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लाहौल-स्पीति में घेपन ग्लेशियल झील का मुआयना करने 14 किमी पैदल पहुंचीं डीसी, सैलाब के खतरे पर अलर्टहिमाचल प्रदेश
23 सित॰ 2026, 3:51 pm (44 दिन पहले)· 1

लाहौल-स्पीति में घेपन ग्लेशियल झील का मुआयना करने 14 किमी पैदल पहुंचीं डीसी, सैलाब के खतरे पर अलर्ट

लाहौल-स्पीति में 4,070 मीटर ऊंची घेपन झील का जलस्तर बढ़ने से प्रशासन सतर्क हो गया है। उपायुक्त किरण भड़ाना ने 14 किलोमीटर पैदल चढ़ाई कर स्थिति का निरीक्षण किया और चेतावनी दी कि झील फटने पर पानी 5 मिनट में बस्तियों तक पहुंच सकता है।

हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिले लाहौल-स्पीति में अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित हिमनद झीलों की संवेदनशीलता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन ने व्यापक स्तर पर सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है। समुद्र तल से 4,070 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद घेपन ग्लेशियल झील में पानी की बढ़ती मात्रा ने संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की आशंका को गहरा कर दिया है। इसी खतरे की जमीनी हकीकत परखने के लिए जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) की अध्यक्ष एवं उपायुक्त किरण भड़ाना ने खुद दुर्गम रास्तों पर 14 किलोमीटर की सीधी और कठिन पैदल चढ़ाई पूरी की और झील के मुहाने पर पहुंचकर वर्तमान परिस्थितियों की गहन समीक्षा की।

10 विभागों के 15 अधिकारियों के दल ने परखे जमीनी हालात

इस जोखिम भरे निरीक्षण अभियान में उपायुक्त के साथ 10 अलग-अलग प्रशासनिक एवं तकनीकी विभागों से जुड़े 15 अधिकारियों और कर्मचारियों का एक संयुक्त दल मौके पर पहुंचा। इस तकनीकी दल ने झील के मौजूदा जलस्तर, उसके चारों ओर मौजूद चट्टानी संरचना, मिट्टी की स्थिरता और यदि पानी का रिसाव या तटबंध टूटन होती है तो संभावित बहाव मार्ग क्या रहेगा, इसका बारीकी से अध्ययन किया। मौके पर ही इस बात पर भी तकनीकी विमर्श हुआ कि झील के बढ़ते दबाव को नियंत्रित करने के लिए पानी की निकासी के क्या उपाय हो सकते हैं। इलाका बेहद बीहड़ और खतरनाक होने के चलते तकनीकी टीम ने रात का ठहराव बेस कैंप में किया, जबकि उपायुक्त उसी दिन अपना मुआयना समाप्त कर नीचे लौट आईं। बाकी दल अगले दिन बुधवार दोपहर बाद जिला मुख्यालय केलांग सुरक्षित वापस पहुंचा।

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चंद मिनटों में बस्तियों तक तबाही का पानी पहुंचने का अंदेशा

निरीक्षण के बाद उपायुक्त किरण भड़ाना ने वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि घेपन झील के ऊपरी और नजदीकी हिस्सों में कई बड़े ग्लेशियर और खड़े पहाड़ मौजूद हैं। नेपाल में हाल ही में ग्लेशियर टूटने की वजह से आई विनाशकारी आपदा ने यह साबित कर दिया है कि इन ग्लेशियरों की स्थिरता पर लगातार नजर रखना कितना आवश्यक है। प्रारंभिक वैज्ञानिक अनुमानों में यह माना गया था कि झील का किनारा टूटने की स्थिति में बहाव को आबादी वाले इलाकों तक पहुंचने में लगभग 22 मिनट का वक्त लगेगा। इसके विपरीत, व्यावहारिक और भौगोलिक ढलान को देखते हुए यह सैलाब 5 मिनट के भीतर ही नीचे बसी बस्तियों में तबाही मचा सकता है। ऐसे नाजुक हालात में रिहायशी इलाकों की सुरक्षा के लिए मजबूत निकासी व्यवस्था, नियमित मॉक ड्रिल और स्थानीय लोगों को जागरूक करने की मुहिम तुरंत शुरू की जानी है। इसके लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के साथ मिलकर विस्तृत योजना तैयार की जा रही है।

सी-डैक प्रणाली और प्रारंभिक चेतावनी तंत्र की स्थापना पर जोर

संभावित प्राकृतिक आपदा से जान-माल के नुकसान को न्यूनतम करने के लिए प्रशासन घेपन झील में अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में तेजी से कदम उठा रहा है। सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग (सी-डैक) तिरुवनंतपुरम द्वारा तैयार किए गए इस चेतावनी तंत्र का पूर्व में सिस्सु झील में सफल परीक्षण किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के विशेषज्ञ भी इस झील की भौगोलिक जटिलताओं का विस्तृत अध्ययन कर चुके हैं। उपायुक्त के अनुसार हिमालय के इन दुर्गम और तेजी से बदलते भौगोलिक परिवेश में निरंतर तकनीकी निगरानी, पूर्व तैयारी और सभी विभागों का साझा तालमेल ही किसी बड़े खतरे से बचने का सबसे प्रभावी उपाय है।

सवाल-जवाब

घेपन ग्लेशियल झील किस जिले में और कितनी ऊंचाई पर स्थित है?
घेपन झील हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में समुद्र तल से 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
उपायुक्त किरण भड़ाना ने झील तक पहुंचने के लिए कितनी दूरी पैदल तय की?
उपायुक्त किरण भड़ाना ने झील की स्थिति का जायजा लेने के लिए 14 किलोमीटर की कठिन पैदल चढ़ाई पूरी की।
निरीक्षण दल में कितने विभागों के अधिकारी शामिल थे?
इस निरीक्षण अभियान में 10 अलग-अलग विभागों के 15 अधिकारी और कर्मचारी शामिल हुए थे।
झील टूटने की स्थिति में पानी को आबादी तक पहुंचने में कितना समय लग सकता है?
प्रारंभिक आकलन में 22 मिनट का अनुमान लगाया गया था, लेकिन व्यावहारिक तौर पर पानी मात्र 5 मिनट के भीतर आबादी तक पहुंच सकता है।
झील में किस तकनीकी संस्थान द्वारा विकसित अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जा रहा है?
सी-डैक तिरुवनंतपुरम द्वारा विकसित अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जा रहा है, जिसका सिस्सु झील में पहले ही परीक्षण हो चुका है।
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टिप्पणियाँ 5

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·43 दिन पहले

ऐसी जगहों पर पैदल चलना और वो भी इतनी ठंड और ऊंचाई पर, मज़ाक नहीं है। मुझे लेबनान के पहाड़ों में अपनी एक ऐसी ही चढ़ाई याद आ गई, जहाँ हर कदम पर सांस फूलती थी। डीसी साहिबा ने खुद जाकर हालात देखे, यह देखकर अच्छा लगा, वरना कुर्सियों पर बैठकर तो सब ठीक ही लगता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·43 दिन पहले

किरण भड़ाना का खुद 14 किलोमीटर पैदल चलकर उस ऊंचाई पर जाना वाकई बड़ी बात है। जब मैं पिछली बार मनाली और रोहतांग के पास गया था, तो वहां सांस लेना ही इतना भारी लगता है कि बिना काम के एक कदम चलना मुश्किल हो जाता है। भगवान करे वहां के लोगों पर कोई आफत न आए।

Ravikash Gupta@ravikash·43 दिन पहले

अर्जुन, आपकी बात सही है, वहां चलना वाकई बहुत मुश्किल है। पर क्या प्रशासन के पास वाकई कोई ऐसा सिस्टम है जो 5 मिनट पहले भी लोगों को चेतावनी दे सके?

Karan Malhotra@karan-malhotra·44 दिन पहले

डीसी मैडम ने खुद 14 किलोमीटर पैदल चलकर जो हिम्मत दिखाई है, वो वाकई बड़ी बात है। ऐसे दुर्गम रास्तों पर जाकर खुद हालात देखना हर कोई नहीं करता। पर मेरा सवाल ये है कि जब पहले ही पता था कि झील खतरनाक हो सकती है, तो फिर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने में इतनी देर क्यों हो गई? क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार हो रहा था?

Rohan Verma@rohan-verma·44 दिन पहले

करण भाई, डीसी की मेहनत की दाद देनी पड़ेगी, लेकिन 14 किमी पैदल चलना कोई लापरवाही का विकल्प नहीं है। चेतावनी मिलने के बाद सिस्टम लगाने में इतनी देर क्यों हुई, ये बड़ा सवाल है।

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