राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के भीतर संगठनात्मक नियुक्तियों को लेकर जारी आंतरिक कलह अब खुलकर सामने आ गई है। पार्टी के शीर्ष स्तर पर हाल में किए गए बड़े बदलावों के चलते असंतोष का माहौल बन गया है। विशेष रूप से जीशान सिद्दीकी को मुंबई एनसीपी का अध्यक्ष नियुक्त किए जाने और उमेश पाटिल को नया मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाए जाने के निर्णयों पर पार्टी के भीतर ही गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इन नियुक्तियों की प्रक्रिया और उनकी वैधता को लेकर वरिष्ठ नेताओं तथा मौजूदा पदाधिकारियों ने नेतृत्व की कार्यशैली पर आपत्ति दर्ज कराई है।
मुंबई अध्यक्ष पद पर जीशान सिद्दीकी का चयन और प्रफुल्ल पटेल का बयान
पार्टी की मुंबई इकाई में फेरबदल करते हुए जीशान सिद्दीकी को मुंबई एनसीपी के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस निर्णय के तुरंत बाद वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल की ओर से सोशल मीडिया पर साझा की गई एक टिप्पणी ने इस विवाद को चर्चा के केंद्र में ला दिया। हालांकि पटेल ने अपने वक्तव्य में किसी व्यक्ति विशेष का नाम लेने से परहेज किया, परंतु उनके संदेश के समय और विषयवस्तु को देखते हुए इसे मुंबई अध्यक्ष पद पर हुई नई तैनाती के संदर्भ में एक अप्रत्यक्ष आपत्ति माना गया।
महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव के हाल ही में आए नतीजों की पृष्ठभूमि में प्रफुल्ल पटेल ने पार्टी को आत्ममंथन करने का सुझाव दिया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि पार्टी को अपने वर्तमान संगठनात्मक ढांचे में जरूरी फेरबदल करने की आवश्यकता है, ताकि आम जनता का विश्वास पुन: हासिल किया जा सके। पटेल का यह बयान पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच व्यापक चर्चा का विषय बन गया, जिससे यह संकेत मिला कि शीर्ष नेतृत्व के फैसलों पर पार्टी के भीतर आम सहमति नहीं बन पा रही है।
मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता पद को लेकर उठे विधिक और संवैधानिक सवाल
जीशान सिद्दीकी की नियुक्ति को लेकर चल रही बहस के बीच उमेश पाटिल को पार्टी का नया मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता नियुक्त किए जाने से असंतोष की दूसरी लहर आ गई। सुनेत्रा पवार की ओर से जारी एक नियुक्ति पत्र के जरिए उमेश पाटिल को यह नई जिम्मेदारी प्रदान की गई थी। इस फैसले के खिलाफ पार्टी के मौजूदा मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता और राष्ट्रीय महासचिव बृजमोहन श्रीवास्तव ने मोर्चा खोल दिया। उन्होंने 28 अक्टूबर को एक आधिकारिक प्रेस नोट जारी कर इस कदम की वैधानिकता पर सीधे तौर पर सवाल उठाए।
बृजमोहन श्रीवास्तव ने सुनेत्रा पवार द्वारा जारी नियुक्ति पत्र को असंवैधानिक और अमान्य घोषित किया। उनका तर्क था कि पार्टी के संविधान में निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी करके किसी भी निर्वाचित या नियुक्त अधिकारी को पद से हटाया या बदला नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय समिति की पूर्व अनुमति और औपचारिक मंजूरी के बिना लिया गया ऐसा कोई भी निर्णय पार्टी के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन करता है।
राष्ट्रीय अधिवेशन के प्रस्ताव, 2028 तक के कार्यकाल और चुनाव आयोग का संदर्भ
बृजमोहन श्रीवास्तव ने अपने दावे की पुष्टि के लिए पार्टी के सांगठनिक इतिहास का हवाला दिया। उन्होंने जानकारी दी कि 30 नवंबर 2023 को आयोजित पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में उनके नाम का प्रस्ताव रखा गया था, जिसे सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से पारित किया था। इस अधिवेशन में स्वीकृत प्रस्तावों के मुताबिक, मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता के तौर पर उनका आधिकारिक कार्यकाल 30 नवंबर 2028 तक मान्य है।
श्रीवास्तव ने आगे कहा कि पार्टी संविधान में तय प्रक्रियाओं का पालन किए बिना किसी पदाधिकारी को हटाना संभव नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने भारत के चुनाव आयोग से जुड़े पत्राचार और दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए बताया कि निर्वाचन और उससे जुड़े विधिक कागजात की स्थिति फिलहाल पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है। इस परिस्थिति को देखते हुए उन्होंने सुनेत्रा पवार से मांग की है कि वह उमेश पाटिल से संबंधित विवादित नियुक्ति पत्र को तत्काल प्रभाव से वापस लें और पार्टी संविधान में दी गई व्यवस्था के अनुरूप ही कोई निर्णय लें।
नेतृत्व की कार्यशैली और संगठन के भविष्य पर असर
लगातार दो महत्वपूर्ण पदों पर हुई नियुक्तियों से पैदा हुए इस गतिरोध ने एनसीपी की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ जहां प्रफुल्ल पटेल जैसे अनुभवी नेता पार्टी के प्रदर्शन की समीक्षा और सांगठनिक सुधारों की आवश्यकता पर बल दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बृजमोहन श्रीवास्तव ने संवैधानिक नियमों की दुहाई देकर फैसलों पर रोक लगाने की मांग की है।
पार्टी में उभरे इन दो अलग-अलग विवादों से यह स्पष्ट हो गया है कि शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्थाओं और क्षेत्रीय पदाधिकारियों के बीच संवादहीनता या असहमति की स्थिति बनी हुई है। आने वाले समय में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस अंदरूनी कलह को शांत करने के लिए क्या कदम उठाता है, और क्या सुनेत्रा पवार द्वारा लिए गए फैसलों की समीक्षा की जाती है, इस पर राजनीतिक विश्लेषकों की कड़ी नजर बनी रहेगी।


















