भाई-बहन के पवित्र प्रेम के प्रतीक पर्व रक्षाबंधन पर मिठाइयों का बाजार पूरी तरह से सज चुका है और इस दौरान बाजारों में रौनक देखते ही बनती है। सावन के महीने में त्योहारों के उल्लास को कई गुना बढ़ाने वाली सबसे खास मिठाई अगर कोई है, तो वह घेवर है। आजकल उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के बाजारों में घेवर की बंपर मांग दर्ज की जा रही है। शहर में वैसे तो कई मिठाइयों की दुकानें मौजूद हैं, लेकिन सहारनपुर चौक पर स्थित ऐतिहासिक गोयल स्वीट शॉप आजादी के दौर से पहले की अपनी साख और बरसात के मौसम में परोसे जाने वाले लजीज घेवर के लिए विशेष पहचान रखती है।
घेवर बनाने की जटिल प्रक्रिया और वैरायटी
दुकान के मालिक अरुण कुमार गोयल के अनुसार, घेवर अन्य सभी पारंपरिक मिठाइयों से काफी अलग श्रेणी में आता है क्योंकि इसे बनाने की तकनीक बेहद पेचीदा होती है। इस मिठाई को तैयार करने के लिए एक साथ कई भट्ठियों को जलाना पड़ता है और अनुभवी कारीगर की कड़ी मेहनत के बाद भी एक दिन में केवल 12 से 14 किलो मैदे का घेवर ही बन पाता है। यही वजह है कि त्योहार के सीजन के लिए इसका स्टॉक काफी पहले से तैयार करना पड़ता है। हवा में मौजूद नमी इस मिठाई की सबसे बड़ी दुश्मन है, इसलिए इसे खराब होने से बचाने के लिए पानी के जरिए खास पैकेजिंग में सुरक्षित रखा जाता है। इस दुकान पर देसी घी और वनस्पति घी दोनों विकल्पों के साथ सादे घेवर के अलावा ड्राईफ्रूट, मलाई और केसर घेवर की वैरायटी ग्राहकों को परोसी जाती है।
दशकों पुराना ग्राहकों का भरोसा और स्वाद
गोयल स्वीट्स के साथ स्थानीय लोगों का भावनात्मक और अटूट रिश्ता दशकों पुराना है। यहां के नियमित ग्राहक मुकेश गुप्ता का कहना है कि वे पिछले 30 सालों से लगातार इसी प्रतिष्ठान से अपनी पसंद की मिठाइयां खरीदते आ रहे हैं और यहां मिलने वाले केसर घेवर का स्वाद बेजोड़ है। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर वे अक्सर यहां से घेवर के साथ-साथ रसगुल्ले भी पैक करवाते हैं। पुराने और मंजे हुए कारीगरों के हाथों का जादू ही इस पारंपरिक दुकान की सबसे बड़ी खासियत है जो ग्राहकों को बार-बार यहां खींच लाता है।
घेवर का इतिहास और वर्तमान बाजार भाव
अरुण कुमार गोयल बताते हैं कि घेवर मूल रूप से राजस्थान की संस्कृति से ताल्लुक रखता है, लेकिन समय के साथ यह पूरे देश में बड़े चाव से खाया जाने लगा है। सदियों से ब्रज और उसके आसपास के इलाकों में यह परंपरा चली आ रही है कि रक्षाबंधन के दिन बहनें अपने मायके से घेवर लेकर ही भाई के घर पहुंचती हैं। इस पारंपरिक मिठाई के बिना रक्षाबंधन का त्योहार अधूरा सा माना जाता है, यही कारण है कि सावन के महीने में इसकी मांग अपने चरम पर होती है। देहरादून के बाजारों में इस समय फीका घेवर, सादा मीठा घेवर, ड्राई फ्रूट्स घेवर और मलाईदार घेवर मुख्य रूप से बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। इसकी कीमतें पूरी तरह से इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर निर्भर करती हैं जहां साधारण घेवर किफायती दामों पर मिल जाता है, वहीं बादाम, पिस्ता और मावे से सजे हुए रिच घेवर की मांग सबसे ज्यादा है जो बाजार में 600 से 800 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिक रहा है।



















