उत्तर प्रदेश के झांसी में शारदीय नवरात्र के पावन पर्व पर सामाजिक सौहार्द और गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक बेहद खूबसूरत तस्वीर देखने को मिलती है। जब पूरा शहर देवी उपासना और उत्सव के माहौल में रंगा होता है, उस वक्त पूजा पंडालों और घरों में स्थापित होने वाली मां दुर्गा की दिव्य प्रतिमाओं को गढ़ने में मुस्लिम मूर्तिकार अब्दुल खलील पूरी निष्ठा के साथ जुटे रहते हैं। उनका परिवार पिछले करीब 40 से 45 सालों से लगातार देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाने के पुश्तैनी काम से जुड़ा हुआ है। इस हुनर की नींव उनके पिता ने रखी थी, जिसे अब्दुल खलील ने न केवल जीवित रखा बल्कि अपनी कलात्मक लगन से एक नई ऊंचाई दी है। सबसे सुखद पहलू यह है कि अब उनके बच्चे भी इस पारिवारिक विधा और शिल्प कौशल को सीखने में गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
पिता की विरासत और दूसरी पीढ़ी का समर्पण
अब्दुल खलील के घराने में मूर्तिकला का यह सफर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बहुत सहज ढंग से आगे बढ़ा है। उनके वालिद अपने दौर में श्रद्धा भाव से विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तराशा करते थे। अपने बचपन के दिनों से ही अब्दुल खलील पिता के पास बैठकर मिट्टी सानने, सांचे तैयार करने और मूर्तियों को गढ़ने के काम को गौर से देखा करते थे। पिता के काम को देखते-देखते उन्होंने धीरे-धीरे मिट्टी को मनचाहा आकार देना, चेहरों पर सजीव भाव उकेरना और बारीकियों को समझना शुरू किया। वर्षों के अभ्यास से उन्हें इस पारंपरिक शिल्प का गहरा अनुभव हासिल हुआ। जब पिता का साया सिर से उठा, तब परिवार के इस हुनर और जीविकोपार्जन की पूरी जिम्मेदारी अब्दुल खलील के कंधों पर आ गई। उन्होंने इस जिम्मेदारी को पूरे मान-सम्मान के साथ निभाया और आज भी उसी पुरानी लगन, मेहनत और संजीदगी से प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं।
ढांचे से लेकर रंग-रोगन तक प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया
मां दुर्गा की मनोहारी प्रतिमा तैयार करने की पूरी प्रक्रिया बेहद जटिल, धैर्यपूर्ण और कई चरणों में पूरी होने वाली कला है। सबसे पहले प्रतिमा का बुनियादी ढांचा बांस और लकड़ी के सहारे मजबूती से तैयार किया जाता है। इसके पश्चात विशेष रूप से तैयार की गई चिकनी मिट्टी की सहायता से प्रतिमा के पूरे स्वरूप को गढ़ा जाता है। चेहरे के नैन-नक्श तराशना, हाथों की मुद्राओं को सजीव बनाना और विभिन्न अंगों को सटीक अनुपात में ढालना सबसे कठिन काम माना जाता है, जिसमें थोड़ी सी भी चूक पूरी बनावट बिगाड़ सकती है। जब मिट्टी अच्छी तरह सूख जाती है, तब उस पर बारीक लेप लगाकर सतह को चिकना किया जाता है। इसके बाद आकर्षक रंगों और पारंपरिक सजावट के जरिए मां दुर्गा के रूप को अंतिम स्वरूप दिया जाता है। इस समूचे निर्माण कार्य में कारीगर को असीम धैर्य, लंबे अनुभव और छोटी-छोटी बारीकियों पर लगातार ध्यान केंद्रित रखने की जरूरत होती है, क्योंकि प्रतिमा का हर एक अंग उसकी समग्र भव्यता और दिव्यता को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
त्योहार की व्यस्तता और भावी पीढ़ी की ललक
जैसे ही शारदीय नवरात्र की तारीखें नजदीक आती हैं, देवी प्रतिमाओं की जबरदस्त मांग के चलते कार्यशाला में व्यस्तता कई गुना बढ़ जाती है। अब्दुल खलील अपने कई दशकों के संचित अनुभव के दम पर दिन-रात मेहनत करके हर आर्डर को समय पर पूरा करते हैं। उनके लिए हर एक नई प्रतिमा को आकार देना केवल व्यापारिक काम नहीं, बल्कि उस हुनरमंद विरासत को श्रद्धांजलि देने जैसा है जो उन्हें विरासत में अपने पिता से मिली थी। समय बीतने के साथ यह कला उनके जीवन का अटूट हिस्सा और उनकी व्यक्तिगत पहचान बन चुकी है। इस पुश्तैनी सिलसिले की सबसे मजबूत कड़ी अब अब्दुल खलील के अपने बच्चे बन रहे हैं। वे रोजमर्रा के काम के दौरान अपने पिता को मिट्टी से प्रतिमाएं तराशते देखते हैं और खुद भी इस विधा को आत्मसात करने का प्रयास कर रहे हैं। बच्चे मिट्टी को गूंथने, ढांचों को समझने और आकार देने की शुरुआती कोशिशों में लगे रहते हैं। हालांकि इस हुनर में निपुणता हासिल करने के लिए कई वर्षों के कड़े अभ्यास और अनुशासन की आवश्यकता होती है, लेकिन बच्चों के इस उत्साह से यह उम्मीद पूरी तरह पक्की हो चुकी है कि यह खानदानी कला आगे भी सुरक्षित रहेगी।
साझा संस्कृति और सामाजिक सौहार्द का जीवंत संदेश
अब्दुल खलील और उनका परिवार बुंदेलखंड के झांसी की उस पुरातन साझा संस्कृति की मिसाल पेश करता है, जहां हुनर और कला को कभी किसी मजहबी दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता। एक मुस्लिम दस्तकार के सधे हुए हाथों से गढ़ी गई मां दुर्गा की पावन प्रतिमाएं नवरात्र के पावन दिनों में अनगिनत हिंदू श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बनती हैं। जहां एक तरफ कारीगर अपनी कलात्मक साधना और एकाग्रता से प्रतिमा को रूप देता है, वहीं दूसरी तरफ भक्तजन उसी निष्ठा और श्रद्धा के साथ उसकी विधि-विधान से स्थापना कर शीश नवाते हैं। पिछले चार से पांच दशकों से अनवरत चल रहा यह काम अब सिर्फ आजीविका का जरिया नहीं रहा, बल्कि पीढ़ियों के बीच बहने वाली सद्भाव की धारा बन चुका है। पिता से बेटे और अब पोतों तक पहुंच रही यह कला साबित करती है कि साझा परंपराएं, आपसी विश्वास और कलात्मक मेहनत किसी भी समाज के अलग-अलग वर्गों को एक मजबूत डोर में बांधने की ताकत रखती हैं।


















