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लाल सागर के मुहाने पर हूती लड़ाकों के बढ़ते कदम से भारतीय कारोबार और ऊर्जा रास्तों पर मंडराया संकटभारत
21 सित॰ 2026, 4:40 pm (37 दिन पहले)· 2

लाल सागर के मुहाने पर हूती लड़ाकों के बढ़ते कदम से भारतीय कारोबार और ऊर्जा रास्तों पर मंडराया संकट

बाब-अल-मंदेब के रणनीतिक ठिकानों पर हूती नियंत्रण से भारत के 200 अरब डॉलर के विदेशी व्यापार, तेल आयात और 20 हजार से अधिक नाविकों की सुरक्षा पर गंभीर जोखिम पैदा हो गया है.

अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से सबसे नाजुक समुद्री गलियारों में शुमार बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते तनाव ने भारतीय अर्थव्यवस्था और कूटनीति के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. यमन के लाल सागर तटीय हिस्से में अंसारल्लाह यानी हूती विद्रोहियों के पैर पसारने से उस समुद्री हाईवे पर संकट गहरा गया है, जहां से भारत का पश्चिमी दुनिया के साथ होने वाला विशाल व्यापार गुजरता है. अरब सागर को लाल सागर और आगे स्वेज नहर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता न केवल कच्चे तेल और गैस के आयात का प्रमुख साधन है, बल्कि यूरोप, उत्तरी अमेरिका और उत्तरी अफ्रीका के बाजारों तक भारतीय सामान पहुंचाने की जीवनरेखा भी है. रणनीतिक आकलन के अनुसार, इस संकरे जलमार्ग के आसपास हूतियों की मजबूत होती पकड़ भारत के व्यापारिक हितों, ऊर्जा आपूर्ति की लागत और समुद्र में तैनात हजारों भारतीय नागरिकों की जान के लिए एक नई और गंभीर चुनौती बन चुकी है.

रणनीतिक द्वीपों और बंदरगाहों पर नियंत्रण का खेल

यमन के तटवर्ती इलाकों में हूती लड़ाकों की ताजा गतिविधियों ने सामरिक समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है. हूतियों ने लाल सागर तट पर स्थित रणनीतिक महत्व के मोखा बंदरगाह पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है. इसके साथ ही वे बाब-अल-मंदेब के मुहाने पर स्थित महत्वपूर्ण ठिकानों और पेरिम द्वीप जैसे रणनीतिक भूभागों की तरफ भी तेजी से आगे बढ़े हैं. पेरिम द्वीप की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वहां से गुजरने वाले किसी भी व्यापारिक जहाज पर सीधी निगरानी और नियंत्रण रखा जा सकता है. इस क्षेत्र में हूतियों की सैन्य और सामरिक बढ़त का सीधा अर्थ यह है कि लाल सागर के प्रवेश द्वार से होने वाली हर तरह की अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी अब उनके सीधे निशाने पर आ सकती है. जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही बाधित होने का जोखिम लगातार बढ़ रहा है, जिससे वैश्विक व्यापार के साथ-साथ भारत के समुद्री सुरक्षा परिदृश्य पर दबाव कई गुना बढ़ गया है.

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200 अरब डॉलर के भारतीय व्यापार पर सीधा असर

भारत के लिए बाब-अल-मंदेब का गलियारा महज एक सामान्य समुद्री रास्ता नहीं है. यूरोप, अमेरिका और उत्तरी अफ्रीकी देशों के साथ भारत का सालाना 200 अरब डॉलर से अधिक का आयात-निर्यात इसी जलमार्ग के जरिए होता है. यदि इस संकरे मार्ग पर जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक असुरक्षित बनी रहती है, तो मालवाहक जहाजों के पास लाल सागर को छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. ऐसी स्थिति में मालवाहक जहाजों को पूरे अफ्रीकी महाद्वीप का चक्कर लगाकर, यानी दक्षिणी छोर पर स्थित केप ऑफ गुड होप के लंबे रास्ते से यात्रा करनी पड़ेगी. यह वैकल्पिक समुद्री रास्ता जहाजों के सफर में 10 से 14 दिन का अतिरिक्त समय जोड़ देता है. यात्रा का समय बढ़ने का सीधा असर जहाजों के ईंधन खर्च, जहाजरानी भाड़े और समुद्री बीमा प्रीमियम पर पड़ता है, जिससे भारत आने वाले और यहां से निर्यात होने वाले हर सामान की ढुलाई लागत में तेज उछाल आ सकता है.

जहाजों की घटती संख्या और आपूर्ति व्यवस्था पर बोझ

लाल सागर के मुहाने पर मंडराता यह खतरा अब केवल कागजी आशंका तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्री रास्तों पर इसका व्यावहारिक असर साफ दिखने लगा है. हूती लड़ाकों द्वारा लगातार किए जा रहे हमलों और आक्रामक हरकतों के चलते बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों के ट्रैफिक में तेज गिरावट दर्ज की गई है. आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर के महीने में एक ही दिन के भीतर इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की दैनिक संख्या 30 से घटकर मात्र 15 रह गई थी. इस गिरावट का शिकार केवल सामान्य कंटेनर ही नहीं हुए, बल्कि कच्चा तेल, इस्पात और खाद्यान्न जैसी अत्यंत आवश्यक वस्तुएं ले जा रहे पोत भी इस रास्ते से कतराने लगे हैं. जब जहाजों को लंबा मार्ग तय करना पड़ता है, तो जहाजरानी कंपनियों का संचालन खर्च तेजी से बढ़ता है, जिसका अंतिम बोझ उपभोक्ता वस्तुओं और ऊर्जा उत्पादों की कीमतों के रूप में आम नागरिकों और विनिर्माताओं पर पड़ता है.

कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति में बढ़ती अनिश्चितता

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए भारी मात्रा में पेट्रोलियम और गैस आयात पर निर्भर है. हालांकि बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच भारतीय जहाजों के लिए बाब-अल-मंदेब का मार्ग अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है और परिचालन जारी है, लेकिन इस गलियारे का असुरक्षित होना भारत के ऊर्जा तंत्र को बेहद खर्चीला और अनिश्चित बना सकता है. केवल भारत ही नहीं, बल्कि समूचे क्षेत्र के ऊर्जा निर्यात तंत्र पर इसका गहरा दबाव पड़ रहा है. सऊदी अरब को अपने वैकल्पिक पाइपलाइन और बंदरगाह बुनियादी ढांचे में रुकावटों का सामना करना पड़ा है. मोखा बंदरगाह के आसपास हूतियों का बढ़ता दबदबा सऊदी अरब के लाल सागर स्थित तेल निर्यात मार्गों को कमजोर बना सकता है. विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि इसका मतलब पूरे क्षेत्र से तेल निर्यात का अचानक ठप होना नहीं है, लेकिन भारत के सामने तात्कालिक संकट आपूर्ति रुकने का नहीं, बल्कि ढुलाई महंगी होने, वैकल्पिक रास्तों के सीमित होने और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ने का है.

20 हजार से ज्यादा भारतीय नाविकों की जान पर मंडराता खतरा

इस पूरे भू-राजनीतिक संकट का एक अत्यंत मानवीय और संवेदनशील पहलू भारतीय नाविकों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है. लाल सागर और अदन की खाड़ी से होकर गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक जहाजों पर 20 हजार से अधिक भारतीय नाविक अपनी सेवाएं दे रहे हैं. नेशनल यूनियन ऑफ सीफेरर्स ऑफ इंडिया ने भी वर्ष की शुरुआत में इसी आंकड़े का हवाला देते हुए समुद्री संघर्ष क्षेत्र में काम कर रहे भारतीय चालक दलों की जान पर गंभीर चिंता जताई थी. हाल के महीनों में भारतीय चालक दल वाले जहाजों अथवा भारत आने-जाने वाले पोतों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने इस खतरे को हकीकत में तब्दील कर दिया है. यदि जहाजों पर हमले ऐसे ही जारी रहे तो जहाजरानी उद्योग के लिए कुशल कर्मियों का मिलना मुश्किल होगा, समुद्री बीमा कंपनियां जोखिम प्रीमियम आसमान पर पहुंचा देंगी और भारत के आयात-निर्यात चक्र की नियमितता पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाएगी.

दोहरे दबाव में फंसा अरब प्रायद्वीप का समुद्री दायरा

बाब-अल-मंदेब में बिगड़े हालात का रणनीतिक प्रभाव केवल लाल सागर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे अरब प्रायद्वीप की सुरक्षा को दोतरफा घेरता नजर आ रहा है. फारस की खाड़ी के मुहाने पर स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य में पहले से ही ईरान का गहरा रणनीतिक प्रभाव और नियंत्रण मौजूद है. अब अरब प्रायद्वीप के दूसरी तरफ बाब-अल-मंदेब में हूतियों की मजबूत पकड़ ने एक साथ दो अत्यंत महत्वपूर्ण चोकपॉइंट्स पर दबाव की स्थिति पैदा कर दी है. विश्व के दो सबसे संवेदनशील समुद्री रास्तों पर एक साथ अस्थिरता पैदा होने से वैश्विक व्यापार व्यवस्था चरमरा सकती है. इस नए सामरिक दबाव के बीच भारत के लिए अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित बनाए रखना, अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर जहाजरानी की स्वतंत्रता की वकालत करना और समुद्र में सेवारत अपने हजारों नागरिकों का जीवन सुरक्षित रखना कूटनीतिक और नौसैनिक स्तर पर एक बहुत बड़ी परीक्षा बन गया है.

सवाल-जवाब

बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
यह संकरा समुद्री रास्ता अरब सागर को लाल सागर और स्वेज नहर से जोड़ता है, जहां से भारत का यूरोप, अमेरिका और उत्तरी अफ्रीका के साथ 200 अरब डॉलर से अधिक का वार्षिक व्यापार और भारी ऊर्जा आयात गुजरता है.
हूती विद्रोहियों ने यमन के किन प्रमुख ठिकानों पर कब्जा किया है?
हूती लड़ाकों ने लाल सागर तट पर स्थित रणनीतिक मोखा बंदरगाह पर नियंत्रण कर लिया है और बाब-अल-मंदेब के पास स्थित रणनीतिक पेरिम द्वीप की दिशा में आगे बढ़े हैं.
लाल सागर का रास्ता बंद होने पर जहाजों को कौन सा वैकल्पिक रास्ता लेना पड़ता है?
जहाजों को पूरे अफ्रीका महाद्वीप का चक्कर लगाकर दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप (आशांतरीप) के लंबे समुद्री रास्ते से गुजरना पड़ता है.
वैकल्पिक रास्ते से माल ढुलाई पर क्या असर पड़ता है?
केप ऑफ गुड होप के रास्ते जाने से समुद्री यात्रा में 10 से 14 दिन का अतिरिक्त समय लगता है, जिससे ईंधन खर्च, जहाजरानी भाड़ा और समुद्री बीमा प्रीमियम काफी बढ़ जाता है.
बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में कितनी गिरावट आई है?
सितंबर के दौरान एक ही दिन में इस जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों की संख्या 30 से घटकर मात्र 15 रह गई थी, जिनमें तेल और जरूरी सामान ले जा रहे जहाज शामिल थे.
इस संकट से कितने भारतीय नाविकों की सुरक्षा प्रभावित हो रही है?
लाल सागर और अदन की खाड़ी से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक जहाजों पर 20 हजार से ज्यादा भारतीय नाविक काम कर रहे हैं, जिनकी सुरक्षा को लेकर नाविक संगठनों ने गंभीर चिंता जताई है.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Amit Patel@amit-patel·37 दिन पहले

बाब-अल-मंदेब में हूतियों की बढ़ती पकड़ केवल भू-राजनीतिक उथल-पुथल नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारतीय कॉर्पोरेट जगत के मार्जिन और ऊर्जा सुरक्षा पर एक बड़ा वित्तीय हमला है। यदि जहाज केप ऑफ गुड होप के लंबे रास्ते से जाने को मजबूर होते हैं, तो न केवल ढुलाई लागत और बीमा प्रीमियम आसमान छूएँगे, बल्कि मुद्रास्फीति का दबाव भारतीय अर्थव्यवस्था के कोर सेक्टर तक पहुँच जाएगा। आने वाले दिनों में आपूर्ति श्रृंखला में यह व्यवधान विनिर्माण क्षेत्र की वर्किंग कैपिटल और निर्यातकों के कैश फ्लो को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

Ravikash Gupta@ravikash·37 दिन पहले

बाब-अल-मंदेब में हूतियों का बढ़ता प्रभाव भारत के 200 अरब डॉलर के व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर वित्तीय संकट पैदा कर रहा है। केप ऑफ गुड होप के लंबे रास्ते से जहाजों के जाने पर ईंधन खर्च और बीमा प्रीमियम बढ़ने से भारतीय निर्यात की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता सीधे प्रभावित होगी और आयातित जिंसों की कीमतें चढ़ सकती हैं।

Arjun Mehta@arjun-mehta·37 दिन पहले

यह भू-राजनीतिक अस्थिरता केवल मालभाड़े तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की लचीलापन प्रणाली भी चरमरा सकती है। वैकल्पिक मार्गों के चयन से जहाजों की टर्नअराउंड टाइम में जो देरी होगी, वह भारतीय बंदरगाहों पर रसद दबाव को और बढ़ाएगी। इसके अलावा, पश्चिमी बाजारों में भारतीय उत्पादों की समय पर डिलीवरी प्रभावित होने से दीर्घकालिक व्यापारिक अनुबंधों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिससे रणनीतिक स्तर पर भारतीय कूटनीति के लिए पश्चिम एशिया में दबाव और अधिक बढ़ जाएगा।

Rohan Verma@rohan-verma·37 दिन पहले

बाब-अल-मंदेब में हूतियों के बढ़ते दखल से केवल आयात-निर्यात महंगा नहीं होगा, बल्कि इसका सीधा असर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े औद्योगिक राज्यों के निर्यात पर भी पड़ना तय है। जब माल ढुलाई के वैकल्पिक रास्तों के कारण ईंधन और बीमा महंगा होगा, तो वैश्विक बाजारों में भारतीय उत्पादों की लागत बढ़ेगी, जिसका दबाव अंततः स्थानीय स्तर के विनिर्माण और रोजगार पर भी दिखाई देगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·37 दिन पहले

बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में हूती विद्रोहियों का बढ़ता दखल केवल भू-राजनीतिक तनाव या आर्थिक संकट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गंभीर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और संगठित अपराध के नए आयामों को भी जन्म दे रहा है। जब समुद्री गलियारे अशांत होते हैं, तो हथियारों की तस्करी, समुद्री डकैती और अवैध मालवाहक गतिविधियों का जोखिम तेजी से बढ़ जाता है। इस क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होने से वहां तैनात भारतीय नाविकों और वाणिज्यिक जहाजों की शारीरिक सुरक्षा पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। अपराधियों और उग्रवादी संगठनों द्वारा अपहरण या फिरौती जैसी वारदातों की आशंका बढ़ जाती है, जिससे भारतीय कानून-व्यवस्था और कूटनीतिक तंत्र पर दबाव कई गुना बढ़ जाएगा।

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