शारदीय नवरात्रि उत्सव की शुरुआत से ठीक पहले बीकानेर शहर में भक्तिमय और उल्लासपूर्ण माहौल साफ नजर आने लगा है। पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्सव की तैयारियों के बीच दूरदराज के इलाकों से पहुंचे हुनरमंद मूर्तिकार दिन-रात जुगत लगाकर मां दुर्गा के विभिन्न रूपों को मिट्टी के जरिए साकार करने में जुटे हैं। शहर की पुगल रोड के किनारे इन दिनों मिट्टी की सोंधी महक फैली हुई है, जहां सड़क किनारे सजे अस्थायी शिविरों में देवी की भव्य और आकर्षक प्रतिमाएं अंतिम रूप ले रही हैं।
बाड़मेर जिले के बालोतरा क्षेत्र से आए यह पारंपरिक कारीगर पिछले कई सप्ताह से लगातार एकाग्रचित्त होकर इन मूर्तियों को गढ़ने, उन्हें तराशने और चटक प्राकृतिक रंगों से निखारने का काम कर रहे हैं। नवरात्रि के नौ दिवसीय पर्व के दौरान शहर के अनगिनत सार्वजनिक पूजा पंडालों तथा घरों में मां दुर्गा की विधिवत घटस्थापना की परंपरा है। इसी धार्मिक आवश्यकता के चलते इन कारीगरों के हाथों तैयार की गई मूर्तियां स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी हुई हैं।
पीढ़ियों की कला परंपरा और सड़क किनारे कठिन साधना
पुगल रोड की खुली पटरियों पर डेरा डाले यह कलाकार पीढ़ियों से मूर्ति निर्माण के पारंपरिक हुनर को संजोए हुए हैं। खुले आसमान के नीचे सड़क किनारे बिताए जाने वाले कई हफ्ते इन कारीगरों की लगन, कड़े परिश्रम और अपनी कला के प्रति गहरे समर्पण को बयां करते हैं। परिवार सहित इस काम में जुटे कलाकार नारायण ने बताया कि वे बीते कई वर्षों से अपने पूरे कुनबे के साथ बीकानेर का रुख करते हैं और नवरात्रि के विशेष मौसम में मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों का सृजन करते हैं।
परिवार के सभी सदस्य मिल-जुलकर इस रचनात्मक प्रक्रिया में हाथ बंटाते हैं। कोई मिट्टी तैयार करने की मशक्कत करता है, तो कोई बांस की खपच्चियों से ढांचा तैयार करने में लगा रहता है। इस तरह पूरा परिवार मिलकर आस्था के इस महापर्व के लिए कलात्मक योगदान देता है।
बांस, पुआल और चिकनी मिट्टी से 2 से 6 फीट तक का आकार
इन कलाकारों की कार्यशालाओं में तैयार की जा रही प्रतिमाओं की विविधता और बनावट देखते ही बनती है। यहां 2 फीट की छोटी प्रतिमाओं से लेकर 6 फीट तक की विशालकाय मूर्तियां भक्तों के लिए उपलब्ध कराई जा रही हैं। बाजार में सबसे अधिक मांग मां दुर्गा के महिषासुर मर्दिनी स्वरूप और सिंह पर सवार तेजस्वी रूपों की देखी जा रही है, जिन्हें श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा और भाव के साथ पसंद कर रहे हैं।
इन प्रतिमाओं के निर्माण में चाक-चिकनी मिट्टी के साथ बांस की खपच्चियों और धान के पुआल का बेहद नफासत भरा उपयोग किया जाता है। पुआल और बांस का आंतरिक ढांचा मूर्तियों को जरूरी मजबूती प्रदान करता है, जबकि ऊपर से लगाई जाने वाली चिकनी मिट्टी की परत चेहरे के भावों और आभूषणों को असाधारण सुंदरता देती है। अंतिम चरण में इन पर किए जाने वाले आकर्षक रंग मूर्तियों को जीवंत बना देते हैं।
मेहनत का मिला सम्मान, 3 हजार से 8 हजार रुपये तक तय हुए दाम
कारीगरों के इस अथक श्रम का उचित प्रतिफल भी उन्हें इस बार बेहतर आमदनी के रूप में मिलता दिखाई दे रहा है। प्रतिमाओं के आकार, ऊंचाई और उनकी बारीक नक्काशी के आधार पर इनकी कीमतें 3 हजार रुपये से लेकर 8 हजार रुपये तक तय की गई हैं। शहरवासी इन कारीगरों के हुनर और कठिन परिश्रम का सम्मान करते हुए पंडालों और घरेलू पूजा के लिए उत्साहपूर्वक मूर्तियों की खरीदारी कर रहे हैं। आकर्षक रंगों से सजी माता की इन मनमोहक प्रतिमाओं की तेज बिक्री से कलाकारों के चेहरों पर खुशी है और उनका यह मौसमी व्यवसाय आर्थिक रूप से काफी संबल देने वाला साबित हो रहा है।























