जलीय जीवों की दुनिया में मछली का पानी से अलग होकर ज़िंदा रहना लगभग नामुमकिन माना जाता है, मगर जीव विज्ञान में एक ऐसी प्रजाति मौजूद है जो सूखी ज़मीन पर भी बाकायदा चहलकदमी कर सकती है. जीव वैज्ञानिक इस प्रजाति को एनाबास टेस्टुडिनियस नाम से पुकारते हैं, जबकि स्थानीय और आम बोलचाल में इसे कवई मछली या क्लाइम्बिंग पर्च के रूप में जाना जाता है. खासकर बरसात के मौसम में हैदराबाद समेत कई इलाकों में जब मूसलाधार पानी गिरता है, तब यह तालाबों की सीमा लांघकर गीली घास और पक्की सड़कों पर रेंगती हुई दिखाई देने लगती है.
गलफड़ों और कांटों के सहारे ज़मीन पर आगे बढ़ता है शरीर
कवई मछली ज़मीन पर आगे खिसकने के लिए अपने शरीर के खास अंगों का तालमेल बैठाती है. इसके गलफड़ों के ढक्कनों के सिरों पर नुकीली और कांटेदार संरचनाएं विकसित होती हैं. मछली इन कांटों को ज़मीन, मिट्टी अथवा घास में टिकाकर अपने पूरे शरीर को आगे की तरफ धकेलती है. इस दौरान इसके विशेष पंख और पूंछ संतुलन साधने में मदद करते हैं, जिससे यह पानी के बाहर भी किसी रेंगने वाले जीव की तरह सहजता से आगे बढ़ती जाती है.
पानी में घुली ऑक्सीजन कम होना और प्रजनन की मजबूरी
इस जलीय जीव का सुरक्षित जलधारा छोड़कर ज़मीन पर आना किसी शौक का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे प्रकृति का गहरा विज्ञान छिपा हुआ है. भारी बरसात के समय तालाबों और गड्ढों के भीतर भारी मात्रा में गाद और कीचड़ घुल जाता है. पानी के अत्यधिक मटमैला हो जाने से उसमें सांस लेने योग्य ऑक्सीजन की मात्रा में अचानक भारी गिरावट दर्ज की जाती है. दम घुटने जैसी स्थिति से बचने के लिए यह मछली बेहतर, स्वच्छ और नए जलस्रोतों को खोजने के मकसद से ज़मीन का रुख करती है.
इसके साथ ही मानसून इन मछलियों के प्रजनन का सबसे अहम समय होता है. तेज़ बहाव वाले पानी में इनके अंडे बह जाने का खतरा बना रहता है, इसलिए ये धान के शांत खेतों अथवा उथले पानी वाले गड्ढों की तलाश में निकलती हैं जहां अंडे सुरक्षित रह सकें.
हवा से सांस खींचने वाला खास लैबिरिंथ अंग
पानी के बाहर कई घंटों तक टिके रहने का हुनर इसे सिर के करीब मौजूद एक विशेष सहायक अंग से मिलता है. विज्ञान की भाषा में इस हिस्से को लैबिरिंथ ऑर्गन कहा जाता है. फेफड़ों की कार्यप्रणाली की तरह काम करने वाला यह अंग सीधे वातावरण की हवा से ऑक्सीजन खींचने में सक्षम होता है. इसी अनोखी शारीरिक बनावट के चलते कवई मछली किसी भी नम वातावरण में पानी के बगैर 6 से 8 घंटे अथवा उससे भी अधिक समय तक जीवित बनी रह सकती है.
यह जीव अपना यह जोखिम भरा सफर सिर्फ बारिश अथवा नमी भरे माहौल में ही तय करता है. चिलचिलाती धूप, शुष्क हवा या भीषण गर्मी में ज़मीन पर निकलने से इसकी बाहरी त्वचा सूख जाती है, जिससे इसकी मृत्यु हो सकती है.



















