अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय नागरिकों के हितों की सुरक्षा के मामले में तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कूटनीतिक कार्यशैली को एक नई मानवीय दिशा प्रदान की थी। विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालते हुए उनका मुख्य ध्येय यही रहा कि दुनिया के किसी भी कोने में संकट से घिरा भारतीय नागरिक सुरक्षित अपने वतन वापस लौट सके। संकटग्रस्त नागरिकों की सहायता के लिए वे सदैव तत्पर रहती थीं और उनका एक वक्तव्य काफी चर्चित रहा था कि अगर कोई भारतीय नागरिक मंगल ग्रह पर भी फंस जाए, तो भारतीय दूतावास उसकी मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाएगा। इसी मानवीय दृष्टिकोण का एक सबसे बड़ा प्रमाण तब देखने को मिला जब पाकिस्तान के इस्लामाबाद में फंसी भारतीय महिला उजमा अहमद का गंभीर मामला सामने आया। उस कठिन समय में विदेश मंत्री की दृढ़ इच्छाशक्ति और भारतीय राजनयिकों की सजगता से उजमा अहमद की सुरक्षित वतन वापसी संभव हो सकी थी।
मलेशिया में मुलाकात और पाकिस्तान में धोखे का शिकार
उजमा अहमद की पहली मुलाकात पाकिस्तानी नागरिक ताहिर अली से मलेशिया में हुई थी। इसके बाद 1 मई को वह ताहिर अली के साथ पाकिस्तान की यात्रा पर गई। हालांकि, पाकिस्तान पहुंचने के तुरंत बाद उजमा के सामने एक चौंकाने वाली सच्चाई आई। उसे पता चला कि ताहिर अली पहले से ही शादीशुदा है और उसके चार बच्चे भी हैं। इस धोखे और वास्तविकता का भान होते ही उजमा को यह समझने में देर नहीं लगी कि वह एक अत्यंत भयावह स्थिति में फंस चुकी है। जिस स्थान पर वह पहुंची थी, वह उसके लिए किसी भी तरह से सुरक्षित वातावरण नहीं था, बल्कि एक अत्यंत खतरनाक मोड़ बन चुका था, जहां से बाहर निकलने का कोई सामान्य मार्ग दिखाई नहीं दे रहा था।
बंदूक की नोक पर शादी और दूतावास तक पहुंचने की साहसी योजना
पाकिस्तान में रुकने के दौरान उजमा को कई अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उसे बंदूक की नोक पर डराकर शादी करने के लिए विवश किया गया। जब उसने इस जबरदस्ती का विरोध किया और इनकार जताया, तो उसे तरह-तरह की शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गईं। इस खतरनाक माहौल के बीच भी उजमा ने साहस बनाए रखा और वहां से किसी भी तरह निकलने की गोपनीय योजना बनाई। इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग तक पहुंचना उसके लिए बिल्कुल आसान नहीं था। इस कार्य को अंजाम देने के लिए दूतावास में कार्यरत एक भारतीय दंपति ने दूरदर्शिता दिखाई और उजमा के भाई-भाभी होने का नाटक रचा। इस योजना के माध्यम से ताहिर अली का विश्वास हासिल किया गया, जिससे उजमा सुरक्षित रूप से भारतीय उच्चायोग के परिसर में प्रवेश करने में सफल हो सकी।
नागरिकता का सत्यापन और सुषमा स्वराज का ऐतिहासिक निर्देश
भारतीय उच्चायोग पहुंचने के पश्चात उजमा ने वहां मौजूद अधिकारियों को अपने साथ घटित हुई पूरी आपबीती विस्तार से बताई। घटना की गंभीरता को देखते हुए अधिकारियों ने अगले ही दिन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से सीधा संपर्क साधा। विदेश मंत्री ने स्थिति की संवेदनशीलता को समझते हुए निर्देश दिया कि सबसे पहले उजमा के भारतीय नागरिक होने की प्रामाणिकता स्थापित की जाए। इसके लिए उसके पासपोर्ट की बारीकी से जांच की गई और साथ ही भारत में रह रहे उसके भाई के पते का भी पूर्ण सत्यापन करवाया गया। सुषमा स्वराज का स्पष्ट मानना था कि हर कदम पूरी तरह से विधिक और ठोस आधार पर उठाया जाना चाहिए। नागरिकता की पुष्टि होते ही उन्होंने भारतीय उच्चायोग को बेहद कड़ा संदेश भेजा। उन्होंने स्पष्ट आदेश दिया कि यदि परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि उजमा को लंबे समय तक उच्चायोग के अंदर रखना पड़े, तब भी उसकी सुरक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। उन्होंने यहां तक कहा कि आवश्यकता पड़ने पर उजमा को एक या दो साल तक भी भारतीय उच्चायोग में सुरक्षित रखा जाएगा, जिससे यह साफ हो गया कि भारतीय नागरिक की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता थी।
कानूनी अड़चनें, वाघा सीमा की सुरक्षा और सफल वापसी
राजनयिक स्तर पर कार्रवाई शुरू होने के साथ ही तनाव काफी बढ़ गया। ताहिर अली अपने चार साथियों के साथ भारतीय उच्चायोग के बाहर लगातार चक्कर लगा रहा था, जिससे सुरक्षा को लेकर गंभीर स्थिति बनी रही। दूतावास के अधिकारी उजमा को शीघ्रता से भारत भेजना चाहते थे, किंतु विधिक प्रक्रियाओं का पूर्ण पालन आवश्यक था। उच्च न्यायालय के आदेश की प्रमाणित प्रति दोपहर करीब ढाई बजे प्राप्त हो सकी, जबकि वाघा बॉर्डर बंद होने में मात्र एक घंटे का समय शेष बचा था। कम समय और सुरक्षा जोखिमों को ध्यान में रखते हुए अधिकारियों ने उजमा को एक और दिन उच्चायोग के परिसर में सुरक्षित रखने का निर्णय लिया। अगले दिन तड़के करीब ढाई बजे भारतीय उच्चायोग के अधिकारी उजमा को लेकर वाघा सीमा की ओर रवाना हुए। सुबह लगभग साढ़े सात बजे वे वाघा सीमा पर पहुंचे, जो सीमा द्वार खुलने के निर्धारित समय से लगभग दो घंटे पहले का वक्त था। सुबह साढ़े नौ बजे उजमा ने आखिरकार भारतीय सीमा में प्रवेश किया और उसकी सुरक्षित वापसी संपन्न हुई।
अंबाला से दिल्ली तक का राजनीतिक सफर और अमिट मानवीय छाप
सुषमा स्वराज का सार्वजनिक जीवन सेवा और उपलब्धियों से भरा रहा। उनका जन्म 14 फरवरी 1952 को हरियाणा के अंबाला में हुआ था। उन्होंने अंबाला कैंट स्थित सनातन धर्म कॉलेज से संस्कृत और राजनीतिक विज्ञान विषय में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से विधि की पढ़ाई पूरी की। 1970 के दशक में उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और आपातकाल के विरोध में अपनी आवाज बुलंद की। बाद में वे भाजपा में शामिल हुईं और विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं दीं। मात्र 25 वर्ष की आयु में वे हरियाणा की सबसे युवा कैबिनेट मंत्री बनीं। इसके पश्चात वर्ष 1998 में उन्होंने दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। वे भारत की विदेश मंत्री बनीं और इस उच्च पद को सुशोभित करने वाली देश की दूसरी महिला थीं। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने केवल उजमा अहमद ही नहीं, बल्कि बांग्लादेश और यमन जैसे स्थानों पर फंसे अनेक भारतीय नागरिकों की सहायता कर उन्हें सुरक्षित वतन वापस लाया। 6 अगस्त 2019 को 67 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, किंतु उनकी संवेदनशीलता और नेतृत्व क्षमता आज भी याद की जाती है।



















