उन्नीस सौ अस्सी के दशक में भारत के समक्ष अपनी क्षेत्रीय सीमाओं की सुरक्षा को लेकर कई गंभीर चुनौतियां खड़ी थीं। एक तरफ जहां चीन लगातार अपने परमाणु भंडार और मिसाइल बेड़े का विस्तार कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान भी अपनी सैन्य क्षमता को तेजी से धार देने में जुटा हुआ था। उस दौर में भारतीय रणनीतिकारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि देश अपनी रक्षा जरूरतों के लिए कब तक विदेशी आपूर्तिकर्ताओं और आयातित हथियारों पर निर्भर रहेगा। इस सुरक्षा संकट के समाधान के रूप में भारत ने रक्षा अनुसंधान के एक नए युग का संकल्प लिया। इस ऐतिहासिक सफर का पहला कदम पृथ्वी मिसाइल से शुरू हुआ, जिसके बाद अग्नि, आकाश, त्रिशूल और नाग जैसी स्वदेशी मिसाइलों की श्रृंखला तैयार की गई। इस पूरे मिशन की रूपरेखा तैयार करने में डॉ. राजा रामन्ना की शुरुआती समीक्षा महत्वपूर्ण रही, जबकि इसे सफलता की मंजिल तक पहुंचाने का श्रेय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के विजनरी नेतृत्व को जाता है।
समीक्षा से विजन तक: स्पेशल मिसाइल स्टडी ग्रुप का गठन
भारत की मिसाइल क्षमताओं में बिखराव को समाप्त करने की दिशा में पहला ठोस कदम 1979 में उठाया गया था। रक्षा विशेषज्ञों के सुझाव पर केंद्र सरकार ने डॉ. राजा रामन्ना को देश की तत्कालीन मिसाइल रिसर्च और डेवलपमेंट क्षमताओं का विस्तृत अध्ययन करने का जिम्मा सौंपा। डॉ. राजा रामन्ना ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि छिटपुट और अलग-अलग परियोजनाओं पर काम करने के बजाय देश को एक एकीकृत और व्यापक मिसाइल विकास कार्यक्रम की सख्त जरूरत है। इस दूरदर्शी रिपोर्ट के आधार पर 1982 में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की अगुवाई में एक स्पेशल मिसाइल Study Group का गठन किया गया। इस समूह ने भारत की भौगोलिक संरचना, सैन्य प्राथमिकताओं, भविष्य की युद्ध परिस्थितियों और उपलब्ध स्वदेशी तकनीकों का गहन विश्लेषण किया। इसी अध्ययन के आधार पर देश के भावी मिसाइल कार्यक्रम का खाका तैयार हुआ।
इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम की ऐतिहासिक मंजूरी
अध्ययन समूह के सुझावों के आधार पर यह तय किया गया कि भारत को केवल जमीन से जमीन पर मार करने वाली मिसाइलों की जरूरत नहीं है, बल्कि दुश्मन के लड़ाकू विमानों को ध्वस्त करने वाली वायु रक्षा प्रणालियां भी समान रूप से जरूरी हैं। इसके साथ ही, दुश्मन के बख्तरबंद टैंकों को तबाह करने के लिए एंटी-टैंक मिसाइल और लंबी दूरी की रणनीतिक बैलिस्टिक मिसाइलों का निर्माण भी खाके में शामिल किया गया। इस महत्वाकांक्षी मिशन को 26 जुलाई 1983 को भारत सरकार से औपचारिक मंजूरी मिली, जिसे इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का नाम दिया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य भारत को मिसाइल तकनीक के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाना और शीर्ष वैश्विक क्षमताओं के बराबर पहुंचाना था।
स्वदेशी मिसाइल पंचक: पांच प्रमुख हथियारों की विशिष्ट क्षमताएं
इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत कुल पांच अलग-अलग श्रेणी की मिसाइलों के विकास और उत्पादन की योजना तैयार की गई थी। इनमें जमीन से जमीन पर हमला करने वाली पृथ्वी, लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि, मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली आकाश, कम दूरी की वायु रक्षा मिसाइल त्रिशूल और टैंक रोधी मिसाइल नाग शामिल थीं। 1988 में सबसे पहले पृथ्वी मिसाइल का सफल परीक्षण हुआ। इसके बाद 1989 में अग्नि और त्रिशूल तथा 1990 में आकाश और नाग मिसाइलों का सफल विकास कर उन्हें सेना में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई। समय के साथ इन सभी मिसाइल सिस्टम को आधुनिक युद्ध तकनीकों के अनुरूप लगातार अपग्रेड किया जाता रहा।
पृथ्वी और अग्नि: रणनीतिक हमले और री-एंट्री तकनीक की सफलता
चार युद्धों का अनुभव ले चुकी भारतीय सेना को एक ऐसी स्वदेशी बैलिस्टिक मिसाइल की सख्त जरूरत थी जो दुश्मन के सामरिक ठिकानों पर सटीक वार कर सके। पृथ्वी मिसाइल इसी आवश्यकता का परिणाम थी, जिसका पहला संस्करण 1000 किलो पेलोड के साथ 150 किमी की दूरी तक निशाना साधने में सक्षम था। इसके बाद थल सेना, वायु सेना और नौसेना की अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से पृथ्वी के विभिन्न वेरिएंट्स तैयार किए गए। इसके नौसैनिक संस्करण को आगे चलकर धनुष नाम दिया गया। दूसरी ओर, अग्नि मिसाइल को शुरुआत में एक टेक्निकल डेमॉन्स्ट्रेटर के रूप में विकसित किया गया था ताकि लंबी दूरी की मिसाइल तकनीकों का परीक्षण किया जा सके। अग्नि के विकास में वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती लंबी दूरी तय करने के साथ-साथ पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करते समय पैदा होने वाली प्रचंड गर्मी को सहन करने की थी। भारतीय वैज्ञानिकों ने इन चुनौतियों पर सफलता पाई और बाद में अग्नि-I, अग्नि-II और अग्नि-III जैसी उन्नत रेंज वाली मिसाइलों की पूरी श्रृंखला तैयार की।
आकाश, त्रिशूल और नाग: बहुस्तरीय सुरक्षा और टैंक रोधी क्षमता
इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम का तीसरा मुख्य स्तंभ आकाश मिसाइल थी, जिसे दुश्मन के लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों और हवाई हमलों को हवा में ही ध्वस्त करने के लिए डिजाइन किया गया था। यह एक मोबाइल सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली थी, जिसे किसी भी युद्ध क्षेत्र में आसानी से तैनात किया जा सकता था। आकाश प्रणाली के साथ राजेंद्र रडार को विकसित किया गया, जो एक साथ कई हवाई लक्ष्यों को ट्रैक करने और उन पर नजर बनाए रखने की अद्वितीय क्षमता रखता है। वहीं, त्रिशूल को कम ऊंचाई पर उड़ने वाले हवाई खतरों और समुद्र की सतह के करीब आने वाले जहाजों या मिसाइलों को रोकने के लिए विकसित किया गया था, हालांकि तकनीकी जटिलताओं और बदलती सैन्य प्राथमिकताओं के कारण आगे चलकर त्रिशूल परियोजना को बंद कर दिया गया। इसी कार्यक्रम की पांचवीं मिसाइल नाग थी, जिसे दुश्मन के अत्याधुनिक टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को नेस्तनाबूद करने के लिए एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल के रूप में तैयार किया गया।



















