भारतीय वायुसेना की मारक और रणनीतिक क्षमताओं को सशक्त करने के उद्देश्य से एक बड़ा रक्षा अनुबंध औपचारिक रूप से संपन्न हुआ है। नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में रक्षा मंत्रालय ने भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के साथ 810.79 करोड़ रुपये के खरीद समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस अनुबंध के तहत वायुसेना को 160 आधुनिक सैटेलाइट स्मार्ट एंटी एयरफील्ड वीपन्स यानी SAT-SAAW प्रदान किए जाएंगे, जो जमीन पर स्थित सैन्य ठिकानों को लंबी दूरी से अचूक निशाना बनाने में पूरी तरह सक्षम हैं।
स्वदेशी डिजाइन और बाय इंडियन आईडीडीएम श्रेणी का महत्व
रक्षा मंत्रालय के विवरण के अनुसार यह संपूर्ण खरीद प्रक्रिया 'बाय इंडियन-आईडीडीएम' (इंडिजिनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड) वर्गीकरण के अंतर्गत की गई है। इस नीतिगत ढांचे का सीधा अर्थ यह है कि इस उन्नत हथियार प्रणाली की रूपरेखा तैयार करने, अनुसंधान कार्य पूरा करने तथा कलपुर्जों के वास्तविक विनिर्माण में भारतीय क्षमताओं और घरेलू प्रतिष्ठानों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के सरकारी प्रयासों की दिशा में इस सौदे को बेहद निर्णायक कदम माना जा रहा है।
इस संपूर्ण हथियार प्रणाली की वैचारिक रूपरेखा और तकनीकी विकास का श्रेय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) को जाता है। संस्थान ने इस प्रणाली को घरेलू आवश्यकताओं के अनुकूल तैयार किया है, जिसके चलते हथियार में लगभग 60 फीसदी सामग्री पूरी तरह से स्वदेशी रखी गई है। इतना ही नहीं, इसके संचालन के लिए आवश्यक कई महत्वपूर्ण उप-प्रणालियां भी देश के भीतर ही अनुसंधान के जरिए तैयार की गई हैं, जिससे भविष्य में कलपुर्जों की आपूर्ति और मरम्मत के लिए किसी बाहरी पक्ष पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
सटीक मारक क्षमता और स्टैंड-ऑफ रेंज की तकनीक
तकनीकी दृष्टिकोण से SAT-SAAW हवा से जमीन पर मार करने वाला एक अत्याधुनिक प्रिसिजन गाइडेड ग्लाइड बम है। इसे इस तरीके से विकसित किया गया है कि लड़ाकू विमान अपने निर्धारित लक्ष्य से सुरक्षित और पर्याप्त दूरी पर रहते हुए भी जमीन पर मौजूद बेहद संवेदनशील और रणनीतिक संपत्तियों को पूरी सटीकता के साथ ध्वस्त कर सकें।
इस ग्लाइड बम की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लंबी स्टैंड-ऑफ रेंज है। युद्ध की परिस्थितियों में जब विमान को किसी सघन सुरक्षा घेरे वाले क्षेत्र पर हमला करना होता है, तो लक्ष्य के अत्यधिक समीप जाना लड़ाकू विमान और पायलट दोनों के लिए बड़ा जोखिम बन जाता है। इस प्रणाली के तहत लड़ाकू विमान दुश्मन की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों के दायरे से बाहर रहकर इस ग्लाइड बम को हवा में छोड़ सकता है। प्रक्षेपण के उपरांत यह बम अपने निर्धारित पथ पर ग्लाइड करते हुए लक्ष्य तक पहुंचता है और उस पर अचूक प्रहार करता है।
रणनीतिक एयरफील्ड ठिकानों पर प्रहार का उद्देश्य
रक्षा मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस घातक हथियार को मुख्य रूप से दुश्मन के हवाई अड्डों और एयरफील्ड को निष्क्रिय करने के लिए तैयार किया गया है। किसी भी आधुनिक हवाई संघर्ष में एयरफील्ड सबसे बुनियादी और महत्वपूर्ण रणनीतिक केंद्र होते हैं। यहीं से लड़ाकू विमान अपने अभियानों की शुरुआत करते हैं, ईंधन भरते हैं, हथियारों से लैस होते हैं और युद्धक्षेत्र से वापस लौटते हैं।
यदि किसी एयरफील्ड के रनवे, टैक्सीवे या प्रमुख सहायक ढांचे को इस सटीक ग्लाइड बम से समय रहते क्षतिग्रस्त कर दिया जाए, तो वहां तैनात शत्रु के विमानों की उड़ानें तुरंत बाधित हो जाती हैं। इससे दुश्मन के हवाई अभियानों की पूरी योजना बिखर जाती है और युद्धक्षेत्र में वायुसेना को रणनीतिक बढ़त मिल जाती है। लंबी दूरी से एयरफील्ड को नष्ट करने की यह क्षमता योजनाकारों को अभियानों के संचालन में जबरदस्त लचीलापन देती है।
सुखोई-30 एमकेआई, जैगुआर और हॉक विमानों से समन्वय
इस नई हथियार प्रणाली को भारतीय वायुसेना के बहुस्तरीय लड़ाकू विमान बेड़े में आसानी से जोड़ने के लिए अनुकूल बनाया गया है। इसे सुखोई-30 एमकेआई, जैगुआर और हॉक जैसे अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू विमानों से संचालित किया जा सकेगा। विभिन्न श्रेणियों और पीढ़ियों के विमानों के साथ इस बम का तालमेल वायुसेना को विभिन्न प्रकार के मिशनों में सटीक निर्णय लेने की आजादी देता है।
विशेष रूप से उन मिशनों में जहां दुश्मन के वायु रक्षा तंत्र काफी सघन होते हैं, वायुसेना के पायलट अपने विमान को सुरक्षित फासले पर रखकर इन लक्ष्यों को नेस्तनाबूद कर सकते हैं। अलग-अलग लड़ाकू विमानों पर इस हथियार की तैनाती से वायुसेना किसी भी दिशा में तेजी से कार्रवाई करने में सक्षम बनेगी और बेड़े की समग्र प्रभावकारिता कई गुना बढ़ जाएगी।
आपूर्ति की समयसीमा और परिचालन क्षमता में विस्तार
हस्ताक्षरित अनुबंध की शर्तों के मुताबिक 160 SAT-SAAW हथियारों की आपूर्ति वित्त वर्ष 2027-28 और 2028-29 के दौरान की जाएगी। इस तय समयसीमा के भीतर भारत डायनेमिक्स लिमिटेड इन हथियारों का निर्माण पूरा कर इन्हें चरणबद्ध तरीके से भारतीय वायुसेना के शस्त्रागार में शामिल करेगा।
जैसे-जैसे ये हथियार वायुसेना के बेड़े का हिस्सा बनेंगे, लंबी दूरी से सटीक हमला करने की भारत की क्षमता में ठोस प्रगति दर्ज होगी। रक्षा मंत्रालय का मानना है कि इस स्वदेशी हथियार के शामिल होने से वायुसेना की परिचालन तैयारियां नई ऊंचाई पर पहुंचेंगी। चूंकि प्रणाली के महत्वपूर्ण घटक और उप-प्रणालियां भारत में ही निर्मित हैं, इसलिए लंबी अवधि में इनके नियमित रखरखाव, उन्नयन और भविष्य में बड़े पैमाने पर उत्पादन को बनाए रखना रक्षा तंत्र के लिए बेहद सुगम और लागत प्रभावी साबित होगा।





















