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कलर विजन ने तोड़ा सेना में जाने का सपना, करौली के भल्लू सिंह गुर्जर ने एकेडमी खोल सैकड़ों को बनाया फौजीराजस्थान
20 सित॰ 2026, 10:19 am (5 दिन पहले)· 1

कलर विजन ने तोड़ा सेना में जाने का सपना, करौली के भल्लू सिंह गुर्जर ने एकेडमी खोल सैकड़ों को बनाया फौजी

मेडिकल टेस्ट में आंखों के कलर विजन के कारण सेना में भर्ती होने से चूके करौली के भल्लू सिंह गुर्जर ने अपनी डिफेंस एकेडमी शुरू कर सैकड़ों युवाओं को देश सेवा की राह दिखाई है.

जीवन में आने वाली रुकावटें अक्सर किसी बड़े मकसद की शुरुआत साबित होती हैं. जब इंसान अपने तय किए रास्ते पर आगे बढ़ने से रोक दिया जाता है, तब वह दूसरों के लिए नया रास्ता तैयार करने का साहस जुटा सकता है. राजस्थान के करौली जिले के रहने वाले भल्लू सिंह गुर्जर का सफरनामा इसी जज्बे को बयां करता है. बचपन से देश की हिफाजत के लिए सैन्य वर्दी पहनने का ख्वाब देखने वाले भल्लू सिंह जब खुद सेना का हिस्सा नहीं बन सके, तो उन्होंने क्षेत्र के अन्य युवाओं के सपनों को हकीकत में बदलने का बीड़ा उठा लिया.

एनसीसी में उत्कृष्ट प्रदर्शन और सीनियर अंडर ऑफिसर का मुकाम

भल्लू सिंह के भीतर बचपन से ही भारतीय सेना में शामिल होकर सरहद पर देश की सेवा करने की तीव्र इच्छा थी. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से कदम बढ़ाए और वर्ष 2014 में एनसीसी में प्रवेश लिया. उन्होंने दिन-रात पसीना बहाया और अपनी अनुशासित कार्यशैली के दम पर एनसीसी में सीनियर अंडर ऑफिसर का प्रतिष्ठित ओहदा प्राप्त किया. इसके साथ ही उन्होंने कड़े परीक्षणों को पास करते हुए एनसीसी का महत्वपूर्ण सी सर्टिफिकेट भी अपने नाम किया, जिससे भर्ती प्रक्रिया में अतिरिक्त मदद मिल सके.

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तीन भर्तियों में शारीरिक दक्षता पास, लेकिन कलर विजन बना बाधा

वर्ष 2015 से भल्लू सिंह ने भारतीय सेना की खुली भर्तियों में ताल ठोकना शुरू किया. शारीरिक रूप से बेहद मजबूत होने के कारण उन्होंने लगातार तीन अलग-अलग सेना भर्तियों में हिस्सा लिया और हर बार फिजिकल टेस्ट को शानदार तरीके से पास किया. दौड़, बाधा दौड़ और अन्य शारीरिक मापदंडों में वे अव्वल रहे. हालांकि, असली रुकावट मेडिकल जांच के दौरान सामने आई, जहां डॉक्टरों ने उनकी आंखों में कलर विजन की समस्या की पहचान की.

सेना की चिकित्सा प्रक्रिया बेहद सख्त और व्यवस्थित होती है, जिसमें दृष्टि की गहन जांच के तहत कलर विजन टेस्ट अनिवार्य रूप से लिया जाता है. इस टेस्ट में उम्मीदवार को विभिन्न रंगों के जटिल मिश्रण के बीच छिपी आकृतियों और संख्याओं की पहचान करनी होती है. रंगों के इस भेद को स्पष्ट न पहचान पाने की वजह से भल्लू सिंह तीनों ही प्रयासों में मेडिकल बोर्ड द्वारा अनफिट घोषित कर दिए गए. एनसीसी सी सर्टिफिकेट और बेहतरीन शारीरिक दक्षता के बावजूद वे मेडिकल बाधा पार नहीं कर पाए. धीरे-धीरे भर्ती के लिए निर्धारित अधिकतम आयु सीमा समाप्त हो गई और उनका खुद फौजी बनने का सपना अधूरा रह गया.

निराशा को बनाया ताकत, कोरोना काल से पहले रखी एकेडमी की नींव

उम्र निकल जाने के बाद किसी भी युवा का हौसला टूट सकता था, मगर भल्लू सिंह ने अपनी इस विफलता को जीवन का विराम नहीं बनने दिया. उन्होंने तय किया कि जिस तरह की परेशानियों और मार्गदर्शन की कमी से उन्हें गुजरना पड़ा, उनके इलाके का कोई दूसरा होनहार नौजवान उस दर्द से न जूझे. इसी संकल्प के साथ उन्होंने करौली में चेतन डिफेंस एकेडमी की शुरुआत की. यह संस्थान कोरोना महामारी का दौर शुरू होने से पहले स्थापित किया गया था.

चेतन डिफेंस एकेडमी में उन्होंने ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले अभ्यर्थियों को सेना भर्ती की बहुआयामी तैयारियों से जोड़ना शुरू किया. यहां युवाओं को केवल मैदान पर दौड़ने तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि फिजिकल टेस्ट के साथ-साथ लिखित परीक्षा के पाठ्यक्रम पर भी गंभीरता से काम कराया जाने लगा. सुबह-शाम के सख्त शारीरिक अभ्यास के साथ कक्षा में पढ़ाई का ऐसा माहौल बनाया गया जिससे अभ्यर्थी हर स्तर पर तैयार हो सकें.

सैकड़ों युवाओं को दिलाई वर्दी, सफलता का मंत्र बताया

करीब छह साल पहले शुरू किए गए इस प्रयास ने शानदार परिणाम दिए हैं. भल्लू सिंह के अनुसार, उनकी एकेडमी से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले 100 से अधिक युवा सेना में चयनित होकर देश सेवा के लिए जा चुके हैं, जबकि कुल मिलाकर पिछले 6 वर्षों में यहां से प्रशिक्षित 200 से ज्यादा अभ्यर्थी भारतीय सेना में अपनी जगह पक्की कर चुके हैं. उनके लिए यह संख्या केवल एक आंकड़ा भर नहीं, बल्कि अपने अधूरे सपने की मुकम्मल जीत है.

सेना भर्ती की आकांक्षा रखने वाले नए अभ्यर्थियों को भल्लू सिंह स्पष्ट सलाह देते हैं कि इस राह में सफलता का कोई शॉर्टकट मौजूद नहीं है. उनके मुताबिक नियमित अभ्यास, कड़ा अनुशासन और अटूट मेहनत ही सफलता की कुंजी है. युवाओं को हर रोज शारीरिक व्यायाम और दौड़ के साथ-साथ लिखित परीक्षा के अध्ययन पर भी समान समय देना चाहिए, क्योंकि आधुनिक भर्ती प्रणाली में दोनों का संतुलन ही वर्दी तक पहुंचा सकता है.

सवाल-जवाब

भल्लू सिंह गुर्जर किस जिले के रहने वाले हैं?
भल्लू सिंह गुर्जर राजस्थान के करौली जिले के रहने वाले हैं.
भल्लू सिंह ने एनसीसी कब ज्वाइन की थी और उन्हें कौन सा पद मिला था?
उन्होंने वर्ष 2014 में एनसीसी ज्वाइन की थी और वहां सीनियर अंडर ऑफिसर का पद तथा सी सर्टिफिकेट हासिल किया था.
सेना भर्ती में भल्लू सिंह को किस वजह से बाहर होना पड़ा?
शारीरिक परीक्षा पास करने के बावजूद मेडिकल टेस्ट में आंखों में कलर विजन की कमी के कारण वे तीन बार बाहर हुए.
भल्लू सिंह की डिफेंस एकेडमी का क्या नाम है और यह कब शुरू हुई?
उनकी एकेडमी का नाम चेतन डिफेंस एकेडमी है, जिसकी शुरुआत कोरोना काल से पहले करौली में हुई थी.
चेतन डिफेंस एकेडमी से अब तक कितने युवा सेना में भर्ती हो चुके हैं?
उनकी एकेडमी से 100 से ज्यादा युवा सेना में भर्ती होकर जा चुके हैं और पिछले 6 वर्षों में कुल 200 से अधिक युवा भारतीय सेना में चयनित हुए हैं.
सेना भर्ती की तैयारी करने वाले युवाओं को भल्लू सिंह क्या सलाह देते हैं?
उनका कहना है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं है और युवाओं को रोजाना फिजिकल टेस्ट के साथ लिखित परीक्षा की भी बराबर तैयारी करनी चाहिए.
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टिप्पणियाँ 5

Riya Menon@riya-menon·4 दिन पहले

सैनिक तैयारी केवल शारीरिक दौड़ तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसके पीछे अनुशासित जीवनशैली, सही पोषण और मानसिक दृढ़ता की बड़ी भूमिका होती है। करौली जैसे क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर डिफेंस एकेडमी की स्थापना से युवाओं को न केवल शारीरिक दक्षता का मार्गदर्शन मिलता है, बल्कि उनकी दिनचर्या और फिटनेस संस्कृति में भी बड़ा बदलाव आता है। मेडिकल बाधा के बावजूद युवाओं को देश सेवा के लिए तैयार करने का यह प्रयास दिखाता है कि व्यक्तिगत असफलता को कैसे सामुदायिक विकास और स्वस्थ जीवनशैली के माध्यम में बदला जा सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·4 दिन पहले

भल्लू सिंह गुर्जर की यह पहल ग्रामीण और छोटे शहरों में उभरते 'सोशल आंत्रप्रेन्योरशिप' (सामाजिक उद्यमिता) और मानव संसाधन विकास का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। जब सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में व्यक्तिगत अवसर सीमित हो जाते हैं, तो रक्षा और कौशल प्रशिक्षण अकादमियों की स्थापना स्थानीय स्तर पर मार्गदर्शन और रोजगार क्षमता का एक अनूठा पारितंत्र तैयार करती है। करौली जैसे क्षेत्रों में यह मॉडल न केवल युवाओं की क्षमता को सैन्य सेवाओं में योगदान देने योग्य बनाता है, बल्कि टियर-3 शहरों में स्वरोजगार और कौशल विकास की दिशा में भी नया आर्थिक और सामाजिक प्रभाव उत्पन्न करता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·4 दिन पहले

रविकेश जी के विश्लेषण को नीतिगत दृष्टिकोण से आगे बढ़ाएं तो यह पहल दर्शाती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और ग्रामीण कौशल विकास के बीच का अंतर जमीनी स्तर पर कैसे भर रहा है। सार्वजनिक नीति और शासन के लिहाज से, करौली जैसे क्षेत्रों में बने यह प्रशिक्षण केंद्र राज्य के कौशल विकास अभियानों और सैन्य भर्ती प्रक्रियाओं के लिए एक पूरक पारिस्थितिकी तंत्र का काम करते हैं। यदि सरकारी नीतियां ऐसे स्थानीय केंद्रों को औपचारिक मार्गदर्शन और मान्यता प्रदान करें, तो टियर-3 शहरों में संरचनात्मक बेरोजगारी को कम करने और युवाओं की ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण में लगाने का एक टिकाऊ मॉडल तैयार हो सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·4 दिन पहले

भल्लू सिंह गुर्जर का यह सफर दर्शाता है कि किस प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में सेना भर्ती के दौरान मेडिकल बाधाओं, विशेषकर कलर विजन जैसी समस्याओं से जूझने वाले युवाओं को सही मार्गदर्शन की कमी खलती है। जब कोई योग्य उम्मीदवार तकनीकी मेडिकल कारणों से बाहर होता है, तो उसका अनुभव और एनसीसी का प्रशिक्षण स्थानीय स्तर पर एक मजबूत डिफेंस एकेडमी के माध्यम से सैकड़ों अन्य युवाओं को प्रशिक्षित करने में प्रभावी साबित हो सकता है। यह पहल न केवल युवाओं के लिए रोजगार का नया मार्ग खोलती है, बल्कि क्षेत्र में कानून-व्यवस्था के दायरे में रहकर युवाओं को सकारात्मक दिशा भी देती है।

Rohan Verma@rohan-verma·4 दिन पहले

भल्लू सिंह गुर्जर की यह पहल राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में डिफेंस कोचिंग के बढ़ते प्रभाव और युवाओं की उस ऊर्जा को सही दिशा देने का सटीक उदाहरण है जो अक्सर तकनीकी अयोग्यताओं के कारण बिखर जाती है। करौली जैसे इलाकों में जहां रोजगार के पारंपरिक विकल्प सीमित हैं, ऐसे संस्थान युवाओं को अनुशासित करियर की ओर मोड़ने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। यदि इस प्रकार के स्थानीय प्रशिक्षकों को औपचारिक मार्गदर्शन और प्रशासनिक सहयोग मिले, तो ग्रामीण भारत के सुदूर कोनों से और अधिक योग्य युवा देश की रक्षा सेवाओं में अपनी जगह बना सकेंगे।

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