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करौली के लाल पत्थर से तोप बना रहा युवा कलाकार, देशभर में बढ़ी मांगराजस्थान
15 सित॰ 2026, 8:22 pm (9 दिन पहले)· 1

करौली के लाल पत्थर से तोप बना रहा युवा कलाकार, देशभर में बढ़ी मांग

करौली के युवा कलाकार गजानंद सैनी अपने हाथों के हुनर से प्रसिद्ध लाल पत्थर पर नक्काशी कर प्राचीन शैली की तोपें तैयार कर रहे हैं। राजमहलों और हवेलियों की शोभा बढ़ाने वाली इन खूबसूरत तोपों की मांग राजस्थान के अलावा दूसरे राज्यों में भी तेजी से बढ़ रही है।

पूर्वी राजस्थान का करौली जिला अपने खूबसूरत लाल पत्थर की वजह से पूरे देश में एक खास पहचान रखता है। इसी प्रसिद्ध पत्थर को यहां के एक हुनरमंद युवा कलाकार ने अपनी कला के जरिए एक बिल्कुल नया रूप दे दिया है। करौली के रहने वाले गजानंद सैनी लाल पत्थर पर बेहतरीन नक्काशी करके प्राचीन राजशाही दौर की तोपें तैयार कर रहे हैं, जिन्हें देखकर हर किसी की नजरें उन पर टिक जाती हैं।

युद्ध के मैदान से निकलकर राजमहलों तक पहुंचा सफर

इतिहास के पन्नों में कभी युद्ध के मैदान में बारूद बरसाने वाली और तबाही मचाने वाली तोपें आज इस युवा कलाकार के हाथों से तराशकर राजमहलों, बड़ी हवेलियों और आलीशान इमारतों की शान बढ़ा रही हैं। गजानंद पिछले कई लंबे वर्षों से लाल पत्थर पर नक्काशी के इस बारीक काम से जुड़े हुए हैं। उन्होंने यह नायाब कला अपने पूर्वजों से विरासत में सीखी है और वक्त के साथ अपनी मेहनत से इस हुनर को और अधिक निखारा है।

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पत्थर को तोप का रूप देने की अनूठी कला

आमतौर पर जहां दूसरे कारीगर लाल पत्थर से पारंपरिक जालियां, आकर्षक मूर्तियां और अन्य सजावटी सामान बनाते हैं, वहीं गजानंद ने इसी सख्त पत्थर को प्राचीन तोप का आकार देने की अद्भुत कला विकसित की है। यही अनोखा काम उनकी पहचान बन गया है। गजानंद के मुताबिक पुराने समय में तोपें मुख्य रूप से विभिन्न धातुओं से बनाई जाती थीं, लेकिन वह उसी ऐतिहासिक तोप की आकृति को करौली के स्थानीय और देश भर में मशहूर लाल पत्थर पर बेहद खूबसूरती से उकेरते हैं।

मशीनों और हाथों की कला का मेल

इस तरह की कलाकृति तैयार करने की प्रक्रिया काफी मेहनत और समय मांगती है। इसके लिए पत्थर की शुरुआती कटाई और उसे भारी आकार देने के लिए मशीनों की मदद ली जाती है, जबकि तोप की बारीक डिजाइन और नक्काशी का सबसे महत्वपूर्ण काम पूरी तरह से हाथों से किया जाता है। गजानंद के अनुसार उनके हाथों से बनी लाल पत्थर की इन तोपों की डिमांड सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात समेत देश के कई अन्य राज्यों से भी खरीदार इन्हें मंगवाते हैं।

विशाल तोपों की कीमत और निर्माण का समय

करौली के ऐतिहासिक राजमहल समेत राजस्थान के कई अन्य शाही महलों और पुरानी इमारतों में गजानंद द्वारा तराशी गई लाल पत्थर की तोपों को सजाया गया है। गजानंद बताते हैं कि लाल पत्थर की एक विशाल तोप का जोड़ा तैयार करने में लगभग 30 दिन यानी पूरे एक महीने का समय लग जाता है। एक बड़ी तोप की कीमत करीब 60 हजार रुपए होती है, जबकि एक जोड़े की कुल कीमत लगभग 1.20 लाख रुपए तक रहती है।

हथियार से लेकर कला के बेजोड़ नमूने तक का सफर

गजानंद का कहना है कि अतीत के राजशाही दौर में जहां तोपों का इस्तेमाल युद्ध में दुश्मन पर गोले दागने के लिए होता था और वे धातु की बनी होती थीं, वहीं आज उनकी बनाई हुई तोपें युद्ध का साधन न होकर कला का एक बेहतरीन नमूना बन चुकी हैं। लाल पत्थर से बनी ये तोपें बड़ी इमारतों और महलों में सजावट के साथ-साथ पर्यटकों और आगंतुकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र बन रही हैं। कई जगहों पर लोग इनके साथ तस्वीरें खिंचवाते और फोटोशूट करवाते नजर आते हैं।

पारंपरिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं कलाकार

करौली की माटी से निकलने वाले लाल पत्थर को अपनी रचनात्मकता से नया आयाम देकर गजानंद न सिर्फ अपनी पुश्तैनी नक्काशी की परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं, बल्कि इसी हुनर को अपनी आजीविका का मजबूत जरिया बनाकर करौली का नाम पूरे देश में रोशन कर रहे हैं। तोपों के अलावा गजानंद मंदिरों के लिए नक्काशीदार जाली और झरोखे जैसी दर्जनों अलग-अलग प्रकार की विशेष वस्तुएं भी तैयार करते हैं।

सवाल-जवाब

करौली का कौन सा पत्थर देश भर में प्रसिद्ध है?
करौली का लाल पत्थर अपनी अलग पहचान और मजबूती के लिए देश भर में प्रसिद्ध है।
लाल पत्थर से तोप बनाने की कला किसने विकसित की है?
करौली के युवा कलाकार गजानंद सैनी ने लाल पत्थर पर नक्काशी कर तोप बनाने की कला विकसित की है।
लाल पत्थर की एक बड़ी तोप का जोड़ा तैयार करने में कितना समय लगता है?
लाल पत्थर की एक विशाल तोप का जोड़ा तैयार करने में करीब 30 दिन का समय लगता है।
लाल पत्थर से बनी तोप की कीमत कितनी होती है?
एक विशाल तोप की कीमत लगभग 60 हजार रुपए और एक जोड़े की कीमत करीब 1.20 लाख रुपए तक रहती है।
गजानंद सैनी की बनाई तोपों की मांग किन राज्यों में है?
इन तोपों की मांग राजस्थान के अलावा मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात सहित देश के कई अन्य हिस्सों में रहती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·9 दिन पहले

पारंपरिक शिल्पकला का आधुनिक सजावटी कला और अंतर-राज्यीय व्यापार में रूपांतरण क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक सकारात्मक संकेत है। करौली के लाल पत्थर की यह पहल दर्शाती है कि कैसे पीढ़ीगत विरासत को अभिनव प्रयोगों के ज़रिए एक लाभदायक कुटीर उद्योग में बदला जा सकता है। एशिया के कई विकासशील क्षेत्रों में सांस्कृतिक धरोहरों को बाजार की नई माँगों से जोड़कर स्थानीय रोजगार और कारीगरों की आय बढ़ाने का यह एक बेहतरीन मॉडल बन सकता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·9 दिन पहले

यह खबर दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक शिल्प और विरासत को सहेजकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति दी जा सकती है। गजानंद सैनी जैसे युवा कलाकारों का यह प्रयास पारंपरिक कला को नई पहचान दे रहा है, जिससे हस्तशिल्प क्षेत्र में रोजगार और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा मिलने की अपार संभावनाएं हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·9 दिन पहले

यह पारंपरिक हस्तशिल्प केवल कला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर सूक्ष्म अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का एक बेहतरीन माध्यम है। जब एक महीने की मेहनत से तैयार तोप का जोड़ा एक लाख बीस हजार रुपये तक बिकता है, तो यह दर्शाता है कि कैसे पारंपरिक हुनर को आधुनिक बाजार और मांग से जोड़कर कारीगर बेहतर आजीविका कमा सकते हैं। ऐसे स्वदेशी स्टार्टअप और कारीगरों को डिजिटल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स से जोड़कर इनकी पहुंच राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर बढ़ाई जा सकती है, जिससे सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण भी होगा और एमएसएमई सेक्टर को भी बल मिलेगा।

Rohan Verma@rohan-verma·9 दिन पहले

यह रिपोर्ट दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक कला को आधुनिक बाज़ार और सांस्कृतिक पर्यटन से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संबल मिल रहा है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों से मांग बढ़ना इस बात का संकेत है कि हेरिटेज सजावट और पारंपरिक वास्तुकला में हस्तशिल्प की स्वीकार्यता लगातार बढ़ रही है। यदि इस हुनर को क्लस्टर विकास और ऑनलाइन विपणन से जोड़ा जाए, तो न केवल स्थानीय कारीगरों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि क्षेत्रीय शिल्पकला को वैश्विक पहचान भी मिलेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·9 दिन पहले

रोहन वर्मा के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह देखना महत्वपूर्ण है कि करौली के इस लाल पत्थर के पारंपरिक शिल्प का संरक्षण और इसका व्यावसायिक विस्तार सांस्कृतिक धरोहर के प्रति बढ़ती उपभोक्ता रुचि को रेखांकित करता है। यद्यपि यह कला अब युद्ध के हथियारों के बजाय सौन्दर्य और सजावट का माध्यम बन चुकी है, लेकिन इस अनूठे हुनर को राष्ट्रीय स्तर पर मिल रही सराहना स्थानीय कारीगरों के लिए आर्थिक संबल का एक मजबूत जरिया बन रही है। इस प्रकार के पारंपरिक शिल्पों का संरक्षण न केवल हमारी ऐतिहासिक विरासत को जीवित रखता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कला बाजार के बीच एक सशक्त सेतु का काम भी करता है।

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