झारखंड के पलामू जिले में अगस्त महीने के दौरान हुई मूसलाधार बारिश ने जनजीवन और कृषि गतिविधियों दोनों पर व्यापक असर डाला है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में पलामू में कुल 570 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। अत्यधिक वर्षा के कारण जिले के कई निचले इलाकों में जलजमाव की गंभीर स्थिति बन गई। हालांकि, कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति किसानों के लिए पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। इस बारिश के कई फायदे भी सामने आए हैं, लेकिन कुछ खास फसलों में फफूंद और सड़न की बीमारियां फैलने का जोखिम काफी हद तक बढ़ गया है।
जलस्रोतों का पुनर्भरन और खरीफ फसलों को नया जीवन
कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने स्थानीय कृषि परिदृश्य का विश्लेषण करते हुए बताया कि लगातार हुई इस बारिश से जिले के जलस्रोतों को बहुत बड़ा सहारा मिला है। पलामू के तमाम पारंपरिक आहर, पोखर, तालाब और अन्य प्राकृतिक जलाशय पानी से लबालब भर गए हैं। इस जल भंडारण से न केवल वर्तमान खरीफ फसलों को भरपूर सिंचाई मिली है, बल्कि आने वाले रबी सीजन की फसलों के लिए भी बेहतर सिंचाई की उम्मीदें जग गई हैं। इसके अतिरिक्त, बड़े पैमाने पर हुए जल संचयन से क्षेत्र के भूजल स्तर में सुधार आने की पूरी संभावना है। मुख्य रूप से धान और मोटे अनाज की खेती करने वाले किसानों के लिए यह बारिश बेहद वरदान साबित हो रही है।
सितंबर माह में भी जारी है धान की रोपाई
मौसम के शुरुआती दौर में बारिश की कमी और मानसून के विलंब से आने के कारण पलामू के बहुत से किसान समय पर धान का रोपा नहीं कर सके थे। शुरुआती महीनों में सुखाड़ जैसी स्थिति रहने से खेतों में नमी की भारी कमी हो गई थी। अब अगस्त में हुई 570 मिलीमीटर की भारी वर्षा के बाद खेतों में पर्याप्त पानी उपलब्ध हो गया है। इस कारण किसान सितंबर महीने के दौरान भी धान की रोपाई का काम पूरा करने में लगे हुए हैं। हालांकि, देर से रोपाई करने के कारण फसल की कुल पैदावार सामान्य समय की तुलना में थोड़ी कम रह सकती है। इसके बावजूद, मिट्टी में मौजूद नमी का लाभ उठाते हुए किसान इस देर से की जाने वाली खेती को भी पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं।
सब्जियों और लत्तर वाली फसलों के लिए बढ़ा बीमारी का खतरा
अत्यधिक बारिश का सबसे बुरा असर सब्जियों और लत्तर वाली फसलों पर देखा जा रहा है। लगातार खेतों में बनी रहने वाली नमी और जमा पानी के कारण फसलों में फफूंद जनित रोगों के तेजी से फैलने की आशंका बढ़ गई है। इस समस्या से निपटने के लिए कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सावधानी बरतने की सलाह दी है। बारिश रुकने और मौसम पूरी तरह साफ होने के बाद किसान फफूंदनाशक दवाओं का सही अनुपात में छिड़काव कर सकते हैं। विशेषज्ञ की सिफारिश के मुताबिक, कार्बेंडाजिम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर अथवा मैनकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव किया जा सकता है। किसानों को यह विशेष ध्यान रखना होगा कि वर्षा के दौरान छिड़काव न करें, बल्कि धूप निकलने या मौसम खुलने पर ही इसका इस्तेमाल करें ताकि दवा का असर प्रभावी रहे।
मक्का, अरहर और बागवानी में जल निकासी अत्यंत आवश्यक
फसल सुरक्षा पर प्रकाश डालते हुए डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि मक्के के खेतों में लंबे समय तक पानी ठहरा रहने से उसकी जड़ों के सड़ने का खतरा पैदा हो जाता है। इसलिए मक्के की फसल को बचाने के लिए खेतों से अतिरिक्त पानी निकालने की समुचित व्यवस्था करना अनिवार्य है। ठीक इसी प्रकार, अरहर की फसल भी जलभराव के प्रति काफी संवेदनशील होती है और अत्यधिक पानी से पौधे नष्ट हो सकते हैं। किसानों को चाहिए कि वे अपने खेतों की मेड़ों को काटकर जल निकासी के त्वरित प्रबंध करें। इसके अलावा, बागवानी फसलों में भी पानी के जमाव को रोकने के लिए विशेष सतर्कता बरतना बेहद जरूरी है।
कीट नियंत्रण में बारिश का मिला अप्रत्याशित लाभ
भारी और लगातार बारिश का एक सकारात्मक पहलू कीट प्रबंधन के रूप में सामने आया है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार तेज पानी गिरने से फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कई तरह के कीटों का प्रकोप स्वतः कम हो जाता है। विशेष रूप से मक्के की फसल को भारी नुकसान पहुंचाने वाले फॉल आर्मीवर्म कीट का फैलाव इस बारिश की वजह से काफी हद तक नियंत्रित हुआ है। कुल मिलाकर, अगस्त की अत्यधिक वर्षा ने पलामू की कृषि व्यवस्था के सामने दोहरी परिस्थिति पैदा की है। एक तरफ धान, मोटे अनाज और जलस्रोतों को इससे जबरदस्त मजबूती मिली है, वहीं दूसरी तरफ सब्जियों, अरहर, मक्का और बागवानी फसलों को बचाने के लिए जल निकासी और वैज्ञानिक रोग प्रबंधन किसानों के लिए प्राथमिक आवश्यकता बन गए हैं।


















