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शादी से पहले लिव-इन और बच्चे की सच्चाई छिपाना कानूनी अपराध, केरल उच्च न्यायालय ने खारिज की अग्रिम जमानतभारत
7 अक्तू॰ 2026, 6:42 pm (2 घंटे पहले)· 1

शादी से पहले लिव-इन और बच्चे की सच्चाई छिपाना कानूनी अपराध, केरल उच्च न्यायालय ने खारिज की अग्रिम जमानत

केरल उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि पहले से मौजूद रिश्ते और बच्चे की बात छिपाकर शारीरिक संबंध बनाना भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत धोखे की श्रेणी में आता है। अदालत ने मामले के आरोपी को पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।

विवाह का रिश्ता तय होने के पश्चात अपनी भावी जीवनसंगिनी से पहले से चल रहे लिव-इन संबंध तथा उससे जन्मे बच्चे की सच्चाई को छिपाना अब कानूनन भारी पड़ सकता है। केरल उच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था दी है कि यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार की अहम व्यक्तिगत जानकारियों को दबाकर महिला के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करता है, तो यह कृत्य पहली नजर में भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत कपटपूर्ण साधनों द्वारा बनाए गए यौन संबंध के दायरे में आता है। अदालत ने इस आधार पर आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका पूरी तरह निरस्त कर दी और उसे जांच अधिकारी के सामने पेश होने का आदेश दिया।

अदालत का रुख और अग्रिम जमानत याचिका का निपटारा

यह महत्वपूर्ण आदेश न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन की एकल पीठ ने कोझिकोड जिले के फेरोक पुलिस स्टेशन में दर्ज आपराधिक मामले से जुड़ी अपील की सुनवाई के दौरान जारी किया। आरोपी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, अदालत ने मामले के तथ्यों और महिला द्वारा लगाए गए आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उसे किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार कर दिया। पीठ ने आरोपी को निर्देश दिया कि वह तुरंत संबंधित जांच अधिकारी के समक्ष जाकर विधिवत आत्मसमर्पण करे, ताकि मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ सके।

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सगाई में खर्च हुए थे लाखों रुपये, छिपाया गया पुराना संबंध

दर्ज कराई गई शिकायत के विवरण के अनुसार, आरोपी और शिकायतकर्ता महिला के बीच शादी की बात पक्की हुई थी। पीड़ित महिला अनुसूचित जाति समुदाय से संबंध रखती है। दोनों पक्षों की सहमति के बाद पारिवारिक स्तर पर विवाह से जुड़ी पारंपरिक रस्में भी पूरी की गई थीं। महिला के परिजनों ने इस पूरे आयोजन पर लगभग 10 लाख रुपये खर्च किए थे। महिला का गंभीर आरोप है कि सगाई और बातचीत के इस पूरे दौर में आरोपी ने अपने जीवन से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य को गुप्त रखा। आरोपी पहले से ही किसी अन्य महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा था और उस संबंध से उसका तीन साल का एक बच्चा भी था। शिकायतकर्ता का तर्क है कि यदि यह सच्चाई उसके सामने पहले उजागर कर दी जाती, तो वह विवाह और रिश्ते के संदर्भ में अपना निर्णय पूरी तरह अलग ले सकती थी।

सगाई के उपरांत वायनाड की यात्रा और शारीरिक संबंध

शिकायत में बताया गया है कि विवाह तय हो जाने के बाद महिला आरोपी के कहने पर उसके साथ वायनाड गई थी। वहां दोनों एक होटल में ठहरे। महिला का आरोप है कि उसी दौरान आरोपी ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। महिला ने यह भी साफ किया कि उसने यह सहमति केवल इसलिए दी थी क्योंकि दोनों का विवाह पक्का हो चुका था और उसे रिश्ते के भविष्य पर पूरा भरोसा था। इसके बाद सच्चाई सामने आने पर फेरोक पुलिस स्टेशन में आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4), धारा 69 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(va) के तहत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया।

आरोपी की दलील: शादी से इनकार नहीं, इसलिए धारा 69 नहीं बनती

अदालत की कार्यवाही के दौरान आरोपी के वकील ने तर्क प्रस्तुत किया कि इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 का प्रावधान लागू नहीं होना चाहिए। बचाव पक्ष की दलील थी कि कानून की यह धारा मुख्य रूप से उन परिस्थितियों में लागू होती है जहां कोई व्यक्ति विवाह का झूठा वादा करके महिला के साथ संबंध बनाता है और बाद में शादी करने से साफ मुकर जाता है। आरोपी का कहना था कि वह महिला के साथ विवाह करने के लिए तैयार था और उसने शादी से पीछे हटने की कोई बात नहीं की थी, इसलिए उसके आचरण को धारा 69 के अंतर्गत अपराध नहीं माना जा सकता।

केरल उच्च न्यायालय की व्याख्या: केवल शादी का वादा ही आधार नहीं

न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज करते हुए भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के कानूनी ढांचे को विस्तार से समझाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 69 के तहत अपराध बनने की दो अलग-अलग स्वतंत्र स्थितियां होती हैं। पहली स्थिति तब उत्पन्न होती है जब यौन संबंध के लिए सहमति कपटपूर्ण साधनों या धोखे के जरिए हासिल की गई हो। दूसरी स्थिति वह होती है जहां शादी का ऐसा झूठा वादा किया गया हो जिसे निभाने का शुरुआत से कोई इरादा ही न रहा हो और उसी भरोसे पर संबंध बनाए गए हों।

अदालत ने रेखांकित किया कि मौजूदा मामले में लगे आरोप पहली श्रेणी के तहत आते हैं। न्यायालय के अनुसार, आरोपी का केवल यह कह देना पर्याप्त बचाव नहीं हो सकता कि वह विवाह के लिए तैयार था। यदि शारीरिक संबंध के लिए सहमति लेते समय उसने अपने पहले से चल रहे लिव-इन संबंध और तीन साल के बच्चे की बात जानबूझकर छिपाई, तो प्रथम दृष्टया यह छल और धोखे से सहमति प्राप्त करने का मामला बनता है।

सहमति का आधार और वैवाहिक स्थिति की मान्यता

न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि जब विवाह के लिए बातचीत तय हुई थी, तब शिकायतकर्ता और उसके परिवार ने यह स्वाभाविक रूप से मान लिया था कि आरोपी अविवाहित है तथा वह किसी अन्य वैवाहिक जैसी प्रकृति के रिश्ते में शामिल नहीं है। इसी बुनियादी भरोसे पर वैवाहिक कार्यक्रम आयोजित किए गए और 10 लाख रुपये का भारी खर्च किया गया। बाद में इन बेहद अहम जानकारियों को छिपाकर शारीरिक संबंध स्थापित किए गए, जो प्राथमिक दृष्टि से धारा 69 के अपराध को आकर्षित करते हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि इस कृत्य को बलात्कार के रूप में नहीं देखा जा रहा है, लेकिन उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह छलपूर्ण तरीके से संबंध बनाने के कानूनी दायरे में पूरी तरह आता है।

एससी/एसटी अधिनियम के तहत दर्ज मामला और निर्णय का दायरा

चूंकि पीड़िता अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखती है, इसलिए इस मामले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(va) भी जोड़ी गई है। इसी कड़े कानून के प्रावधानों के चलते आरोपी ने उच्च न्यायालय से अग्रिम जमानत की गुहार लगाई थी। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल प्राथमिक आरोपों और अग्रिम जमानत के बिंदु पर आधारित है। इसे मुकदमे का अंतिम निष्कर्ष या आरोपी की पूर्ण दोषसिद्धि नहीं माना जाना चाहिए। तथ्यों और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता है, जिसके चलते अग्रिम जमानत की याचिका खारिज करते हुए आरोपी को पुलिस के समक्ष समर्पण करने के निर्देश दिए गए।

सवाल-जवाब

केरल उच्च न्यायालय ने किस मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत खारिज की?
अदालत ने शादी तय होने के बाद अपने पूर्व लिव-इन रिश्ते और तीन साल के बच्चे की बात छिपाकर संबंध बनाने के मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत खारिज की।
इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की कौन सी धाराएं लगाई गई हैं?
इस मामले में बीएनएस की धारा 69 और धारा 318(4) के साथ-साथ एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(va) दर्ज की गई है।
आरोपी ने अदालत में अपने बचाव में क्या दलील पेश की थी?
आरोपी ने दलील दी कि वह महिला से शादी करने को तैयार था, इसलिए शादी का वादा तोड़ने से संबंधित धारा 69 उस पर लागू नहीं होती।
उच्च न्यायालय ने बीएनएस की धारा 69 को लेकर क्या स्पष्टीकरण दिया?
अदालत ने कहा कि धारा 69 केवल शादी का झूठा वादा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि जानबूझकर तथ्य छिपाकर धोखे से सहमति हासिल करने पर भी लागू होती है।
महिला के परिवार ने विवाह कार्यक्रम पर कितना खर्च किया था?
शिकायत के अनुसार दोनों परिवारों के बीच आयोजित रस्मों पर महिला के परिवार ने करीब 10 लाख रुपये खर्च किए थे।
यह मामला किस पुलिस स्टेशन में दर्ज कराया गया है?
यह आपराधिक मामला कोझिकोड जिले के फेरोक पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया है।
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