भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा क्षमताओं में एक बड़ा तकनीकी और सामरिक बदलाव देखने को मिल रहा है। समंदर में देश की लड़ाकू क्षमता को मजबूती देने के लिए ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलों के नौसैन्य संस्करण और जल्द शामिल होने वाले राफेल फाइटर जेट्स के लिए एक नया ठिकाना तैयार किया जा रहा है। वर्तमान में भारतीय नौसेना के बेड़े में दो विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रमादित्य और स्वदेशी तकनीक से निर्मित आईएनएस विक्रांत सक्रिय सेवा में हैं। नौसेना अपने तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर यानी इंडिजिनस एयरक्राफ्ट कैरियर-2 (IAC-2) के निर्माण पर काम कर रही है। IAC-2 के नौसेना में शामिल होने के बाद भारत के पास तीन पूर्ण सक्रिय एयरक्राफ्ट कैरियर की ताकत होगी। हाल के सामरिक आकलन के बाद नौसेना ने IAC-2 के निर्माण को लेकर अपनी पुरानी योजना में रणनीतिक बदलाव किया है, जिससे देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा और भी अधिक व्यावहारिक तथा प्रभावी बन सकेगी।
65 हजार टन से घटकर 45 हजार टन: IAC-2 की डिजाइन रणनीति में बड़ा बदलाव
शुरुआती नौसैन्य योजनाओं में IAC-2 को 65,000 टन से अधिक विस्थापन क्षमता वाले विशाल सुपरकैरियर के रूप में परिकल्पित किया गया था, जिसे आईएनएस विशाल श्रेणी का नाम दिया गया था। हालांकि, रक्षा प्राथमिकताओं, अत्यधिक निर्माण लागत, जटिल तकनीकी चुनौतियों और लंबी निर्माण अवधि की समीक्षा के बाद नौसेना ने अपनी प्राथमिकताओं को पुनर्गठित किया है। अब नौसेना का ध्यान 65,000 टन के सुपरकैरियर के बजाय 45,000 टन क्षमता वाले व्यावहारिक और तेजी से तैयार किए जा सकने वाले एयरक्राफ्ट कैरियर पर केंद्रित हो गया है। इस नए प्रस्तावित पोत को आईएनएस विक्रांत का एक एनहांस्ड या उन्नत संस्करण माना जा रहा है। नौसेना की तात्कालिक जरूरत एक अत्यधिक महंगे सुपरकैरियर की प्रतीक्षा करने के स्थान पर अपनी टू-कैरियर परिचालन क्षमता को स्थायी रूप से मजबूत बनाए रखना है।
अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में सतत नौसैन्य तैनाती की आवश्यकता
भारतीय नौसेना के लिए दोहरे समुद्री मोर्चों पर एक साथ एयरक्राफ्ट कैरियर की तैनाती बनाए रखना बेहद जरूरी है। वर्तमान में आईएनएस विक्रमादित्य नौसैनिक विमानन गतिविधियों का मुख्य आधार बना हुआ है, लेकिन समय के साथ पोत के पुराने होने के कारण उसकी मरम्मत, रखरखाव और नियमित उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियां बढ़ना स्वाभाविक है। ऐसे में आईएनएस विक्रांत के बाद एक और स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर का निर्माण समय से पूरा होना आवश्यक है। IAC-2 के अस्तित्व में आने से भारतीय नौसेना अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में एक साथ लड़ाकू विमान वाहक पोतों की तैनाती कर सकेगी। यदि एक पोत रखरखाव या ओवरहॉलिंग के लिए डॉकयार्ड में जाता है, तब भी दो अन्य कैरियर सक्रिय रहकर रणनीतिक संतुलन और निर्बाध समुद्री गश्त सुनिश्चित कर सकेंगे।
कैटोबार की जगह स्टोबार तकनीक को बरकरार रखने का व्यावहारिक फैसला
शुरुआती दौर में आईएनएस विशाल परियोजना के तहत कैटापुल्ट असिस्टेड टेक-ऑफ बैरियर अरेस्टेड रिकवरी यानी CATOBAR तकनीक के इस्तेमाल पर विचार किया जा रहा था। इसके साथ ही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम यानी EMALS और परमाणु ऊर्जा चालित प्रोपल्शन प्रणाली जैसी अत्याधुनिक तकनीकों की संभावनाओं का भी मूल्यांकन किया गया था, ताकि 55 से 60 फाइटर जेट्स को तैनात किया जा सके। परंतु इन प्रणालियों के विकास और एकीकरण में भारी वित्तीय जोखिम और समय लगने की संभावना थी। इसके विपरीत प्रस्तावित IAC-2 में आईएनएस विक्रांत की तरह ही शॉर्ट टेक-ऑफ अरेस्टेड रिकवरी यानी STOBAR तकनीक का उपयोग जारी रखने की पूरी संभावना है। स्टोबार प्रणाली को बनाए रखने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि नौसेना को कैटोबार और इमल्स जैसी नई और जटिल प्रणालियों को एक साथ विकसित करने से उत्पन्न होने वाले जोखिमों का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसके अलावा आईएनएस विक्रांत के निर्माण के दौरान देश में विकसित भारतीय शिपयार्डों की कार्यक्षमता, स्थापित सप्लाई चेन और कुशल तकनीकी जनशक्ति का पुनः उपयोग किया जा सकेगा, जिससे निर्माण अवधि में कमी आएगी और लागत नियंत्रित रहेगी।
ड्रोन, यूसीएवी और स्वॉर्म प्रणालियों से लैस होगा नया एविएशन हब
IAC-2 का सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी बदलाव इसके आकार या लॉन्च मैकेनिज्म में न होकर इसके एयर विंग के संयोजन में होगा। भविष्य के एयरक्राफ्ट कैरियर को केवल मानवयुक्त फाइटर जेट्स की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसमें मानव रहित लड़ाकू विमानों और ड्रोन प्रणालियों को केंद्रीय भूमिका दी जाएगी। नौसेना की नई रणनीति के तहत कैरियर से संचालित होने वाले अनमैंड कॉम्बैट एरियल व्हीकल्स यानी UCAV, लॉयल विंगमैन सिस्टम, लंबी दूरी के इंटेलिजेंस, सर्विलांस एंड रिकॉनिसेंस (ISR) ड्रोन और स्वॉर्म ड्रोन को एकीकृत किया जाएगा। इस एकीकरण से IAC-2 केवल एक पारंपरिक लड़ाकू विमान वाहक मंच न रहकर एक बहु-आयामी एविएशन हब में परिवर्तित हो जाएगा। हवा में लंबे समय तक टिकने वाले ISR ड्रोन सैकड़ों किलोमीटर दूर तक समुद्री निगरानी रखेंगे, जबकि जोखिम भरे स्ट्राइक अभियानों में UCAV का उपयोग कर पायलटों के जीवन के खतरे को न्यूनतम किया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त, लॉयल विंगमैन फाइटर जेट्स के साथ समन्वय बनाकर सेंसर कवरेज बढ़ाएंगे और स्वॉर्म ड्रोन इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, टोही तथा डिकॉय अभियानों में प्रभावी साबित होंगे।
हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक संतुलन और विशाल सुपरकैरियर का भविष्य
हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती नौसैन्य प्रतिस्पर्द्धा, ए2/एडी (Anti-Access/Area-Denial) क्षमताओं के उभार और लंबी दूरी की समुद्री निगरानी की जरूरतों के कारण कैरियर बैटल ग्रुप की प्रभावशीलता अब सिर्फ विमानों की संख्या से तय नहीं होती। भविष्य की समुद्री युद्ध कला में एकीकृत सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों और मैन्ड-अमैन्ड प्लेटफॉर्म का तालमेल ही निर्णायक होगा। यदि IAC-2 को शुरुआती डिजाइन स्तर से ही मानव रहित विमानों के संचालन के लिए अनुकूलित किया जाता है, तो यह भारतीय नौसेना के लिए एक बहुत बड़ी तकनीकी छलांग होगी। हालांकि, इस व्यावहारिक बदलाव का अर्थ यह नहीं है कि भारत ने 65,000 टन वाले विशाल कैटोबार सुपरकैरियर की योजना को हमेशा के लिए रद्द कर दिया है। भविष्य में जब भारत इमल्स, कैटापुल्ट संचालन और उन्नत नौसैन्य विमानन प्रौद्योगिकियों में पूर्ण आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लेगा, तब आईएनएस विशाल जैसी अवधारणा पर पुनः विचार किया जा सकता है। वर्तमान में नौसेना का प्राथमिक लक्ष्य एक सामयिक, स्वदेशी और अत्यधिक सक्षम एयरक्राफ्ट कैरियर को समयबद्ध तरीके से बेड़े में शामिल करना है।



















