राजस्थान की राजधानी जयपुर अपनी समृद्ध कला, संस्कृति और भव्य स्थापत्य कला के लिए पहचानी जाती है। इस ऐतिहासिक शहर में न केवल स्थानीय हस्तशिल्प को सम्मान मिलता है, बल्कि देशभर के पारंपरिक दस्तकारों के उत्पादों की भी खूब कद्र होती है। उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में तैयार होने वाले हाथ से बुने कालीन जयपुर के शाही किलों, महलों, भव्य कोठियों और आलीशान होटलों के फर्श की शोभा बढ़ाते हैं। इसी आकर्षण के चलते साल भर मिर्जापुर के बुनकर और दस्तकार व्यापार के सिलसिले में जयपुर आते रहते हैं, जबकि त्योहारी मौसम में यह कारोबार काफी बढ़ जाता है।
जवाहर कला केंद्र में सजी हस्तनिर्मित कालीनों की प्रदर्शनी
मिर्जापुर के कुशल कारीगर अपने नक्काशीदार और बारीक काम वाले कालीनों को लेकर जयपुर के जवाहर कला केंद्र पहुंचे हैं। इन कारीगरों का कहना है कि मिर्जापुर के कालीन वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान रखते हैं। आम खरीदारों से लेकर बेहद विशिष्ट और वीआईपी खरीदारों तक इनकी काफी पूछपरख रहती है। इस लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह यह है कि मिर्जापुर में तैयार कालीन पूरी तरह हाथ से तैयार किए जाते हैं। इनमें किसी भी तरह की मशीनी बुनाई का इस्तेमाल नहीं होता, जिससे इनकी बनावट और फिनिशिंग बेहद खास बन जाती है।
सामग्रियों की विविधता को देखते हुए कारीगर वूलन, कॉटन और सिल्क जैसे अलग-अलग धागों का उपयोग करते हैं। इन सामग्रियों से बेहतरीन डिजाइन, मनपसंद आकार और आकर्षक रंगों के संयोजन में कालीन ढाले जाते हैं। हाथ से की गई इस महीन बुनाई के कारण कालीन सालों-साल अपनी चमक और मजबूती बनाए रखते हैं।
त्योहारी सीजन में महलों और आलीशान बंगलों से आती है बड़ी मांग
हेरिटेज सिटी होने के कारण जयपुर की ऐतिहासिक इमारतों, प्राचीन महलों, आधुनिक हवेलियों और रिसॉर्ट्स में पारंपरिक इंटीरियर की खास जरूरत होती है। दिवाली से ठीक पहले के दिनों में कालीनों की खरीद में भारी उछाल दर्ज किया जाता है। कारीगर बताते हैं कि वे हर वर्ग की जेब और पसंद का ध्यान रखते हुए अलग-अलग बजट के कालीन लेकर आते हैं। जयपुर के बाजार में विशेष रूप से टर्किश पैटर्न और आधुनिक समकालीन डिजाइनों वाले कालीनों को लोग सबसे ज्यादा पसंद करते हैं।
कीमतों की बात करें तो मिर्जापुर के इन कालीनों की शुरुआती रेंज 5 हजार रुपये से शुरू होती है। डिजाइन और बुनाई की बारीकी के आधार पर यह कीमत लाखों रुपये तक पहुंचती है। जयपुर के खरीदारों के बीच मुख्य रूप से 50 हजार रुपये से लेकर 10 से 15 लाख रुपये तक की कीमत वाले कालीनों की सबसे अधिक मांग रहती है।
लाखों की लागत और हफ्तों की मेहनत से तैयार होती है एक कालीन
उत्तर प्रदेश के इस क्षेत्र में कालीन बुनाई का काम पीढ़ियों से पारिवारिक परंपरा के रूप में चला आ रहा है। इसी पुश्तैनी हुनर की बदौलत हर इलाके के कालीन में एक अनोखी खूबसूरती और टिकाऊपन दिखाई देता है। सामान्य तौर पर एक अच्छी डिजाइन वाली कालीन तैयार करने में 5 से 10 दिन का समय लगता है। यह कालीन पूरी तरह धोने योग्य और वाटरप्रूफ होती है, जिससे इनका रखरखाव बेहद आसान रहता है।
वहीं कुछ बेहद दुर्लभ और नक्काशीदार कालीन ऐसी भी होती हैं, जिन्हें पूरा करने में महीनों का वक्त लग जाता है। ऐसी जटिल कालीनों पर 3 से 4 अनुभवी कारीगर एक साथ बैठकर महीनों मेहनत करते हैं। विदेशी खरीदारों की मांग पूरी करने के लिए ईरान, तुर्की और ऑस्ट्रेलिया के सिल्क जैसे उत्तम धागों का इस्तेमाल किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऐसी सिल्क कालीनों की कीमत 10 से 50 लाख रुपये तक होती है।
कजाकिस्तान को भेजी 3 करोड़ की कालीन और बढ़ता वैश्विक दायरा
मिर्जापुर की बुनाई का परचम विदेशों में भी लहरा रहा है। हाल ही में यहां के कारीगरों ने 3 करोड़ रुपये मूल्य की एक बेहद खास कालीन तैयार कर कजाकिस्तान भेजी थी। दुनिया के कई देशों से इन कारीगरों को सीधे आर्डर मिलते हैं। इसके अलावा देश के अलग-अलग प्रमुख शहरों में लगने वाले शॉपिंग फेस्टिवल और हस्तशिल्प मेलों में भी कारीगर अपने उत्पाद लेकर पहुंचते हैं। हालांकि कारीगरों का मानना है कि हेरिटेज माहौल के कारण जयपुर में अन्य शहरों की तुलना में हस्तनिर्मित कालीनों की खपत और कद्र सबसे ज्यादा देखने को मिलती है।




















