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महंगे बीज और पिछले घाटे के बावजूद अलवर के किसानों को प्याज पर भरोसा, बड़े पैमाने पर बुवाई शुरूराजस्थान
15 सित॰ 2026, 5:43 pm (10 दिन पहले)· 0

महंगे बीज और पिछले घाटे के बावजूद अलवर के किसानों को प्याज पर भरोसा, बड़े पैमाने पर बुवाई शुरू

पिछले साल के आर्थिक नुकसान और इस वर्ष बीज की कीमतों में भारी उछाल के बावजूद, राजस्थान के अलवर और खैरथल-तिजारा क्षेत्र के किसान 14,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में प्याज की खेती करने की तैयारी में जुटे हैं।

राजस्थान के पूर्वी हिस्से, विशेष रूप से अलवर और खैरथल-तिजारा जिलों को उनके तीखे और उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले लाल प्याज के लिए देश भर में जाना जाता है। हालांकि पिछले साल थोक बाजारों में बेहद कम दाम मिलने के कारण स्थानीय किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा था, लेकिन इसके बावजूद इस साल प्याज की खेती के प्रति उनका उत्साह बेहद मजबूत दिखाई दे रहा है। वर्तमान सीजन में किसान एक बड़े स्तर पर प्याज की बुवाई की तैयारी कर रहे हैं, जो बढ़ती लागत और मौसम की चुनौतियों के बीच उनकी अटूट उम्मीदों को दर्शाता है।

बुवाई का बढ़ता दायरा और बीज की आसमान छूती कीमतें

अकेले खैरथल-तिजारा जिले की बात करें तो इस चालू सीजन के दौरान कुल बुवाई का क्षेत्र 14,000 हेक्टेयर से अधिक रहने का अनुमान लगाया गया है। वर्तमान स्थिति यह है कि लगभग 70 प्रतिशत से अधिक किसानों ने अपने खेतों में प्याज का कण लगाने की प्रक्रिया को पूरा कर लिया है। वहीं, बचे हुए अन्य किसान भी जल्द से जल्द खेतों में गांठी लगाने का काम निपटाने में व्यस्त हैं। इस साल प्याज की खेती में सबसे बड़ी चुनौती बीज यानी गांठी की कीमतों में आई भारी तेजी बनी हुई है। क्षेत्र के किशनगढ़ बास में बड़ी संख्या में अस्थायी बीज विक्रेता ट्रकों में भरकर बीज लेकर पहुंच रहे हैं, ताकि किसानों को सही समय पर इसकी उपलब्धता सुनिश्चित कराई जा सके।

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बीज की कीमतों में पिछले साल की तुलना में इस बार दोगुने से भी अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बीते वर्ष जो प्याज का बीज 3,000 रुपये से लेकर 3,500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से मिल रहा था, उसकी कीमत इस सीजन में बढ़कर 6,500 रुपये से लेकर 7,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी है। इस बढ़ती महंगाई ने किसानों के बजट को काफी प्रभावित किया है, लेकिन वे फिर भी खेती के प्रति समर्पित हैं।

लागत कम करने के लिए किसानों ने अपनाया आत्मनिर्भरता का मार्ग

महंगे बीज की वजह से फसल की शुरुआती लागत काफी बढ़ गई है, जिससे बचने के लिए किसानों ने आत्मनिर्भरता का एक नया तरीका निकाला है। अब क्षेत्र के 50 प्रतिशत से अधिक किसान बाजार से महंगा बीज खरीदने के बजाय अपने खुद के खेतों में ही प्याज का कण तैयार कर रहे हैं। इस पद्धति के तहत किसान अपनी जरूरत के अनुसार कण को बचाकर रख लेते हैं और अतिरिक्त हिस्से को अन्य जरूरतमंद किसानों को अच्छे मुनाफे पर बेच देते हैं। इस पहल से न केवल बाहरी महंगे बीजों पर किसानों की निर्भरता काफी हद तक खत्म हो गई है, बल्कि बाजार में प्याज के दाम कम होने की स्थिति में भी किसानों को सीधा वित्तीय नुकसान बहुत कम उठाना पड़ता है।

प्रति बीघा खर्च और फसल को बीमारियों से बचाने की चुनौती

स्थानीय किसान शिवचरण यादव, हवा सिंह और फराज खान ने प्याज की खेती में आने वाले व्यावहारिक खर्चों पर बात की। उनके अनुसार, एक बीघा खेत में बुवाई के लिए तकरीबन चार से पांच क्विंटल कण की जरूरत पड़ती है। जब इसमें कीटनाशक, खाद, सिंचाई और मजदूरों की दिहाड़ी को जोड़ लिया जाए, तो कुल लागत लगभग 50,000 रुपये से लेकर 60,000 रुपये प्रति बीघा तक पहुंच जाती है। पिछले वर्ष हुए भारी नुकसान की भरपाई करने के उद्देश्य से ही किसान इस बार बेहतर बाजार भाव की उम्मीद में बुवाई का दायरा लगातार बढ़ा रहे हैं।

लागत के साथ-साथ इस समय मौसम भी किसानों की परीक्षा ले रहा है। क्षेत्र में लगातार हो रही बारिश और हवा में नमी की अत्यधिक मात्रा के कारण प्याज की फसल में विभिन्न प्रकार के रोग फैलने का खतरा बढ़ गया है। सहायक कृषि अधिकारी महेश खेरिया ने किसानों को सचेत करते हुए बताया कि वर्तमान मौसम की स्थिति में प्याज की फसल को एंथेक्नोज यानी ट्विस्टर ब्लाइट और कंद सड़न रोग से सबसे ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने सलाह दी है कि किसान अपने खेतों में पानी बिल्कुल न जमा होने दें और जल निकासी की सुदृढ़ व्यवस्था करें। जैसे ही धूप खिले और मौसम साफ हो, किसानों को कृषि विशेषज्ञों की देखरेख में उचित फफूंदनाशी का छिड़काव करना चाहिए, ताकि फसल को सड़ने से समय रहते बचाया जा सके।

सवाल-जवाब

इस वर्ष खैरथल-तिजारा में कितने क्षेत्र में प्याज की बुवाई का अनुमान है?
इस सीजन में खैरथल-तिजारा जिले में 14,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में प्याज की बुवाई होने का अनुमान लगाया गया है।
इस साल प्याज के बीज (गांठी) की कीमतों में कितना उछाल आया है?
प्याज के बीज की कीमतें पिछले साल के 3,000-3,500 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर इस साल 6,500 से 7,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं।
बढ़ती लागत से बचने के लिए किसानों ने क्या तरीका अपनाया है?
50 प्रतिशत से अधिक किसानों ने अपने खेतों में ही प्याज का कण (बीज) तैयार करना शुरू कर दिया है, जिससे वे बाहरी महंगे बीजों पर निर्भर नहीं रहते।
प्रति बीघा प्याज की खेती में कुल कितना खर्च आता है?
एक बीघा प्याज की खेती में बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी मिलाकर लगभग 50,000 से 60,000 रुपये का खर्च आता है।
खराब मौसम के कारण प्याज की फसल को किन बीमारियों का खतरा है?
लगातार बारिश और उमस के कारण फसल में एंथेक्नोज (ट्विस्टर ब्लाइट) और कंद सड़न रोग फैलने का सबसे ज्यादा जोखिम है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ravikash Gupta@ravikash·8 दिन पहले

कृषि अर्थशास्त्र के नज़रिए से देखें तो बीज लागत दोगुनी होने के बावजूद 14,000 हेक्टेयर में बुवाई का यह फैसला किसानों की उच्च जोखिम-प्रतिफल क्षमता को दर्शाता है। किसानों द्वारा खुद बीज तैयार कर लागत घटाने की रणनीति एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम है, जो शुरुआती इनपुट लागत के बोझ को काफी हद तक कम करती है। हालांकि, यदि फसल आने के समय थोक भावों में उतार-चढ़ाव आता है, तो बढ़ी हुई शुरुआती लागत के कारण किसानों के मार्जिन पर दोबारा दबाव बन सकता है। ऐसे में नाशवान नकदी फसलों के लिए बेहतर बाजार संपर्क और मूल्य-स्थिरता तंत्र की दरकार है।

Sophie Laurent@sophie-laurent·8 दिन पहले

रविकेश के विश्लेषण को आगे बढ़ाते हुए, यह देखना महत्वपूर्ण है कि प्याज जैसी नकदी फसलें न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था बल्कि क्षेत्रीय खाद्य आपूर्ति और व्यापार नीतियों को भी सीधे प्रभावित करती हैं। किसानों द्वारा घरेलू स्तर पर बीज तैयार करने का यह आत्मनिर्भर ढांचा इनपुट लागत के झटकों से तात्कालिक राहत तो देता है, लेकिन टिकाऊ आर्थिक सुरक्षा के लिए यह पर्याप्त नहीं है। वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर कृषि उपज की अनिश्चितता को देखते हुए, ऐसे प्रमुख उत्पादन केंद्रों को बेहतर भंडारण बुनियादी ढांचे और नीतिगत सुरक्षा कवच की आवश्यकता है ताकि बाजार के अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव से किसानों की आजीविका को बचाया जा सके।

Rohan Verma@rohan-verma·8 दिन पहले

कृषि लागत में दो गुने से अधिक की बढ़ोतरी और बाजार की अनिश्चितता के बावजूद अलवर क्षेत्र के किसानों का यह कदम उनकी अदम्य जुझारू क्षमता को दर्शाता है। खुद का बीज (कण) तैयार कर लागत कम करने की रणनीति स्थानीय स्तर पर जोखिम प्रबंधन का एक बेहतरीन उदाहरण है। हालांकि, केवल किसानों की आत्मनिर्भरता ही पर्याप्त नहीं है; फसल कटाई के समय संभावित बाजार गिरावट से सुरक्षा के लिए मजबूत कोल्ड स्टोरेज बुनियादी ढांचे और मूल्य स्थिरीकरण तंत्र की सख्त आवश्यकता है, ताकि किसानों की मेहनत का उचित लाभ मिल सके।

Arjun Mehta@arjun-mehta·8 दिन पहले

रोहन जी का विश्लेषण नीतिगत दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अलवर और खैरथल-तिजारा के किसानों का अपने स्तर पर बीज तैयार करना बाजार के दबाव के खिलाफ एक रणनीतिक बचाव है, लेकिन यह कृषि शासन में मौजूद बुनियादी खामियों को भी रेखांकित करता है। राज्य सरकार को केवल बुवाई के आंकड़ों तक सीमित न रहकर 'ऑपरेशन ग्रीन्स' और बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS) जैसे नीतिगत साधनों को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाना होगा। यदि समय रहते प्रसंस्करण इकाइयों और मूल्य श्रृंखला को मजबूत नहीं किया गया, तो फसल आने पर आपूर्ति की अधिकता किसानों को फिर से मूल्य घाटे के दुचक्र में धकेल सकती है, जिसका सीधा असर क्षेत्रीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·8 दिन पहले

अस्थायी विक्रेताओं द्वारा बीजों की कीमतों में अचानक दोगुना उछाल कृषि क्षेत्र में संभावित कालाबाज़ारी और अनियमित व्यापार की ओर संकेत करता है। ऐसे समय में जब किसान घाटे से उबर रहे हैं, बीजों के मनमाने दामों और नकली आपूर्ति पर रोक लगाने के लिए कानूनी तंत्र का सतर्क रहना आवश्यक है। प्रशासन को बीज अधिनियम और आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत अनधिकृत विक्रेताओं की सख्त जाँच और पुलिस निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि किसानों को किसी आपराधिक धोखाधड़ी से बचाया जा सके और क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनी रहे।

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