ड्रम अथवा कृत्रिम टैंक में जलीय कृषि करने वाले मत्स्य पालकों के समक्ष अक्सर पानी के दूषित होने की गंभीर समस्या खड़ी हो जाती है। इस चुनौती से निपटने के लिए समस्तीपुर स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के वैज्ञानिक डॉ. मुकेश कुमार ने एक प्रभावी समाधान साझा किया है। उन्होंने तस्वीर दिखाते हुए रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम यानी आरएएस पद्धति की विस्तृत कार्यप्रणाली समझाई। वैज्ञानिक के अनुसार यह आधुनिक तकनीक टैंक आधारित मछली पालन को अधिक सुगम, सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने में अत्यंत मददगार साबित हो सकती है। सामान्यतः टैंक में मछलियों के रहने से पानी शीघ्र खराब हो जाता है और उसमें अमोनिया का स्तर तेजी से बढ़ जाता है, जिसका सीधा प्रतिकूल असर मछलियों के स्वास्थ्य एवं विकास पर पड़ता है। पारंपरिक तरीकों में किसानों को बार-बार भारी मात्रा में पानी बदलना पड़ता है, परंतु आरएएस व्यवस्था में पानी को फेंकने के स्थान पर उसे लगातार फिल्टर और उपचारित करके पुनः इस्तेमाल योग्य बना दिया जाता है।
नाइट्रिफिकेशन प्रक्रिया से नियंत्रित होती है अमोनिया की विषाक्तता
टैंक के जलीय वातावरण में अमोनिया का अत्यधिक संचय जलीय जीवों के लिए जानलेवा सिद्ध हो सकता है। डॉ. मुकेश कुमार ने स्पष्ट किया कि आरएएस सेटअप में गंदे पानी को एक विशेष शोधन टैंक से गुजारा जाता है। इस टैंक के भीतर उच्च गुणवत्ता वाले बायोफिल्टर और बायो-मीडिया लगाए जाते हैं। बायो-मीडिया की शारीरिक बनावट ऐसी होती है कि उसका सतही क्षेत्रफल काफी अधिक होता है, जिसके ऊपर लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु आसानी से पनपते हैं। बायो-बॉल जैसे विशेष मीडिया इन बैक्टीरिया को तेजी से विकसित होने के लिए प्रचुर स्थान मुहैया कराते हैं। जब दूषित पानी इनके संपर्क में आता है, तब ये उपयोगी बैक्टीरिया पानी में घुले अमोनिया को पहले नाइट्राइट में और उसके पश्चात नाइट्रेट में तब्दील कर देते हैं। इस पूरी जैविक क्रिया को वैज्ञानिक भाषा में नाइट्रिफिकेशन कहा जाता है। इस प्रक्रिया से पानी का विषैलापन पूरी तरह नियंत्रित हो जाता है और वही साफ जल दोबारा मुख्य टैंक में भेज दिया जाता है। इस चक्रीय व्यवस्था से पानी की बर्बादी न्यूनतम स्तर पर आ जाती है।
मछली की प्रजाति और बजट के अनुसार करें फिल्टर का चयन
सीमित जमीन अथवा घर के अहाते में टैंक स्थापित करके मत्स्य पालन करने वाले उत्साही किसानों के लिए यह तकनीक एक वरदान की तरह है। इसके बावजूद डॉ. मुकेश कुमार ने किसानों को आगाह किया है कि विशेष रूप से उच्च मूल्य वाली प्रजातियों यानी हाई-प्राइस फिश का संवर्धन करते समय बुनियादी ढांचे की लागत और उस प्रजाति की जैविक आवश्यकताओं का आकलन बेहद सावधानीपूर्वक करना चाहिए। वैज्ञानिक के अनुसार प्रत्येक प्रजाति की जैविक आवश्यकताएं भिन्न होती हैं, इसलिए हर प्रकार की मछली पर एक ही सामान्य बायोफिल्ट्रेशन या फिल्टर ढांचा कारगर नहीं रहता। यदि किसी संवेदनशील प्रजाति के लिए अतिरिक्त टैंक, सहायक एक्वेरियम या भारी फिल्टर लगाने की नौबत आती है, तो शुरुआती पूंजीगत खर्च में भारी वृद्धि हो सकती है। ऐसी परिस्थिति में किसानों को मछली की विशिष्ट किस्म, पानी की अपेक्षित गुणवत्ता और समग्र सिस्टम की लागत के बीच संतुलन बिठाकर ही आवश्यक कदम उठाने चाहिए। जल संरक्षण और सुगम प्रबंधन की दृष्टि से यह पुनर्चक्रण तकनीक अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।
















