फसल चक्र में धान की कटाई के ठीक बाद गेहूं की बुवाई करने वाले किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती खेत को समय पर खाली करने की होती है। उत्तर प्रदेश, विशेष रूप से पूर्वांचल के इलाकों में यदि धान पकने में ज्यादा समय लग जाए, तो रबी मौसम में गेहूं की बिजाई पिछड़ जाती है। देर से बोई गई गेहूं की फसल का सीधा असर पैदावार पर पड़ता है। ऐसे में कृषि वैज्ञानिकों और सलाहकारों ने विभिन्न परिस्थितियों, जैसे जलभराव, सामान्य सिंचाई और सुगंधित उपज के लिए कई ऐसी किस्में सुझाई हैं, जिन्हें सही समय पर रोपकर किसान अगली फसल के लिए अपने खेत समय से तैयार कर सकते हैं।
नरेंद्र धान-97 और नरेंद्र-359 का विकल्प
पूर्वी उत्तर प्रदेश के कृषि क्षेत्रों में नरेंद्र धान-97 काफी प्रचलित है। यह अपेक्षाकृत कम समय में तैयार होने वाली धान की किस्मों में गिनी जाती है। यदि किसान इसकी रोपाई सही समय पर कर लें और खेत में पानी के साथ-साथ उर्वरक का उचित प्रबंधन रखें, तो फसल जल्दी पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है। लंबी अवधि वाली पारंपरिक किस्मों की तुलना में यह खेत को जल्दी खाली कराने में मददगार साबित होती है, जिससे गेहूं की बुवाई बिना किसी रुकावट के की जा सकती है। हालांकि, वास्तविक तैयारी मौसम और रोपाई की तारीख पर भी निर्भर करती है।
इसी क्रम में नरेंद्र-359 भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में पहचानी जाने वाली एक प्रमुख किस्म है। इसे मध्यम अवधि में पकने वाली श्रेणी में रखा गया है। समय रहते रोपाई पूरी कर लेने पर किसान धान काटकर गेहूं के लिए खेत सुचारू रूप से तैयार कर सकते हैं। इसके विपरीत, यदि इसकी रोपाई में देरी की गई, तो रबी फसल की बुवाई भी आगे खिसक सकती है। इसलिए इस किस्म को अपनाते समय समयबद्ध रोपाई पर खास ध्यान देना आवश्यक होता है।
जलभराव वाले इलाकों के लिए सांभा सब-1 और एनडीआर-9930111
पूर्वांचल के कई इलाकों में मॉनसून के दौरान खेतों में पानी भरने या बाढ़ जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों के लिए सांभा सब-1 को अत्यंत उपयोगी किस्म माना गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी आईसीएआर ने उत्तर प्रदेश के लिए जारी अपनी कृषि सलाह में इसे प्रमुखता से शामिल किया है। हालांकि, जलभराव सहने की क्षमता के बावजूद, यदि किसान का प्राथमिक उद्देश्य धान के तुरंत बाद गेहूं बोना है, तो उसे इस किस्म के पकने के कुल दिनों और अपनी रोपाई की तारीख का तालमेल जरूर देखना चाहिए।
जलभराव की समस्या से निपटने के लिए एनडीआर-9930111 भी एक उपयुक्त विकल्प है। आईसीएआर ने इसे उत्तर प्रदेश के लिए अनुशंसित किस्मों और जलभराव सहनशील बीजों की सूची में रखा है। जहां खेतों से पानी की निकासी धीमी होती है, वहां यह किस्म फसल को नुकसान से बचाती है। फिर भी, गेहूं की समय पर बिजाई के लिए केवल बीज का चयन ही काफी नहीं होता, बल्कि कटाई के तुरंत बाद खेत से पानी निकालने का उचित प्रबंध होना भी उतना ही आवश्यक है।
मध्यम अवधि और कम गिरने वाली किस्में: एमटीयू-7029 और एनडीआर-9436
एमटीयू-7029 उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच काफी लोकप्रिय है। आईसीएआर के वर्गीकरण के अनुसार, यह मध्यम अवधि वाली और तेज हवा या पानी में अपेक्षाकृत कम गिरने वाली किस्मों में शामिल है। सामान्य कृषि परिस्थितियों में, जहां धान के बाद गेहूं की फसल चक्र प्रणाली अपनाई जाती है, यह किस्म काफी व्यावहारिक मानी जाती है। इसमें भी यही नियम लागू होता है कि रोपाई देर से करने पर गेहूं की बिजाई का चक्र प्रभावित हो सकता है।
इसके साथ ही एनडीआर-9436 भी मध्यम अवधि और तने की मजबूती के कारण कम गिरने वाली किस्मों में दर्ज है। यदि खेत में पर्याप्त सिंचाई प्रबंधन हो और समय पर पौधे लगाए गए हों, तो कटाई के तुरंत बाद रबी फसल की तैयारी शुरू की जा सकती है। इस किस्म का चुनाव करने से पहले किसानों के लिए अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र यानी केवीके की स्थानीय सिफारिशों को देखना फायदेमंद रहता है।
सुगंधित और बासमती विकल्पों में पूसा सुगंध-4 तथा पूसा बासमती-1509
जो किसान बाजार में सुगंधित चावल की मांग का लाभ उठाना चाहते हैं और साथ ही गेहूं की बुवाई भी प्रभावित नहीं होने देना चाहते, उनके लिए पूसा सुगंध-4 एक अच्छा विकल्प है। आईसीएआर ने इसे उत्तर प्रदेश के लिए मध्यम अवधि की किस्मों में शामिल किया है। इसके जरिए किसान सुगंधित उपज का अच्छा भाव पा सकते हैं, बशर्ते रोपाई सही समय पर की जाए और कटाई में किसी तरह की लापरवाही न बरती जाए।
बासमती समूह में रुचि रखने वाले किसानों के लिए पूसा बासमती-1509 एक जानी-मानी किस्म है। यह बासमती वर्ग की अन्य किस्मों की तुलना में काफी जल्दी पककर तैयार हो जाती है। कम समय में तैयार होने के कारण यह अगली रबी फसल के लिए खेत को जल्दी खाली कर देती है। हालांकि, पूर्वांचल के विभिन्न जिलों में मिट्टी की संरचना, सिंचाई के साधन और स्थानीय मंडी की मांग अलग-अलग होती है, इसलिए इसे बड़े पैमाने पर लगाने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से परामर्श लेना उचित माना जाता है।





















