कम वर्षा और सीमित सिंचाई सुविधाओं वाले इलाकों में रबी के दौरान लाभकारी पैदावार निकालना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहता है। राजस्थान के नागौर इलाके में यही स्थिति किसानों के सामने लगातार बनी रहती है। ऐसे वातावरण में तारामीरा की खेती एक मजबूत समाधान बनकर उभरी है। यह तिलहन ऐसी जमीन पर भी टिक जाता है जहां पोषक तत्वों की कमी हो और भूजल का स्तर बेहद नीचे चला गया हो। कम उपजाऊ खेतों में भी इस फसल से किसान संतोषजनक उपज और आमदनी हासिल कर रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी खूबी कठिन मौसम में खुद को बचाए रखने की क्षमता है, जिससे किसानों की लागत सुरक्षित रहती है और घाटे की आशंका नगण्य हो जाती है।
बुवाई की सटीक मियाद और नमी का महत्व
कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह और दिनेश जाखड़ के मुताबिक तारामीरा से भरपूर उत्पादन लेने की प्राथमिक शर्त बुवाई का उपयुक्त वक्त तय करना है। यह पूरी प्रक्रिया तापमान के मिजाज और जमीन के भीतर बची प्राकृतिक तरी पर टिकी होती है। सरकारी कृषि दिशा-निर्देश स्पष्ट करते हैं कि असिंचित या बारानी रकबे में मध्य सितंबर से लेकर मध्य अक्टूबर का दौर बुवाई के लिहाज से सबसे उत्तम बैठता है। नागौर के काश्तकार मानसून विदा होने के बाद खेतों में मौजूद नमी की मात्रा परखकर अपना काम शुरू कर सकते हैं। अगर बुवाई में अनावश्यक विलंब किया जाए तो पौधों का स्वाभाविक फैलाव धीमा पड़ता है और दाने बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसलिए जमीन में नमी मौजूद रहते ही बीजों को डालना समझदारी भरा निर्णय होता है।
जमीन का चयन और खेत तैयार करने की तकनीक
इस तिलहनी फसल के विकास के लिए हल्की दोमट मिट्टी सबसे मुफीद साबित होती है। जिन बंजर या कमजोर टुकड़ों पर दूसरी पारंपरिक फसलें दम तोड़ देती हैं, वहां भी तारामीरा आसानी से पनप जाता है। हालांकि जिन खेतों की मिट्टी अत्यधिक अम्लीय हो अथवा जहां बहुत ज्यादा क्षारीयता की समस्या हो, वहां इसे बोने से परहेज करना चाहिए। बीज डालने से पहले मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए खेत की एक से दो दफा गहरी जुताई की जाती है। जुताई के तुरंत बाद पाटा चलाना बेहद जरूरी माना जाता है, ताकि भीतर संचित नमी हवा में उड़ न सके। इसके अतिरिक्त खेत की ढलान और जल निकासी ऐसी होनी चाहिए कि कहीं भी पानी का ठहराव न बने, क्योंकि जमा हुआ पानी जड़ों की वृद्धि को पूरी तरह रोक देता है।
प्रमाणित किस्में और कतारबद्ध बुवाई का नियम
उपज की गुणवत्ता और मात्रा बढ़ाने के लिए केवल प्रमाणित बीजों का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। जानकारों के अनुसार आरटीएम-314, टी-27 और आरटीएम-2002 किस्में इस क्षेत्र के मौसम और मिट्टी के लिए सबसे ज्यादा भरोसेमंद मानी गई हैं। प्रति हेक्टेयर रकबे के लिए करीब पांच से छह किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। किसान अक्सर बीजों को हाथों से छिड़ककर बोते हैं, परंतु इसकी जगह कतारों में बीज डालना कहीं अधिक कारगर पाया गया है। दो कतारों के मध्य लगभग 40 से 45 सेंटीमीटर का फासला रखना चाहिए। साथ ही बीजों को मिट्टी में तीन से पांच सेंटीमीटर गहराई पर ही दबाना चाहिए ताकि अंकुरण सुगमता से हो सके।
पोषक तत्व प्रबंधन और सिंचाई का सही क्रम
बुवाई से पूर्व मिट्टी का वैज्ञानिक परीक्षण करवाना फायदेमंद रहता है, जिससे खेत की वास्तविक उर्वरता समझकर उसी अनुसार खुराक दी जा सके। पौधे की तेज बढ़वार सुनिश्चित करने के लिए नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित प्रबंध किया जाता है। तारामीरा को बहुत ही कम पानी की दरकार होती है। जिन किसानों के पास सिंचाई का साधन सुलभ है, उन्हें पहला पानी बुवाई के 40 से 50 दिन बीतने पर फूलों के फूटने से ठीक पहले देना चाहिए। इसके बाद दूसरा पानी फलियों के भीतर दाने भरने की अवस्था में दिया जा सकता है।
निराई-गुड़ाई और कटाई का सही समय
शुरुआती दौर में अवांछित खरपतवारों से फसल को बचाने के लिए बुवाई के 20 से 25 दिनों के भीतर एक बार निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिए। यह तिलहनी फसल लगभग 140 से 142 दिनों की समय सीमा में पूरी तरह पककर तैयार हो जाती है। जब खेत में फलियां सूखकर पीली पड़ने लगें और दाने सख्त हो जाएं, तभी फसल काट लेनी चाहिए। कटाई में बेवजह देर करने पर तेज धूप से फलियां चटकने लगती हैं और बीज जमीन पर बिखर जाते हैं, जिससे पैदावार घट जाती है।





















