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मौत की सजा घटाने में न्यायपालिका की अत्यधिक नरमी पर सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणीभारत
9 अक्तू॰ 2026, 6:33 am (2 घंटे पहले)· 0

मौत की सजा घटाने में न्यायपालिका की अत्यधिक नरमी पर सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने गंभीर अपराधों में सजा कम करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए स्पष्ट सीमा तय करने की आवश्यकता पर बल दिया।

देश की शीर्ष अदालत ने गुरुवार 8 अक्टूबर 2026 को गंभीर जुर्म के मामलों में अत्यधिक नरमी दिखाने की न्यायिक प्रवृत्ति पर बेहद तीखी चिंता व्यक्त की। एक हत्यारोपी बंदी की समय से पहले जेल से रिहाई की मांग वाली अर्जी पर सुनवाई के दौरान यह अहम विमर्श सामने आया। संबंधित मुजरिम को पहले मृत्युदंड मिला था, जिसे बाद में घटाकर आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया गया था। इसी पृष्ठभूमि में सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने संकेत दिया कि जुर्म की गंभीरता को दरकिनार कर बार-बार राहत देने का रुख कानून व्यवस्था के समक्ष विकट चुनौतियां खड़ी कर रहा है।

लगातार रियायत देने पर रेखांकित की गई सीमा

इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता तथा न्यायमूर्ति शील नागू की संयुक्त पीठ के समक्ष चल रही थी। विचार-विमर्श के दौरान न्यायमूर्ति दत्ता ने न्यायिक प्रक्रियाओं में लगातार दिखाई जाने वाली अत्यधिक उदारता की आलोचना की। उन्होंने कहा,

"आपको कहीं न कहीं एक सीमा तय करनी होगी."
पीठ का मानना था कि बार-बार माफ करने और दंड हल्का करने का यही दृष्टिकोण समाज के भीतर आपराधिक प्रवृत्तियों के विस्तार को बढ़ावा दे रहा है। अदालत ने इंगित किया कि रियायत देने की इस आदत पर अब स्पष्ट विराम लगना अनिवार्य हो गया है।

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दुर्लभतम मामलों के सिद्धांत और बदलते परिवेश पर मंथन

अदालत ने इस अवसर पर उस ऐतिहासिक दौर का भी विश्लेषण किया जब गंभीर हत्याओं के संदर्भ में 'दुर्लभ से दुर्लभतम' का कानूनी पैमाना गढ़ा गया था। न्यायमूर्ति दत्ता ने रेखांकित किया कि वह सिद्धांत ऐसे समय में प्रभावी किया गया था जब इस तरह के जघन्य अपराध समाज में अत्यंत कम घटित होते थे। हालांकि अब सामाजिक परिवेश और अपराधों की प्रकृति पूरी तरह बदल चुकी है। इसलिए पुराने ढर्रे पर लगातार नरमी बरतते रहना न्याय के वास्तविक उद्देश्य को कमजोर करता है।

पूर्व के एक स्तब्ध करने वाले प्रकरण का दिया संदर्भ

अपनी चिंताओं को तर्कसंगत ठहराने के लिए पीठ ने एक पूर्ववर्ती खौफनाक मामले का विशेष रूप से उल्लेख किया। उस घटनाक्रम में एक पिता ने अपनी सगी जेष्ठ पुत्री के साथ दुष्कर्म कर उसकी निर्मम हत्या कर दी थी। पीड़िता की मां की गवाही पर ट्रायल में उसे उम्रकैद की सजा मिली थी। इसके कुछ वर्षों के उपरांत वह व्यक्ति पैरोल का लाभ उठाकर कारागार से बाहर आ गया। पैरोल अवधि के दौरान उसने अपनी ही छोटी बेटी की आंखों के सामने अपनी पत्नी यानी पीड़िता की मां का भी कत्ल कर दिया।

दया याचिका में विलंब और न्यायिक निर्णयों के विरोधाभास

उस विभत्स घटना में छोटी बच्ची की प्रत्यक्षदर्शी गवाही के बाद अदालत ने दोषी को फांसी का दंड सुनाया था। इसके बावजूद बाद में उच्चतम स्तर पर उस मृत्युदंड को फिर से उम्रकैद में बदल दिया गया। इस रियायत का आधार यह बनाया गया कि उसने छोटी बच्ची की जान नहीं ली थी, साथ ही उसकी दया याचिका पर निर्णय लेने में लंबा समय लगा था। पीठ ने इसी विरोधाभास पर उंगली उठाते हुए जोर देकर कहा कि इस प्रकार की अत्यधिक उदारता के कारण ही ऐसी अवांछित परिस्थितियों का निर्माण होता है, जिस पर अब लगाम लगाई जानी चाहिए।

सवाल-जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने अपराध बढ़ने के पीछे किस मुख्य कारण पर टिप्पणी की?
अदालत ने कहा कि न्यायपालिका के अत्यधिक माफ करने वाले और नरम रवैये की वजह से देश में अपराध बढ़ रहे हैं और इस पर सीमा तय करनी होगी।
यह टिप्पणी किस मामले की सुनवाई के दौरान की गई?
यह टिप्पणी हत्या के मामले में उम्रकैद काट रहे एक कैदी की समय से पहले जेल से रिहाई की अर्जी पर सुनवाई के दौरान की गई।
मामले की सुनवाई किस पीठ द्वारा की जा रही थी?
इस याचिका की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ कर रही थी।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने 'दुर्लभतम मामले' के सिद्धांत पर क्या कहा?
उन्होंने कहा कि यह सिद्धांत तब लागू किया गया था जब ऐसे अपराध कम होते थे, लेकिन अब समय बदल चुका है।
अदालत ने किस पूर्ववर्ती मामले का उदाहरण पेश किया?
पीठ ने उस मामले का हवाला दिया जिसमें बड़ी बेटी से दुष्कर्म और हत्या के दोषी पिता ने पैरोल पर आकर अपनी पत्नी की भी हत्या कर दी थी, फिर भी उसकी फांसी टल गई थी।
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टिप्पणियाँ 5

Arshdeep Ahluwalia@arshdeep-ahluwalia·31 मिनट पहले

अदालत की यह टिप्पणी बिल्कुल सही है। जब हत्यारे बार-बार छूटकर बाहर आएंगे, तो आम आदमी का न्याय व्यवस्था से भरोसा उठ जाएगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·51 मिनट पहले

अदालत की बात बिल्कुल सही है, जब अपराध इतने खौफनाक हैं तो बार-बार नरमी क्यों दिखाई जाए?

Rohan Gupta@rohan-gupta·50 मिनट पहले

अर्जुन, बात तो सही है लेकिन क्या दया याचिका में देरी का खामियाजा भी इस तरह सजा कम करके ही निकाला जाएगा?

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

पैरोल पर बाहर आकर कत्ल करने वाले को फिर से राहत मिल जाना वाकई डरावना है।

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

करण भाई, छोटी बच्ची के सामने उसकी मां को मारने वाले को फिर से उम्रकैद मिलना सच में दिमाग सुन्न कर देता है।

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