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पानी छोड़ ज़मीन पर रेंगने वाली अनोखी कवई मछली, बारिश में सड़कों पर चलकर बदलती है अपना ठिकानाभारत
6 अक्तू॰ 2026, 12:28 pm (3 घंटे पहले)· 0

पानी छोड़ ज़मीन पर रेंगने वाली अनोखी कवई मछली, बारिश में सड़कों पर चलकर बदलती है अपना ठिकाना

मानसून की मूसलाधार बारिश के दौरान तालाबों में ऑक्सीजन घटने पर कवई मछली पानी से निकलकर ज़मीन और सड़कों पर रेंगती हुई नए बसेरे की तलाश करती है.

जलीय जीवों की दुनिया में मछली का पानी से अलग होकर ज़िंदा रहना लगभग नामुमकिन माना जाता है, मगर जीव विज्ञान में एक ऐसी प्रजाति मौजूद है जो सूखी ज़मीन पर भी बाकायदा चहलकदमी कर सकती है. जीव वैज्ञानिक इस प्रजाति को एनाबास टेस्टुडिनियस नाम से पुकारते हैं, जबकि स्थानीय और आम बोलचाल में इसे कवई मछली या क्लाइम्बिंग पर्च के रूप में जाना जाता है. खासकर बरसात के मौसम में हैदराबाद समेत कई इलाकों में जब मूसलाधार पानी गिरता है, तब यह तालाबों की सीमा लांघकर गीली घास और पक्की सड़कों पर रेंगती हुई दिखाई देने लगती है.

गलफड़ों और कांटों के सहारे ज़मीन पर आगे बढ़ता है शरीर

कवई मछली ज़मीन पर आगे खिसकने के लिए अपने शरीर के खास अंगों का तालमेल बैठाती है. इसके गलफड़ों के ढक्कनों के सिरों पर नुकीली और कांटेदार संरचनाएं विकसित होती हैं. मछली इन कांटों को ज़मीन, मिट्टी अथवा घास में टिकाकर अपने पूरे शरीर को आगे की तरफ धकेलती है. इस दौरान इसके विशेष पंख और पूंछ संतुलन साधने में मदद करते हैं, जिससे यह पानी के बाहर भी किसी रेंगने वाले जीव की तरह सहजता से आगे बढ़ती जाती है.

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पानी में घुली ऑक्सीजन कम होना और प्रजनन की मजबूरी

इस जलीय जीव का सुरक्षित जलधारा छोड़कर ज़मीन पर आना किसी शौक का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्रकृति का गहरा विज्ञान छिपा हुआ है. भारी बरसात के समय तालाबों और गड्ढों के भीतर भारी मात्रा में गाद और कीचड़ घुल जाता है. पानी के अत्यधिक मटमैला हो जाने से उसमें सांस लेने योग्य ऑक्सीजन की मात्रा में अचानक भारी गिरावट दर्ज की जाती है. दम घुटने जैसी स्थिति से बचने के लिए यह मछली बेहतर, स्वच्छ और नए जलस्रोतों को खोजने के मकसद से ज़मीन का रुख करती है.

इसके साथ ही मानसून इन मछलियों के प्रजनन का सबसे अहम समय होता है. तेज़ बहाव वाले पानी में इनके अंडे बह जाने का खतरा बना रहता है, इसलिए ये धान के शांत खेतों अथवा उथले पानी वाले गड्ढों की तलाश में निकलती हैं जहां अंडे सुरक्षित रह सकें.

हवा से सांस खींचने वाला खास लैबिरिंथ अंग

पानी के बाहर कई घंटों तक टिके रहने का हुनर इसे सिर के करीब मौजूद एक विशेष सहायक अंग से मिलता है. विज्ञान की भाषा में इस हिस्से को लैबिरिंथ ऑर्गन कहा जाता है. फेफड़ों की कार्यप्रणाली की तरह काम करने वाला यह अंग सीधे वातावरण की हवा से ऑक्सीजन खींचने में सक्षम होता है. इसी अनोखी शारीरिक बनावट के चलते कवई मछली किसी भी नम वातावरण में पानी के बगैर 6 से 8 घंटे अथवा उससे भी अधिक समय तक जीवित बनी रह सकती है.

यह जीव अपना यह जोखिम भरा सफर सिर्फ बारिश अथवा नमी भरे माहौल में ही तय करता है. चिलचिलाती धूप, शुष्क हवा या भीषण गर्मी में ज़मीन पर निकलने से इसकी बाहरी त्वचा सूख जाती है, जिससे इसकी मृत्यु हो सकती है.

सवाल-जवाब

कवई मछली का वैज्ञानिक नाम क्या है?
इस अनोखी मछली का वैज्ञानिक नाम एनाबास टेस्टुडिनियस है, जिसे सामान्य भाषा में क्लाइम्बिंग पर्च भी कहा जाता है.
यह मछली ज़मीन पर कैसे चलती है?
यह अपने गलफड़ों के किनारों पर मौजूद कांटेदार बनावट को ज़मीन पर टिकाकर शरीर को आगे धकेलती है और पूंछ से संतुलन बनाती है.
कवई मछली पानी के बाहर सांस कैसे ले पाती है?
इसके सिर के पास लैबिरिंथ ऑर्गन नाम का विशेष सहायक अंग होता है, जो फेफड़ों की तरह सीधे हवा से ऑक्सीजन सोखने का काम करता है.
पानी के बिना यह मछली कितने समय तक ज़िंदा रह सकती है?
नम वातावरण में यह मछली बिना पानी के 6 से 8 घंटे या उससे भी अधिक समय तक जीवित रह सकती है.
बारिश में यह तालाब छोड़कर ज़मीन पर क्यों निकलती है?
तालाब में कीचड़ घुलने से ऑक्सीजन घटने के कारण साफ़ पानी की तलाश में और प्रजनन के लिए सुरक्षित उथली जगह खोजने के लिए यह बाहर आती है.
क्या यह मछली कड़ी धूप या गर्मी में भी ज़मीन पर चल सकती है?
नहीं, यह केवल बारिश या नमी में चलती है क्योंकि धूप और गर्मी में त्वचा सूखने से इसकी मौत हो सकती है.
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