति नहीं बना पाते हैं, तो यह विवाद उच्च न्यायालय तक पहुँच सकता है, जिससे न केवल अस्सी करोड़ रुपये की इस महत्वपूर्ण ऊर्जा परियोजना में देरी होगी, बल्कि जनहित और विकास कार्यों पर भी प्रशासनिक शिकंजा कस सकता है।

Rohan Verma@rohan-verma·16 दिन पहले

करण मल्होत्रा ने सही रेखांकित किया है कि भूमि के इस तकनीकी पेंच से अस्सी करोड़ रुपये की इस ऊर्जा परियोजना की राह में प्रशासनिक अड़चनें आ सकती हैं। यदि यह विवाद लंबा खिंचता है, तो इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार और विकास के अवसरों पर असर पड़ेगा, बल्कि राज्य को मिलने वाली मुफ्त बिजली के लाभ में भी अनावश्यक देरी तय है। विकास और शासन के बीच तालमेल ही तय करेगा कि यह पचास साल पुरानी योजना ज़मीन पर उतरती है या नहीं।

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