भारतीय रक्षा बेड़े को और अधिक ताकतवर बनाने के लिए एक नया और आधुनिक ऑल-टेरेन व्हीकल तैयार किया जा रहा है, जिसे बीवीएस 10 सिंधु नाम दिया गया है। यह खास वाहन दो अलग-अलग हिस्सों को आपस में जोड़कर बनाया गया है और इसके दोनों ही हिस्से मजबूत रबर ट्रैक्स के सहारे आगे बढ़ते हैं। इस अनोखी बनावट की वजह से यह गाड़ी बिना किसी रुकावट के सबसे कठिन रास्तों और दुर्गम सतहों पर भी आसानी से सफर तय कर सकती है। इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि बेहद खड़ी चढ़ाई और तीखे मोड़ों पर भी इसका संतुलन नहीं बिगड़ता है।
इस वाहन की बनावट में सामरिक जरूरतों का पूरा ध्यान रखा गया है। इसके आगे वाले केबिन में ड्राइवर और कमांडर बैठते हैं, जबकि पिछले हिस्से में हथियारों से लैस सैनिकों के बैठने की पूरी व्यवस्था होती है। पिछले केबिन में जवानों की सुविधा और आपातकालीन जरूरतों के लिए विशेष सीटें और मेडिकल किट भी उपलब्ध कराई गई हैं। यह मशीन गहरे कीचड़, बर्फीली सतहों, रेत और दलदली इलाकों में एक समान रफ्तार से आगे बढ़ने में पूरी तरह सक्षम है।
सेना इस अत्याधुनिक वाहन को लद्दाख के करीब 18 हजार फीट की अत्यधिक ऊंचाई वाले पहाड़ी इलाकों में तैनात करने की योजना बना रही है। पूर्वी लद्दाख में सर्दियों के मौसम में पारा लुढ़ककर माइनस 55 डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाता है। ऐसे खतरनाक मौसम और भारी बर्फबारी के बीच पारंपरिक पहियों वाले वाहन अक्सर ठप पड़ जाते हैं।
बीवीएस 10 सिंधु को खासतौर पर इन्हीं बर्फीले हालात और कठिन भौगोलिक चुनौतियों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। यह वाहन कड़ाके की ठंड के बीच भी सैनिकों को तेजी के साथ एक अग्रिम चौकी से दूसरी चौकी तक सुरक्षित पहुंचाने का काम करेगा। इसके अलावा, जरूरत पड़ने पर यह दुर्गम बर्फीले क्षेत्रों में भारी मात्रा में हथियार और जरूरी रसद सामग्री की सप्लाई भी आसानी से कर सकेगा।
पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान से लगी सीमा के पास इस वाहन की तैनाती गुजरात के कच्छ क्षेत्र में की जाएगी। कच्छ का पूरा इलाका अपने विशाल दलदली मैदानों, नमक की भूमि और रेतीले धोरों के लिए देश भर में जाना जाता है। साल के सबसे गर्म महीनों में इस इलाके का तापमान बढ़कर 55 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। ऐसे चिलचिलाती गर्मी और फिसलन भरे दलदल के बीच गश्त लगाना सुरक्षा बलों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती साबित होता है।
यह नया ऑल-टेरेन व्हीकल 55 डिग्री के उच्च तापमान में भी बिना किसी तकनीकी रुकावट के लगातार गश्त लगाने की क्षमता रखता है। यह दलदली जमीन और उथले पानी वाले क्षेत्रों से भी बेहद आसानी से बाहर निकल आता है। इसकी मदद से सीमा पर होने वाली हर संदिग्ध गतिविधि पर पैनी नजर रखना और भी ज्यादा आसान हो जाएगा।
सूरत के हजीरा में इस वाहन का निर्माण कार्य शुरू होना देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र के लिए एक बेहद सकारात्मक संकेत है। लार्सन एंड टुब्रो और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय रक्षा कंपनी बीएई सिस्टम्स का यह संयुक्त प्रयास देश में डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को और गति देगा। दुनिया भर के कई संघर्षों में अपनी उपयोगिता साबित कर चुका यह प्लेटफॉर्म भारत में ही तैयार होने से भविष्य की अन्य रक्षा जरूरतों के द्वार भी खोलेगा।
भारतीय सेना को मिलने वाले इन कुल 18 वाहनों को दो बिल्कुल अलग और विपरीत मोर्चों पर तैनात किया जाएगा। एक तरफ जहां माइनस 55 डिग्री तापमान वाला बर्फीला लद्दाख होगा, तो दूसरी तरफ 55 डिग्री तापमान वाला झुलसा देने वाला कच्छ का रेगिस्तान होगा। यह आधुनिक तकनीक हमारे सैनिकों की आवाजाही को अभूतपूर्व रफ्तार और मजबूती प्रदान करेगी।




















