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यारलुंग त्सांगपो पर चीनी महापरियोजना को लेकर ब्रह्मा चेलानी ने दी चेतावनी, हिमालयी फॉल्ट और जल सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय बहस की मांगभारत
20 सित॰ 2026, 11:10 pm (12 मिनट पहले)· 0

यारलुंग त्सांगपो पर चीनी महापरियोजना को लेकर ब्रह्मा चेलानी ने दी चेतावनी, हिमालयी फॉल्ट और जल सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय बहस की मांग

तिब्बत में बन रहे 60 हजार मेगावाट के मेडोग बांध पर रणनीतिकार ब्रह्मा चेलानी ने चिंता जताते हुए भारत से चीनी वैज्ञानिकों की भूगर्भीय चेतावनियों को वैश्विक मंचों पर ले जाने का आग्रह किया है।

तिब्बत के ऊपरी इलाके में यारलुंग त्सांगपो नदी के घुमावदार मोड़ पर आकार ले रही विशालकाय जलविद्युत परियोजना ने हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण, भूगर्भीय संतुलन और डाउनस्ट्रीम जल सुरक्षा को लेकर एक व्यापक विमर्श छेड़ दिया है। रणनीतिक मामलों के विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी ने इस परियोजना की संरचनात्मक और भूवैज्ञानिक कमजोरियों पर प्रकाश डालते हुए तर्क दिया है कि भारत को अपनी शांत कूटनीति से आगे बढ़कर स्वयं चीन के भूवैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित अध्ययनों को दुनिया के प्रमुख वैज्ञानिक और रणनीतिक मंचों पर मजबूती से उठाना चाहिए। उनके अनुसार, जब सीमा पार की किसी विशाल संरचना के नीचे सक्रिय भ्रंश रेखाएं और कमजोर चट्टानें मौजूद हों, तो यह केवल एक देश की बिजली परियोजना नहीं रह जाती, बल्कि समूचे निचले इलाके के लिए अस्तित्व का संकट बन जाती है।

ब्रह्मा चेलानी ने सोशल मीडिया पर इस विरोधाभास की ओर ध्यान आकर्षित किया कि यदि भारत ने चीनी सीमा के बिल्कुल मुहाने पर इस पैमाने का कोई विशाल बांध शुरू किया होता, तो बीजिंग ने पर्यावरणीय क्षरण, भूकंपीय जोखिम और जल अधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी अभियान छेड़ दिया होता। इसके विपरीत, बीजिंग स्वयं ऐसी विशालकाय संरचनाओं का निर्माण कर रहा है जबकि उसके अपने सरकारी शोध संस्थानों के वैज्ञानिक वहां की जमीनी हकीकत को लेकर लगातार आगाह कर रहे हैं। चेलानी का मानना है कि भारत को इन स्वतंत्र और वैज्ञानिक साक्ष्यों का इस्तेमाल कर वैश्विक जनमत को सतर्क करना चाहिए।

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साठ हजार मेगावाट क्षमता और थ्री गॉर्जेस से भी विशाल आकार

तिब्बत के मेडोग काउंटी में स्थित यह परियोजना यारलुंग त्सांगपो नदी पर केंद्रित है, जो नामचा बरवा पर्वत श्रृंखला के पास एक गहरा यू-टर्न लेती हुई भारत के अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। भारतीय सीमा में कदम रखते ही इसे सियांग कहा जाता है और आगे चलकर असम के विशाल मैदानी इलाकों में यह ब्रह्मपुत्र का रूप ले लेती है। प्रस्तावित योजना के अनुसार, इस मेडोग संयंत्र की स्थापित उत्पादन क्षमता लगभग 60,000 मेगावाट तय की गई है, जो मध्य चीन में स्थित विख्यात थ्री गॉर्जेस डैम की कुल बिजली उत्पादन क्षमता से भी कहीं अधिक है।

वर्ष 2025 में आरंभ की गई निर्माण गतिविधियों के चलते इसका दायरा पारंपरिक ऊर्जा ढांचे से कहीं आगे निकल चुका है। भारतीय अंतरराष्ट्रीय सीमा से अत्यधिक निकटता और नदी के भौगोलिक प्रवाह पर एकाधिकार की संभावना के कारण यह योजना पर्यावरण, नागरिक सुरक्षा और अंतरराज्यीय जल वितरण का एक बेहद नाजुक बिंदु बन चुकी है। नामचा बरवा के तीखे मोड़ पर पानी की अपार ऊर्जा को नियंत्रित करने का यह प्रयास सीधे तौर पर निचले तटीय इलाकों के जीवन चक्र को प्रभावित करता है।

नींव के नीचे सक्रिय पाइझेन फॉल्ट और वैज्ञानिक अध्ययन

इस निर्माण स्थल के भूवैज्ञानिक पहलुओं पर नजर डालें तो सबसे गंभीर पहलू वह सक्रिय दरार प्रणाली है जिसके ऊपर पूरा जलाशय बनाया जा रहा है। चीनी सरकारी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण से जुड़े संस्थानों के शोधकर्ताओं ने अपने तकनीकी अध्ययनों में स्पष्ट किया है कि मेडोग परियोजना क्षेत्र के ठीक नीचे सक्रिय पाइझेन फॉल्ट यानी पृथ्वी की पपड़ी में मौजूद एक गतिशील भ्रंश रेखा गुजरती है। वैज्ञानिकों की इन रिपोर्टों के अनुसार, परियोजना क्षेत्र की चट्टानें अत्यधिक विखंडित हैं, उनकी आंतरिक बनावट बेहद कमजोर है और वे लगातार विवर्तनिक तनाव झेल रही हैं।

भूवैज्ञानिकों के शोध पत्र आगाह करते हैं कि हिमालय की निरंतर हलचलों और भ्रंश रेखा की गतिविधियों के चलते इस विशाल जलाशय के आसपास भीषण भूस्खलन और पहाड़ों के दरकने का जोखिम कई गुना बढ़ सकता है। साक्ष्य के तौर पर वर्ष 2017 में तिब्बत के निंगची क्षेत्र में आए 6.9 तीव्रता वाले भूकंप का उल्लेख किया गया है, जो इसी जटिल फॉल्ट प्रणाली की निरंतर सक्रियता का प्रत्यक्ष प्रमाण माना जाता है। हालांकि इन तकनीकी अध्ययनों का सीधा आशय यह नहीं है कि ढांचा तुरंत ढह जाएगा, लेकिन वे इस तथ्य को निर्विवाद रूप से स्थापित करते हैं कि परियोजना अत्यधिक असुरक्षित और संवेदनशील भौगोलिक आधार पर टिकी है, जहां मामूली सी विवर्तनिक हलचल भी भयानक रूप ले सकती है।

जल प्रवाह पर नियंत्रण और गाद का संकट

सुरक्षा के ढांचागत जोखिमों के साथ-साथ नदी के सामान्य जल प्रवाह पर पड़ने वाला असर भारत की सबसे बड़ी चिंता है। ब्रह्मपुत्र का पानी भारत के अरुणाचल प्रदेश, असम और अंततः बांग्लादेश के लाखों लोगों की आजीविका, खेती और जल आपूर्ति का आधार है। मानसून के चार महीनों के अतिरिक्त शेष शुष्क मौसम में इस नदी का प्रवाह मुख्य रूप से तिब्बत के हिमनदों, पिघलती बर्फ और ऊपरी जलस्रोतों पर निर्भर रहता है। यदि मेडोग जैसी विशालकाय परियोजना के जरिए नदी के ऊपरी हिस्से को पूरी तरह बांध दिया जाता है, तो नीचे की ओर आने वाले पानी की मात्रा और समय पर बीजिंग का एकतरफा नियंत्रण स्थापित हो जाएगा।

इसके अलावा ब्रह्मा चेलानी ने नदी के साथ बहकर आने वाली गाद, खनिज और उपजाऊ मिट्टी के अवरोध का गंभीर मुद्दा उठाया है। एक विशाल जलाशय के निर्माण से पहाड़ों से बहकर आने वाली गाद का बड़ा हिस्सा बांध के पीछे ही जमा हो जाएगा। प्राकृतिक गाद के रुकने से असम और बांग्लादेश के बाढ़ के मैदानों की मिट्टी की उर्वरता घट जाएगी, नदी का कटाव असंतुलित होगा और समूची डाउनस्ट्रीम जलीय पारिस्थितिकी को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी।

आपदा प्रबंधन और सीमा पार विनाश की आशंकाएं

हिमालय का यह हिस्सा पृथ्वी के सर्वाधिक सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में गिना जाता है। ऐसे में अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन से उत्पन्न झीलों के टूटने या किसी विनाशकारी भूकंप के दौरान यदि इस विशाल बांध के ढांचे को कोई क्षति पहुंचती है, तो उसका सीधा प्रहार डाउनस्ट्रीम पर बसे भारतीय इलाकों पर होगा। यद्यपि किसी संभावित हादसे की सीमा को लेकर विभिन्न विश्लेषकों के अपने-अपने गणितीय आकलन हैं, फिर भी एक तथ्य स्पष्ट है कि नदी का ढलान सीधे भारत की ओर है।

किसी भी अप्रत्याशित जल रिहाई या संरचनात्मक विफलता की स्थिति में अरुणाचल प्रदेश की घाटियों और असम के मैदानी हिस्सों में भयंकर तबाही आ सकती है। यही कारण है कि इस संवेदनशील गलियारे में समय रहते चेतावनी देने वाली सटीक प्रणाली, पारदर्शी हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझाकरण और पुख्ता सीमा पार आपदा प्रबंधन तंत्र की मांग उठ रही है। ब्रह्मपुत्र आगे चलकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है, इसलिए इस प्रकार के किसी भी संकट का दायरा बहुराष्ट्रीय स्तर का हो सकता है।

बानकियाओ हादसे की ऐतिहासिक सीख और पारदर्शिता की कमी

चीनी जल परियोजनाओं के संदर्भ में ऐतिहासिक दुर्घटनाओं की मिसाल देते हुए ब्रह्मा चेलानी ने 1975 के बानकियाओ बांध विध्वंस की याद दिलाई है। उस समय अत्यधिक मानसूनी बारिश और संरचनात्मक सीमाओं के कारण बांध ढह गया था, जिससे इतिहास की सबसे भयानक मानव त्रासदियों में से एक दर्ज हुई थी। इतिहास गवाह रहा है कि निर्माण की गति और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के दबाव में वैज्ञानिक चेतावनियों को दरकिनार करना किस हद तक घातक सिद्ध हो सकता है।

चेलानी का स्पष्ट तर्क है कि जब इतनी विशाल परियोजना किसी अंतरराष्ट्रीय नदी के उद्गम पर बनाई जा रही हो, तो गोपनीयता के बजाय स्वतंत्र वैज्ञानिक निगरानी और वैश्विक पारदर्शिता अनिवार्य होनी चाहिए। चीन के भीतर ही जब वैज्ञानिक कमजोर चट्टानी परतों और फॉल्ट गतिविधियों को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं, तो उन चेतावनियों को फाइलों में बंद रखने के बजाय अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की समीक्षा के दायरे में लाया जाना आवश्यक है।

शांत कूटनीति से बहुपक्षीय मंचों की ओर और भारतीय विकल्प

अब तक भारत मुख्य रूप से बंद कमरों में और द्विपक्षीय कूटनीतिक वार्ताओं के जरिए बीजिंग के समक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज कराता रहा है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि केवल द्विपक्षीय बातचीत से इस विशाल निर्माण की गति या दिशा को प्रभावित नहीं किया जा सका है। चेलानी के अनुसार, भारत को अब अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलनों, संयुक्त राष्ट्र के जल मंचों और वैश्विक भूवैज्ञानिक संघों के बीच इन चीनी अध्ययनों को रखना चाहिए, ताकि वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय बीजिंग की इस मनमानी पर जवाबदेही तय कर सके।

इसके समानांतर, रणनीतिक संतुलन साधने के लिए भारत में भी अरुणाचल प्रदेश के भीतर प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर विमर्श तेज हो गया है। इस काउंटर परियोजना का मुख्य उद्देश्य चीन द्वारा अचानक छोड़े जाने वाले अत्यधिक पानी को अवशोषित करना, संभावित सूखे के समय जल भंडारण सुनिश्चित करना और ब्रह्मपुत्र बेसिन पर भारत के पारंपरिक जल अधिकारों को कानूनी एवं भौतिक रूप से स्थापित करना है। सीमा के दोनों ओर जल ढांचों की यह होड़ हिमालयी क्षेत्र में पानी को भविष्य के एक बड़े रणनीतिक हथियार के रूप में रेखांकित कर रही है।

सवाल-जवाब

चीन की मेडोग जलविद्युत परियोजना की प्रस्तावित क्षमता कितनी है?
इस परियोजना की प्रस्तावित उत्पादन क्षमता लगभग 60,000 मेगावाट है, जो चीन के मौजूदा थ्री गॉर्जेस डैम की क्षमता से भी काफी अधिक है।
परियोजना स्थल के नीचे किस भूगर्भीय खतरे की पहचान की गई है?
चीनी भूवैज्ञानिकों के अध्ययनों के अनुसार, परियोजना क्षेत्र के ठीक नीचे सक्रिय पाइझेन फॉल्ट मौजूद है, जहां कमजोर चट्टानों और विवर्तनिक हलचलों के कारण भारी भूस्खलन का जोखिम है।
ब्रह्मा चेलानी ने भारत सरकार को क्या कदम उठाने की सलाह दी है?
उन्होंने भारत को अपनी शांत कूटनीति से आगे बढ़कर चीनी वैज्ञानिकों द्वारा उजागर की गई भूगर्भीय और पर्यावरणीय चेतावनियों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने का सुझाव दिया है।
यारलुंग त्सांगपो नदी भारत में किन नामों से जानी जाती है?
तिब्बत की यारलुंग त्सांगपो नदी अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने पर सियांग कहलाती है और आगे असम में बहते हुए इसे ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है।
इस विशाल बांध के निर्माण से निचले इलाकों के जल प्रवाह पर क्या असर पड़ सकता है?
विशाल जलाशय बनने से शुष्क मौसम में पानी के प्राकृतिक प्रवाह और उपजाऊ गाद के बहाव में भारी रुकावट आ सकती है, जिससे खेती और पर्यावरण प्रभावित होंगे।
चेलानी ने चीन के किस पुराने बांध हादसे का उदाहरण दिया है?
उन्होंने 1975 के बानकियाओ बांध हादसे का उल्लेख किया है, जहां भारी बारिश और वैज्ञानिक चेतावनियों की अनदेखी के बाद बांध टूटने से बड़े पैमाने पर तबाही हुई थी।
चीन के इस प्रोजेक्ट के जवाब में भारत में किस परियोजना की चर्चा हो रही है?
भारत में रणनीतिक संतुलन और जल भंडारण सुनिश्चित करने के लिए अरुणाचल प्रदेश में सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना के निर्माण को लेकर चर्चा चल रही है।
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