15 अगस्त को दिल्ली स्थित लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने भारतीय कृषि क्षेत्र और किसानों के कल्याण से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें सामने रखीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के अन्नदाताओं की खेती की लागत को न्यूनतम बनाए रखने के लिए सरकार उर्वरक की कीमतों पर भारी वित्तीय बोझ खुद वहन करती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उर्वरक के दाम आसमान छूने के बावजूद भारतीय किसानों को यूरिया और डीएपी जैसी जरूरी खाद बेहद सस्ती दरों पर उपलब्ध कराई जाती है। सरकार का प्राथमिक उद्देश्य खेती को अधिक व्यावहारिक, सुलभ और किफायती बनाना है ताकि किसानों की कुल आय में सुधार लाया जा सके।
उर्वरक की वास्तविक कीमत और सब्सिडी का गणित
संबोधन के दौरान प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, बाजार में यूरिया के एक बोरे का वास्तविक क्रय मूल्य लगभग 3,000 रुपये बैठता है। हालांकि, देश के किसानों को यह बोरा महज 300 रुपये की रियायती कीमत पर प्रदान किया जा रहा है। इस हिसाब से देखें तो सरकार प्रति बोरी यूरिया पर करीब 90 फीसदी की सीधी सब्सिडी दे रही है। यह अंतर दिखाता है कि वैश्विक बाजार से उर्वरक आयात करने में देश के खजाने पर कितना बड़ा आर्थिक दबाव पड़ता है। यूरिया के अलावा डाई अमोनियम फॉस्फेट यानी डीएपी के मामले में भी यही राहत दी जा रही है। वैश्विक स्तर पर डीएपी का भाव 5,000 रुपये प्रति बोरी तक पहुंच चुका है, परंतु भारतीय किसानों के लिए इसका विक्रय मूल्य 1,350 रुपये प्रति बोरी निर्धारित किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय युद्ध और जून के सरकारी आंकड़े
वैश्विक घटनाक्रमों का प्रभाव सीधे तौर पर खाद्य एवं उर्वरक बाजार पर दिखाई दिया है। अमेरिका और ईरान के बीच पैदा हुए तनाव व युद्ध जैसी स्थिति के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति शृंखला बाधित हुई और कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया गया। जून में जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय दरों में वृद्धि के कारण यूरिया पर दी जाने वाली प्रति बोरी सब्सिडी 2,900 रुपये से बढ़कर 4,500 रुपये के स्तर तक पहुंच गई। वर्तमान समय में घरेलू बाजार के भीतर किसानों को यूरिया का बोरा 245 रुपये से लेकर 300 रुपये के भाव पर उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय महंगाई का झटका महसूस न हो।
बजटीय आवंटन और 3.4 लाख करोड़ की मांग
ग्लोबल मार्केट में खाद के दाम लगातार ऊंचे रहने से सरकार का सब्सिडी बजट अनुमान से काफी आगे निकल गया है। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने चालू वित्त वर्ष के लिए वित्त मंत्रालय से लगभग 3.4 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी राशि की मांग की है। यह आंकड़ा शुरुआती बजटीय अनुमान से लगभग दो गुना है, क्योंकि मूल बजट में उर्वरक सब्सिडी के लिए केवल 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य देश के भीतर उर्वरक उत्पादन क्षमताओं का विस्तार करना है ताकि विदेशों से होने वाले महंगे आयात पर निर्भरता कम की जा सके, हालांकि फिलहाल सब्सिडी भुगतान का वित्तीय भार लगातार बढ़ता जा रहा है।
वर्ष 2026 खारीफ सीजन और बफर स्टॉक की स्थिति
कृषि विभाग के अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2026 के खरीफ सीजन के लिए देश में लगभग 390 लाख टन उर्वरक की आवश्यकता होगी। आपूर्ति व्यवस्था को सुचारू बनाए रखने के लिए सरकार आमतौर पर 33 फीसदी का बफर स्टॉक बनाकर रखती है। वर्तमान में सरकारी गोदामों में आवश्यकता का लगभग 51 फीसदी स्टॉक उपलब्ध है, जिससे किसी भी तरह की किल्लत की संभावना समाप्त हो जाती है। अधिकारियों का आश्वासन है कि बुवाई सीजन के दौरान किसानों को खाद की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान सरकार ने कुल 2.17 लाख करोड़ रुपये की उर्वरक सब्सिडी जारी की थी। भारत में प्रतिवर्ष औसतन 6.77 करोड़ टन कुल उर्वरक की खपत होती है, जिसमें अकेले यूरिया की हिस्सेदारी 4 करोड़ टन की है।



















